बंगाल में खदान बनाम जल-जंगल-जमीन: सोना-मैंगनीज की तलाश के बीच गांवों में दो राय
सालडांगा से सुसनीजोभी, बुरीझोर और धोबाकोचा तक बैठकों का दौर शुरू; ग्रामीणों के बीच खनन को लेकर दो अलग-अलग राय
झारखंड के खनन अनुभव की छाया बंगाल तक पहुंचने की चर्चा—सवाल सिर्फ खदान का नहीं, सवाल यह कि खनिज संपदा से गांव मजबूत होंगे या गांवों की कीमत पर खजाना भरेगा?
पश्चिम बंगाल के खनिज बहुल इलाकों में अब एक नया सवाल जमीन पर उतरता दिखाई दे रहा है—खदान खुले या गांव बचें?
सालडांगा, सुसनीजोभी, बुरीझोर, धोबाकोचा समेत आसपास के कई गांवों में ग्रामीणों, प्रधानों और मुखियाओं के बीच बैठकों का दौर शुरू होने की जानकारी सामने आ रही है। इन बैठकों में खनन को लेकर ग्रामीण समाज के भीतर ही अलग-अलग राय उभर रही है।
एक तरफ महतो समाज से जुड़े ग्रामीणों के बीच यह तर्क है कि यदि क्षेत्र में खनिज संपदा मौजूद है तो खदान शुरू होनी चाहिए। उनका कहना है कि इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिल सकता है, सरकार को राजस्व मिल सकता है और इलाके की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है।
दूसरी तरफ आदिवासी समाज के एक हिस्से में खनन को लेकर गंभीर आशंका है। सवाल उठ रहा है कि रोजगार और राजस्व के नाम पर कहीं जमीन, जंगल, पानी और पारंपरिक जीवन-व्यवस्था की कीमत तो नहीं चुकानी पड़ेगी?

बंगाल में खनिज की तलाश नई बात नहीं
पश्चिम बंगाल का खनिज क्षेत्र लंबे समय से सरकारी सर्वे और खोज का हिस्सा रहा है। राज्य के Directorate of Mines and Minerals के रिकॉर्ड में विभिन्न खनिज संसाधनों की खोज और खनिज-इन्वेंटरी तैयार करने का उल्लेख है।
सोने को लेकर भी हाल के वर्षों में राज्य के दक्षिणी और पश्चिमी हिस्सों में खोज तेज हुई है। 2025 में केंद्र सरकार की ओर से संसद में दी गई जानकारी के आधार पर पश्चिम बंगाल में नौ स्थानों पर सोने की संभावनाओं की जानकारी सामने आई थी।
यानी सवाल काल्पनिक नहीं है—बंगाल की धरती के नीचे मौजूद खनिज संपदा अब आर्थिक और राजनीतिक दोनों नजरों से महत्वपूर्ण विषय बन चुकी है। लेकिन असली सवाल यह है कि इस संपदा पर पहला अधिकार किसका होगा—सिर्फ सरकार और कंपनियों का, या उस जमीन पर पीढ़ियों से रहने वाले ग्रामीणों की आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी?
झारखंड का अनुभव क्यों बन रहा है बंगाल में चर्चा का विषय?
झारखंड में खनन को लेकर वर्षों से रोजगार, राजस्व और औद्योगिक विकास के साथ-साथ विस्थापन, पर्यावरण, जमीन और आदिवासी अधिकारों पर बहस चलती रही है।
2017 में झारखंड के पारसी क्षेत्र में सोने की खदान को लेकर आदिवासी संगठनों का विरोध सामने आया था। विरोध का एक प्रमुख मुद्दा ग्रामसभा की भूमिका और आदिवासी भूमि-अधिकार था। यही वजह है कि बंगाल के आदिवासी बहुल इलाकों में भी झारखंड का अनुभव एक संदर्भ के रूप में चर्चा में आना स्वाभाविक है।
पश्चिम बंगाल में वनाधिकार कानून भी झाड़ग्राम, पुरुलिया, बांकुड़ा और पश्चिम मेदिनीपुर जैसे जंगलमहल क्षेत्रों में लागू किया जा रहा है। ऐसे में किसी भी बड़े खनन प्रोजेक्ट का सवाल केवल “खनिज कितना है?” तक सीमित नहीं रहेगा। सवाल यह भी होगा कि जमीन किसकी है, जंगल पर अधिकार किसका है, ग्रामसभा की भूमिका क्या होगी, विस्थापन होगा या नहीं और प्रभावित परिवारों को क्या मिलेगा?
खदान समर्थक ग्रामीणों का तर्क—रोजगार नहीं तो विकास कैसे?
