संपादकीय | जमीनी आवाज

झारखंड में एक बार फिर JPSC परीक्षा को लेकर विवाद गहरा गया है। कहीं पेपर लीक के आरोप हैं, कहीं परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल, तो कहीं अभ्यर्थियों का सड़क पर उतरकर विरोध। सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पेपर लीक हुआ या नहीं, बल्कि यह है कि क्या युवाओं का सरकारी भर्ती प्रणाली पर भरोसा बचा है?

झारखंड जैसे राज्य में लाखों युवा वर्षों तक दिन-रात मेहनत कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। परिवार कर्ज लेकर कोचिंग कराता है, माता-पिता उम्मीदों का बोझ उठाते हैं और अभ्यर्थी अपनी जवानी का सबसे सुनहरा समय एक नौकरी के सपने में लगा देते हैं। लेकिन जब बार-बार परीक्षा पर सवाल उठते हैं, तो केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था कटघरे में खड़ी हो जाती है।

अगर पेपर लीक हुआ है, तो यह सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि मेहनत और ईमानदारी की हत्या है। और यदि पेपर लीक नहीं हुआ, तब भी सरकार और आयोग की जिम्मेदारी है कि वे पूरी पारदर्शिता के साथ सभी तथ्यों को सार्वजनिक करें। आधे-अधूरे स्पष्टीकरण और चुप्पी केवल संदेह को जन्म देते हैं।

आज स्थिति यह है कि झारखंड में हर बड़ी भर्ती परीक्षा के बाद पहला सवाल यही उठता है—"क्या इस बार भी पेपर लीक हुआ?" यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक संकेत है। जब अभ्यर्थी परिणाम से पहले ही परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था को आत्ममंथन की आवश्यकता है।

सरकार को चाहिए कि आरोपों की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराए। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या साजिश सामने आती है, तो दोषियों पर ऐसी कार्रवाई हो जो भविष्य के लिए मिसाल बने। वहीं, यदि आरोप निराधार हैं, तो उसकी भी पूरी तथ्यात्मक रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए ताकि अफवाहों पर विराम लगे।

झारखंड के युवाओं को आश्वासन नहीं, विश्वास चाहिए। उन्हें बयान नहीं, पारदर्शी व्यवस्था चाहिए। क्योंकि सरकारी नौकरी सिर्फ रोजगार नहीं, लाखों परिवारों की उम्मीद होती है।

याद रखिए, पेपर लीक होने से सिर्फ प्रश्नपत्र नहीं लीक होता—युवाओं का भरोसा, उनका भविष्य और व्यवस्था की साख भी लीक हो जाती है।

— संपादकीय, जमीनी आवाज
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