काटिया पुनर्वास स्थल पर विस्थापितों के अधिकारों पर रोक का आरोप, 3 दिन का अल्टीमेटम

तालाब में स्नान, सार्वजनिक रास्ते से आवाजाही और मवेशी चराने से रोकने का दावा, पत्थर मारकर भगाने का भी आरोप

विस्थापितों ने थाना, एसडीपीओ और पुनर्वास विभाग को सौंपा आवेदन—कहा, कार्रवाई नहीं हुई तो शुरू होगा आंदोलन

चांडिल डैम के विस्थापितों के पुनर्वास स्थल काटिया में अब जमीन के साथ-साथ दैनिक जीवन के अधिकारों को लेकर भी विवाद खड़ा होता दिखाई दे रहा है। रूदिया पंचायत अंतर्गत काटिया पुनर्वास स्थल के विस्थापितों ने कुछ स्थानीय लोगों पर तालाब में स्नान करने, सार्वजनिक रास्ते से आने-जाने, खुले मैदान के उपयोग और मवेशी चराने से रोकने तथा धमकाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। विस्थापितों का दावा है कि विरोध करने पर उन्हें पत्थर मारकर भगाने तक की घटना सामने आई है।

विस्थापितों का कहना है कि पुनर्वास के नाम पर उन्हें जमीन तो मिली, लेकिन अब उसी पुनर्वास स्थल पर तालाब, रास्ते और सार्वजनिक उपयोग की जगहों को लेकर उनका अधिकार सीमित करने की कोशिश की जा रही है। सवाल यह है कि यदि किसी जमीन या सार्वजनिक स्थल की सीमा को लेकर विवाद है, तो उसका फैसला प्रशासनिक स्तर पर सीमांकन और दस्तावेजों की जांच से होना चाहिए या फिर ग्रामीणों के बीच टकराव की स्थिति पैदा होने दी जाएगी?

“सरकार ने 12.5 डिसमिल जमीन दी है, उसी के भीतर रहो” का आरोप

विस्थापितों के अनुसार काटिया टोला गोड़डीह निवासी मोहन गौड़, शिव चरण सिंह, बैलून सिंह, बृहस्पति सिंह, रवि सिंह सहित कुछ अन्य लोगों पर उन्हें सार्वजनिक स्थानों के उपयोग से रोकने और धमकाने का आरोप है। विस्थापितों का कहना है कि कथित तौर पर उनसे कहा गया कि “सरकार ने विस्थापितों को 12.5 डिसमिल जमीन दी है, उसी के भीतर रहो।”

विस्थापितों का सवाल है कि क्या पुनर्वास के बाद उन्हें केवल आवंटित जमीन की चारदीवारी तक सीमित किया जा सकता है? यदि तालाब, रास्ता या अन्य सार्वजनिक उपयोग की भूमि को लेकर कोई कानूनी विवाद है, तो उसकी स्थिति प्रशासन स्पष्ट करे।

पत्थर मारकर भगाने और महिलाओं को तालाब में स्नान से रोकने का आरोप

पुनर्वास स्थल निवासी जगन्नाथ किस्कू ने आरोप लगाया कि शौच के लिए जाते समय उन्हें पत्थर मारकर वहां से भगाया गया। वहीं पूनम देवी का आरोप है कि वह अपने बच्चों के साथ तालाब में स्नान करने पहुंचीं, लेकिन उन्हें वहां स्नान करने से रोक दिया गया।

इन आरोपों ने पुनर्वास स्थल की सुरक्षा और सामाजिक माहौल को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। विस्थापितों का कहना है कि वर्षों से विस्थापन का दंश झेल रहे परिवारों को अब यदि पुनर्वास स्थल पर भी रोजमर्रा की बुनियादी गतिविधियों के लिए रोका जाएगा, तो प्रशासन को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।

थाना से पुनर्वास विभाग तक पहुंचा मामला

मामले को लेकर विस्थापितों ने चांडिल थाना प्रभारी और अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी को लिखित आवेदन सौंपकर घटना की जांच, सुरक्षा और कार्रवाई की मांग की है। इसके साथ ही पुनर्वास कार्यालय संख्या-2 से स्थल का सीमांकन कराने तथा विस्थापितों के अधिकार स्पष्ट करने की मांग की गई है। आवेदन की प्रतिलिपि कार्यपालक अभियंता, केंद्रीय भंडार एवं शिविर प्रमंडल, चांडिल बांध अंचल तथा अधीक्षण अभियंता को भी सौंपी गई है।

तीन दिन में कार्रवाई नहीं तो आंदोलन की चेतावनी

विस्थापितों ने प्रशासन को तीन दिनों का अल्टीमेटम दिया है। उनकी मांग है कि प्रशासन तत्काल काटिया पुनर्वास स्थल का निरीक्षण करे, विवादित स्थलों का निष्पक्ष सीमांकन कराए और विस्थापित परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि तीन दिनों के भीतर उचित कार्रवाई नहीं हुई तो वे अपने अधिकारों और सुरक्षा की मांग को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन शुरू करने को बाध्य होंगे।

सवाल अब प्रशासन से है

चांडिल डैम विस्थापित वर्षों से पुनर्वास, मुआवजा और अधिकारों से जुड़े सवाल उठाते रहे हैं। काटिया में सामने आया ताजा विवाद यदि वास्तव में सार्वजनिक रास्ते, तालाब और अन्य उपयोगी स्थलों तक विस्थापितों की पहुंच रोकने से जुड़ा है, तो प्रशासन के सामने अब दोहरी जिम्मेदारी है—एक ओर आरोपों की निष्पक्ष जांच और दूसरी ओर जमीन एवं सार्वजनिक उपयोग की सीमाओं को स्पष्ट करना।

फिलहाल मामले में लगाए गए आरोपों की प्रशासनिक जांच और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना बाकी है। जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि विवाद की वास्तविक स्थिति क्या है और सार्वजनिक स्थलों के उपयोग को लेकर किसके दावे वैध हैं।

इस दौरान जगन्नाथ किस्कू, पूनम देवी, बिरबल प्रमाणिक, राकेश रंजन महतो, श्यामल मार्डी, नारायण गोप, अंबिका यादव, शोभा रानी, सुनीता महाली सहित बड़ी संख्या में महिला-पुरुष विस्थापित मौजूद रहे।