तीन दशक की वर्दी, हजारों यादें और फिर एक साथ हुआ RPF का 89 बैच

खड़गपुर में 30 साल पूरे होने पर गेट-टुगेदर, ड्यूटी की चुनौतियों के बीच परिवारों ने भी साझा कीं यादें

पोस्टिंग बदलती रही, शहर बदलते रहे, लेकिन 1989 बैच की दोस्ती तीन दशक बाद भी रही कायम

तीन दशक पहले एक साथ वर्दी पहनी थी। फिर किसी की पोस्टिंग एक शहर में हुई तो किसी की दूसरे शहर में। किसी ने परिवार के साथ जिंदगी बिताई तो किसी को नौकरी की मजबूरियों के कारण लंबे समय तक परिवार से दूर रहना पड़ा। लेकिन 30 साल बाद जब RPF के 1989 बैच के साथी खड़गपुर में एक साथ जुटे, तो लगा जैसे वक्त ने फिर से उन पुराने दिनों का दरवाजा खोल दिया हो।

मौका था 89 बैच के 30 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित गेट-टुगेदर कार्यक्रम का। कार्यक्रम में RPF के स्टाफ के साथ उनके परिवारों ने भी हिस्सा लिया। लंबे अंतराल के बाद साथियों और उनके परिवारों का मिलना केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि यह तीन दशक की दोस्ती, संघर्ष और यादों का उत्सव बन गया।

RPF की नौकरी सिर्फ वर्दी पहनने की नौकरी नहीं

रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था में RPF की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। रेलवे संपत्ति, यात्री क्षेत्र और यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियों के बीच RPF कर्मियों को आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर तैनात किया जाता है। कई बार ड्यूटी का मतलब होता है—अपने घर से दूर रहना, अनियमित समय पर काम करना और जरूरत पड़ने पर हर समय ड्यूटी के लिए तैयार रहना।

यही कारण है कि RPF की नौकरी का असर केवल कर्मचारी की जिंदगी तक सीमित नहीं रहता। उसके साथ उसका परिवार भी इस नौकरी की चुनौतियों को जीता है।

बच्चों की पढ़ाई, जीवनसाथी की जिम्मेदारियां, बुजुर्ग माता-पिता और बार-बार बदलती पोस्टिंग के बीच परिवार को कई बार अकेले भी जिम्मेदारियां संभालनी पड़ती हैं। खासकर ऐसी पोस्टिंग जहां परिवार को साथ रखना संभव नहीं होता, वहां RPF कर्मचारी और उसके परिवार के बीच दूरी भी इस नौकरी की एक बड़ी चुनौती बन जाती है।

परिवार भी इस वर्दी की अनकही ताकत

RPF में कर्मचारियों और उनके परिवारों के कल्याण के लिए आवास, चिकित्सा, कैंटीन, खेल एवं मनोरंजन, परिवार कल्याण केंद्र और बच्चों से जुड़ी विभिन्न कल्याणकारी व्यवस्थाओं का प्रावधान है। लेकिन किसी भी सुविधा से बढ़कर परिवार का भावनात्मक सहयोग होता है।

कई RPF परिवारों की कहानी ऐसी है, जहां त्योहार घर के बिना मनाए गए, बच्चों के महत्वपूर्ण अवसरों पर पिता ड्यूटी में रहे और पारिवारिक जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा जीवनसाथी ने संभाला।

इसलिए जब RPF के पुराने साथी एक साथ मिलते हैं, तो वहां सिर्फ कर्मचारी नहीं मिलते—उनके साथ तीन दशक की पारिवारिक यादें भी मिलती हैं।


खड़गपुर में लौटा 30 साल पुराना अपनापन

गेट-टुगेदर में पुराने साथियों ने एक-दूसरे के साथ अपने अनुभव साझा किए। शुरुआती ट्रेनिंग के दिन, पहली पोस्टिंग, ड्यूटी के दौरान के अनुभव, संघर्ष के दौर और साथ बिताए पल फिर चर्चा में आए।

कई चेहरे उम्र के साथ बदल चुके थे, जिम्मेदारियां बदल चुकी थीं, लेकिन आपसी अपनापन वही था। परिवारों की मौजूदगी ने इस मिलन को और खास बना दिया। एक-दूसरे के परिवारों से परिचय, पुराने साथियों की यादें और वर्षों बाद साथ बैठने का अवसर इस कार्यक्रम को एक भावनात्मक मिलन में बदल गया।

तीस साल का यह सफर सिर्फ नौकरी का सफर नहीं था। यह दोस्ती, अनुशासन, जिम्मेदारी, त्याग और परिवार के सहयोग की कहानी भी है।

खड़गपुर में हुआ यह गेट-टुगेदर इसी बात की याद दिलाता है कि वर्दी के साथ पोस्टिंग बदल सकती है, शहर बदल सकते हैं और समय गुजर सकता है, लेकिन सच्ची दोस्ती अगर दिल में हो तो तीन दशक बाद भी वह उतनी ही मजबूत दिखाई देती है।