जंतर-मंतर तक पहुंचने से पहले ही लोकतंत्र को बैरिकेड!
ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाने निकले छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और नेता हिरासत में—बसों में भरकर दिल्ली के अलग-अलग थानों तक ले जाने का आरोप
SIR पर उठे सवालों से सड़क तक पहुंचा विवाद; दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों, 13 करोड़ नामों और दिल्ली में 33 लाख से ज्यादा नोटिसों के बीच अब सवाल सिर्फ वोटर लिस्ट का नहीं, जवाबदेही का भी
देश की राजधानी दिल्ली में शुक्रवार को सवाल पूछने निकले लोगों के सामने बैरिकेड खड़े थे। मंच जंतर-मंतर था। मुद्दा था मतदाता सूची और Special Intensive Revision (SIR)। निशाने पर थे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार। लेकिन प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही पुलिस ने रास्ता रोक दिया।
फिर शुरू हुआ हिरासत का सिलसिला। योगेंद्र यादव, AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा, CPI(ML) Liberation के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य, RTI कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण समेत अनेक लोग पुलिस हिरासत में लिए गए।
दिल्ली पुलिस का कहना था कि प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं ली गई थी और नई दिल्ली जिले में धारा 163 लागू थी।
बसों में भरकर अलग-अलग थानों तक क्यों?
जब प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया, तो उन्हें अलग-अलग बसों में भरकर दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में स्थित थानों तक ले जाने की जरूरत क्यों पड़ी? अंजलि भारद्वाज ने बताया कि उन्हें तीन अलग बसों में ले जाया गया और कई घंटे बाद द्वारका थाने पहुंचाया गया। योगेंद्र यादव ने भी बस से वीडियो संदेश में कहा कि उन्हें यह नहीं बताया गया था कि उन्हें कहां ले जाया जा रहा है।
क्या यह सामान्य निरोध की प्रक्रिया थी? किस कानूनी प्रावधान के तहत प्रदर्शनकारियों को अलग-अलग थानों में ले जाया गया? क्या हर व्यक्ति को उसके निरोध का आधार बताया गया?
योगेंद्र यादव अकेले नहीं थे—पूरी तस्वीर कहीं बड़ी है
हिरासत में लिए गए लोगों में छात्र नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, RTI कार्यकर्ता, राजनीतिक दलों के नेता, वकील और पत्रकार भी शामिल थे। मोहम्मद इरफान ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनका पत्रकार पहचान-पत्र और माइक्रोफोन फेंक दिया—इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष देवेंद्र यादव भी एक अलग प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए और IP Estate थाने ले जाए गए।
सवाल सड़क पर क्यों आया?
द इंडियन एक्सप्रेस की जांच के अनुसार तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले लगभग दस महीनों में SIR से जुड़े फैसलों पर कम-से-कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं, जिनमें नए मतदाताओं को जोड़ने, नाम हटाने और चुनावी डेटा तक पहुंच जैसे विषय शामिल थे। निर्वाचन आयोग ने जवाब में कहा कि अलग-अलग राय संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है और फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
दिल्ली की मतदाता सूची ने भी बढ़ाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में SIR के दौरान मतदाताओं को जारी नोटिसों के तरीके को प्रथम दृष्टया "mechanical" बताया और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा। रिपोर्ट के मुताबिक 33 लाख से अधिक मतदाताओं को विभिन्न कारणों से नोटिस जारी किए गए थे।
जमीनी आवाज का सवाल
लोकतंत्र में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी है उसके फैसलों पर सवाल पूछने की स्वतंत्रता। पुलिस से हिरासत की पूरी कानूनी प्रक्रिया पर, निर्वाचन आयोग से आंतरिक आपत्तियों के निपटारे पर, और सरकार से पारदर्शी संवाद व्यवस्था पर जवाब चाहिए। क्या लोकतंत्र में वोट के सवाल पर सवाल पूछने की जगह सिर्फ बैरिकेड के पीछे बची है?