खनन के पक्ष में खड़े ग्रामीणों का तर्क भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि वर्षों से क्षेत्र के युवा रोजगार की तलाश में बाहर जा रहे हैं। यदि स्थानीय स्तर पर खदान और उससे जुड़े उद्योग खुलते हैं तो मजदूरी, परिवहन, छोटे कारोबार और अन्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। सरकार को रॉयल्टी और अन्य राजस्व मिलने की संभावना भी रहती है।
लेकिन यहां भी कुछ बड़े सवाल हैं:
- क्या खदान में मिलने वाला रोजगार स्थानीय युवाओं को मिलेगा?
- क्या जमीन गंवाने वाले परिवारों को स्थायी रोजगार मिलेगा?
- क्या विस्थापन होने पर पुनर्वास वास्तव में जमीन पर दिखाई देगा?
- क्या खनिज संपदा से गांव के गरीब की जिंदगी बदलेगी या सिर्फ खनिज निकालने वाली व्यवस्था मजबूत होगी?
आदिवासी समाज पूछ रहा है—विकास किस कीमत पर?
खनन विरोधी आदिवासी ग्रामीणों की चिंता का केंद्र जमीन और पारंपरिक जीवन है। उनका सवाल सीधा है—यदि जंगल कटे, खेत प्रभावित हुए, जलस्रोत बदले और पारंपरिक आजीविका खत्म हुई तो उसके बदले मिलने वाला मुआवजा क्या उस नुकसान की भरपाई कर पाएगा?
पश्चिम बंगाल में 2026 में खनन से जुड़ी वनभूमि की खोज/ड्रिलिंग के मामलों में स्थानीय संताली समुदाय के प्रतिरोध के कारण काम प्रभावित होने का उल्लेख केंद्र सरकार से जुड़े दस्तावेज में भी दर्ज है। यानी यह सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि खनिज खोज और स्थानीय समुदाय के बीच पैदा होने वाले तनाव का एक वास्तविक उदाहरण भी है।
सबसे बड़ा सवाल—क्या पुरानी गलतियां दोहराई जाएंगी?
खनन पर बहस में अवैध खनन का मुद्दा भी बार-बार उठता रहा है। पश्चिम बंगाल सरकार के खनन विभाग के पास अवैध खनन, परिवहन और भंडारण से संबंधित नियम भी मौजूद हैं। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि खदान किसी भी कीमत पर खुले या बिल्कुल न खुले। सवाल होना चाहिए:
- यदि खदान खुलेगी तो नियम कौन तय करेगा?
- ग्रामसभा की सहमति और भागीदारी कितनी होगी?
- स्थानीय लोगों को रोजगार में कितनी प्राथमिकता मिलेगी?
- जमीन के बदले मुआवजा और पुनर्वास कितना होगा?
- पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
- यदि भविष्य में खदान बंद हुई तो उस जमीन और गांव का क्या होगा?
पश्चिम बंगाल की खनन व्यवस्था में पर्यावरणीय मंजूरी, माइन क्लोजर प्लान, पुनर्वास और पर्यावरणीय निगरानी जैसे प्रावधानों का उल्लेख सरकारी दस्तावेजों में है।
अब गांवों में फैसला सिर्फ खदान का नहीं, भविष्य का होगा
सालडांगा, सुसनीजोभी, बुरीझोर और धोबाकोचा जैसे गांवों में यदि बैठकों का सिलसिला आगे बढ़ता है तो यह केवल स्थानीय विवाद नहीं रहेगा। यह बहस धीरे-धीरे एक बड़े सवाल में बदल सकती है—
“धरती के नीचे का सोना किसका है और धरती के ऊपर रहने वाले इंसान का भविष्य किसका?”
एक पक्ष रोजगार चाहता है। दूसरा पक्ष जमीन और जंगल की सुरक्षा। दोनों पक्षों के सवालों को सुना जाना जरूरी है, क्योंकि खदान खुलने के बाद उसे बंद करना आसान नहीं होता और जमीन उजड़ने के बाद पुराना गांव वापस लाना उससे भी मुश्किल।
बंगाल के सामने असली चुनौती खनिज संपदा निकालने की नहीं, बल्कि यह तय करने की है कि विकास का लाभ गांव तक पहुंचे और विकास की कीमत गांव को ही न चुकानी पड़े।
जमीनी आवाज अब इस पूरे मामले में गांव-गांव जाकर यह जानने की कोशिश करेगा—कौन खदान चाहता है, कौन विरोध में है, जमीन किसकी है, खनिज की वास्तविक स्थिति क्या है और प्रस्तावित खनन की कानूनी प्रक्रिया कहां तक पहुंची है।

