जमीनी आवाज — खबरें जमीन की, जमाने की।
जमीनी आवाज सिर्फ दैनिक खबरों की वेबसाइट नहीं है।
यह आपकी आवाज है।
जो छिपा है, उसे खोजेंगे।
जो दबा है, उसे उठाएंगे।
जो सवाल जनता के मन में है, उसे सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाएंगे।
हर सुबह चाय की गर्म प्याली के साथ जब आप जमीनी आवाज खोलेंगे, तो कोशिश होगी कि आपको सिर्फ खबर न मिले—खबर के पीछे की कहानी मिले, सवाल मिले और जवाब तलाशने की पत्रकारिता मिले।
कई खबरें फाइलों में दब जाती हैं।
कई सवाल कागजों के ढेर के नीचे दब जाते हैं।
कई आवाजें हाशिये पर चली जाती हैं।
और कई घटनाओं को समय के साथ भुला दिया जाता है।
लेकिन जमीनी आवाज मानती है—अगर खबर हाशिये की है, तो उसे सामने आना ही चाहिए।
हमारी नजर सत्ता के गलियारों पर भी होगी और गांव की चौपाल पर भी।
हम सरकारी दफ्तरों की फाइलों को भी देखेंगे और उन लोगों की आंखों को भी, जिनकी बात अक्सर कोई
सुनने वाला नहीं होता।
हमारा सवाल किसी व्यक्ति से नहीं, व्यवस्था से होगा।
हमारा सरोकार किसी पक्ष से नहीं, जनता से होगा।
और हमारी पत्रकारिता किसी दबाव से नहीं, तथ्यों और प्रमाणों से चलेगी।
जमीनी आवाज का मकसद शोर पैदा करना नहीं,
सवाल पैदा करना है।
हम खबर को सिर्फ प्रकाशित नहीं करना चाहते—
हम चाहते हैं कि खबर समाज में संवाद पैदा करे, जिम्मेदार लोगों तक पहुंचे और जहां जरूरत हो,
वहां जवाबदेही का रास्ता खोले।
क्योंकि हमारे लिए खबर सिर्फ खबर नहीं है।
खबर किसी किसान की उम्मीद है।
खबर किसी मजदूर का सवाल है।
खबर किसी मां की चिंता है।
खबर किसी युवा का भविष्य है।
खबर किसी गांव की समस्या है।
और खबर उस आम आदमी की आवाज है, जिसकी आवाज अक्सर बड़े शोर में दब जाती है।
यही हमारा संकल्प है।
सत्ता से सवाल पूछेंगे,
जनता की बात रखेंगे,
जमीन पर उतरकर सच तलाशेंगे
और जो मिलेगा, उसे जिम्मेदारी के साथ आपके सामने रखेंगे।
हम जानते हैं कि पत्रकारिता में सबसे बड़ी पूंजी पैसा नहीं—विश्वास है।
और यह विश्वास हम मांगेंगे नहीं,
हर खबर के साथ कमाने की कोशिश करेंगे।
क्योंकि जमीनी आवाज की असली ताकत उसका पाठक है।
आप पढ़ेंगे।
आप सवाल करेंगे।
आप हमें खबर देंगे।
और आपकी आवाज को हम अपनी पत्रकारिता का हिस्सा बनाएंगे।
सत्ता के गलियारों से गांव की चौपाल तक—
जहां सवाल होगा, वहां जमीनी आवाज होगी।
चाय गरम रखिए…
क्योंकि खबरें भी गरम होंगी।
जमीनी आवाज
खबरें जमीन की, जमाने की।