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घाटशिला में कुकुरमुत्ते की तरह उगते NGO: सेवा की आड़ में कौन चला रहा है खेल?
By असित भट्टाचार्य09 September 2026 at 02:13 am51 views

पूर्वी सिंहभूम में NGO की बाढ़, फंडिंग से लेकर गतिविधियों तक उठ रहे सवाल—क्या हर संस्था सच में जनसेवा के लिए है?
घाटशिला----असित भट्टाचार्य
कभी जनसेवा, कभी महिला सशक्तीकरण, कभी शिक्षा, स्वास्थ्य और आदिवासी विकास के नाम पर पूर्वी सिंहभूम, खासकर घाटशिला क्षेत्र में NGO और स्वयंसेवी संस्थाओं की संख्या लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। सवाल NGO के अस्तित्व पर नहीं, बल्कि उनकी गतिविधियों, फंडिंग, पंजीकरण, खर्च और वास्तविक कामकाज की पारदर्शिता पर है।
घाटशिला जैसे ग्रामीण और आदिवासी बहुल इलाके में यदि कोई संस्था वास्तव में जमीन पर काम कर रही है तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि कितनी संस्थाएं वास्तव में जमीन पर हैं और कितनी सिर्फ कागजों, परियोजनाओं और फंड के हिसाब-किताब में?
सबसे गंभीर चिंता तब पैदा होती है जब NGO के नाम या उसके नेटवर्क से जुड़ी गतिविधियों पर साइबर अपराध जैसे गंभीर आरोप या शिकायतें सामने आने लगें। घाटशिला में पिछले दिनों ऐसी ही एक कथित साइबर क्राइम से जुड़ी खबर चर्चा में आई थी, लेकिन मामला ज्यादा आगे नहीं बढ़ सका। अब सवाल उठना स्वाभाविक है कि मामला दब गया, जांच ठंडी पड़ गई या फिर पूरी सच्चाई सामने ही नहीं लाई गई?
NGO नहीं, व्यवस्था की जांच जरूरी
NGO अपने आप में अपराध का पर्याय नहीं हैं। देश में हजारों संस्थाएं ईमानदारी से शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला और बाल कल्याण तथा सामाजिक विकास के क्षेत्र में काम कर रही हैं। लेकिन इसी क्षेत्र में यदि कुछ संस्थाओं की आड़ में संदिग्ध गतिविधियां चल रही हों तो प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
घाटशिला में जरूरत है कि प्रशासन और संबंधित विभाग यह स्पष्ट करें—
क्षेत्र में सक्रिय NGO कितने हैं?
उनका वैध पंजीकरण और नवीनीकरण हुआ है या नहीं?
उन्हें देश-विदेश अथवा सरकारी स्तर से कितना फंड प्राप्त हुआ?
फंड का उपयोग किन योजनाओं में किया गया?
कितने NGO वास्तव में जमीन पर काम कर रहे हैं?
उनके बैंक खातों और वित्तीय लेन-देन का नियमानुसार ऑडिट हुआ या नहीं?
और सबसे अहम—क्या किसी NGO अथवा उससे जुड़े लोगों के खिलाफ साइबर अपराध, वित्तीय अनियमितता या अन्य आपराधिक शिकायतें दर्ज हुई हैं?
'सेवा' की सफेद चादर पर सवाल क्यों?
आज जरूरत NGO विरोधी अभियान की नहीं, बल्कि NGO की पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की है। जनहित के नाम पर काम करने वाली संस्था को जनता के सामने अपने काम और फंड का हिसाब रखने में परेशानी क्यों होनी चाहिए?
घाटशिला की जनता यह जानना चाहती है कि जनसेवा के नाम पर चल रही संस्थाओं के पीछे वास्तव में सेवा है या कोई दूसरा कारोबार?
अगर सब कुछ साफ है तो जांच से डर कैसा?
और अगर कहीं कुछ गड़बड़ है, तो फिर जांच से बचाने वाला कौन?
अब सवाल NGO पर नहीं, उस पूरी व्यवस्था पर है जो कागजों पर संस्थाएं पैदा करती है, फंड देती है और फिर उनकी गतिविधियों की निगरानी करना भूल जाती है।
घाटशिला में उठी कथित साइबर क्राइम की वह खबर अगर सच थी, तो उसकी पूरी जांच क्यों नहीं हुई? और अगर गलत थी, तो उसका सच जनता के सामने क्यों नहीं रखा गया?
जमीनी आवाज पूछती है—घाटशिला में बढ़ते NGO के इस जाल का पूरा हिसाब कब सामने आएगा?
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