सरायकेला। आजादी के 78 साल बाद भी अगर किसी गांव के लोग सड़क बनाने के लिए खुद कुदाल और गैंता उठाने को मजबूर हो जाएं, तो सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, बल्कि विकास के सरकारी दावों की हकीकत का है। चांडिल अनुमंडल के नीमडीह प्रखंड अंतर्गत बाड़ेदा पंचायत के शियालगोड़ा, काशीडीह, रापकाड़ा और भूषणडीह टोला के करीब 200 आदिवासी परिवारों ने सोमवार को कुछ ऐसा ही संदेश दिया।

26 साल से कच्ची है मुख्य सड़क

पुरुलिया-जमशेदपुर की सीमा से सटे इन गांवों को जोड़ने वाली सांसागडीह होते हुए शियालगोड़ा तक की करीब 3 किलोमीटर मुख्य सड़क आजादी के बाद से अब तक कच्ची है। बरसात में यही रास्ता ग्रामीणों के लिए मुसीबत बन जाता है। लगातार उपेक्षा से नाराज ग्रामीणों ने सोमवार को सरकारी व्यवस्था का इंतजार छोड़कर निजी स्तर पर श्रमदान से सड़क को चलने लायक बनाने का बीड़ा उठा लिया।

मुखिया वरुण कुमार सिंह सरदार के नेतृत्व में 200 से अधिक ग्रामीण कुदाल, गैंता और अन्य औजार लेकर सड़क पर उतर गए। ट्रैक्टर से करीब 10 हजार सीएफटी मुरुम लाकर सड़क पर डाला गया और ग्रामीणों ने घंटों श्रमदान कर रास्ते को आवागमन योग्य बनाया।

"वोट मांगने आए तो गांव में बैरिकेडिंग मिलेगी"

सड़क निर्माण के दौरान ग्रामीणों का आक्रोश खुलकर सामने आया। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि अगर उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो आगामी चुनाव में हर गांव में बैरिकेडिंग की जाएगी और सांसद, विधायक तथा अधिकारियों को गांव में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा। ग्रामीणों ने साफ शब्दों में कहा कि जो जनप्रतिनिधि पांच साल तक गांव की सड़क नहीं बना सके, उन्हें चुनाव के समय वोट मांगने का अधिकार कैसे मिल सकता है?

ग्रामीणों के मुताबिक झारखंड अलग राज्य बने करीब 26 वर्ष हो गए, लेकिन उनके गांव तक आज भी पक्की सड़क, बिजली, शुद्ध पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह नहीं पहुंच सकी हैं।

"बीमार को 3 किलोमीटर कंधे पर ढोना पड़ता है"

ग्रामीणों की सबसे बड़ी पीड़ा स्वास्थ्य सुविधा को लेकर है। बाड़ेदा स्वास्थ्य केंद्र करीब 3-4 किलोमीटर दूर है, लेकिन खराब और कीचड़ भरे रास्ते के कारण एम्बुलेंस का गांव तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। आपात स्थिति में मरीजों को कंधे पर उठाकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है। बरसात के मौसम में हाथी, भालू, सांप-बिच्छू जैसे जंगली जीवों का खतरा भी ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त परेशानी बन जाता है।

सहिया शांतिमय मार्डी ने कहा कि वह लगातार ग्रामीणों की समस्याओं को लेकर आवाज उठाती रही हैं, लेकिन अब बोलते-बोलते थक चुकी हैं। उनका कहना है कि समय पर एम्बुलेंस नहीं पहुंचने के कारण कई महिलाओं का प्रसव घर पर ही कराने की मजबूरी बन जाती है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब विधायक और मुख्यमंत्री दोनों आदिवासी हैं, तो फिर आदिवासी गांवों की यह स्थिति क्यों बनी हुई है?

राजू सोरेन ने कहा कि आदिवासियों ने देश की आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया, लेकिन आज भी उनके गांव में सड़क, पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। उन्होंने कहा कि मरीजों को तीन किलोमीटर तक कंधे पर ढोना पड़ता है और खराब रास्ते के कारण बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है।

शिलान्यास हुआ, सड़क नहीं बनी—ग्रामीणों का सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि इस सड़क का करीब तीन किलोमीटर हिस्सा साधु महतो के कार्यकाल में शिलान्यास किया गया था। इसके बाद सड़क निर्माण की दिशा में कोई ठोस काम नहीं हुआ। ग्रामीणों ने तंज कसते हुए कहा कि कागज और अखबारों में विकास योजनाओं के शिलान्यास की खबरें लगातार आती हैं, लेकिन शियालगोड़ा की जमीन पर विकास आज भी दिखाई नहीं देता।

सोमवार को सड़क निर्माण के दौरान बलराम मंडी, श्याम प्रसाद हांसदा, जीतू बेसरा, राजू सोरेन समेत सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे।

सबसे बड़ा सवाल यही है—जब सरकार की मशीनरी 78 वर्षों में गांव तक सड़क नहीं पहुंचा सकी, तो क्या अब ग्रामीणों का खुद सड़क बनाना ही विकास की नई तस्वीर है?