घाटशिला.... असित भट्टाचार्य 

साहित्य जब समाज से जुड़ता है तो वह केवल अतीत की कहानी नहीं सुनाता, बल्कि वर्तमान को आईना और भविष्य को दिशा भी देता है। घाटशिला में आयोजित विभूति उत्सव 2026 में थाना प्रभारी राजेंद्र कुमार मुंडा का वक्तव्य इसी सोच की एक प्रभावशाली मिसाल बनकर सामने आया।

 आयोजन के सभापति तापुष चटर्जी ने थाना प्रभारी राजेंद्र कुमार मुंडा को सम्मानित किया। सम्मान के बाद जब उन्होंने बोलना शुरू किया तो उनके शब्द सीधे विभूतिभूषण बंदोपाध्याय के कालजयी उपन्यास ‘पाथेर पांचाली’ की दुनिया में ले गए। लेकिन यह सफर केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहा—कुछ ही क्षणों में कहानी का रास्ता आज के घाटशिला के युवाओं तक पहुंच गया। उन्होंने ‘पाथेर पांचाली’ के अपू और दुर्गा के जीवन का संदर्भ सामने रखते हुए यह संदेश देने की कोशिश की कि जिंदगी की असली खूबसूरती महंगी चीजों, दिखावे या तेज जिंदगी में नहीं, बल्कि परिवार, रिश्तों, संस्कार और संघर्ष से लड़कर आगे बढ़ने में है। ‘अपू-दुर्गा का दौर अलग था, आज की चुनौती अलग है’ थाना प्रभारी के वक्तव्य की धार यहीं से और तेज हुई। उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि आज उनके सामने अवसर भी हैं और खतरे भी। मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया ने संभावनाओं के दरवाजे खोले हैं, लेकिन उसी के साथ नशा, गलत संगत, लापरवाह ड्राइविंग और तेज रफ्तार जैसी चुनौतियां भी सामने खड़ी हैं। 

 उनका संदेश साफ था—आधुनिक बनिए, लेकिन अपनी जड़ों को मत छोड़िए। स्वतंत्र सोच रखिए, लेकिन अभिभावकों के अनुभव को नजरअंदाज मत कीजिए। जिंदगी को अपनी गति दीजिए, लेकिन सड़क पर रफ्तार को जिंदगी से बड़ा मत बनने दीजिए। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपने माता-पिता और अभिभावकों की बात को गंभीरता से लें। उन्होंने कहा कि अभिभावक अपने बच्चों को रोकते-टोकते हैं तो उसके पीछे उनका अनुभव और चिंता होती है। आज जिस छोटी-सी गलती को युवा रोमांच समझकर नजरअंदाज कर देता है, वही गलती कभी-कभी पूरे परिवार की जिंदगी में ऐसा खालीपन छोड़ देती है, जिसे फिर कोई भर नहीं सकता। ‘नशा जिंदगी को आधुनिक नहीं, बर्बाद करता है’ नशे के सवाल पर थाना प्रभारी का संदेश और स्पष्ट नजर आया। उन्होंने युवाओं को समझाने की कोशिश की कि नशा किसी समस्या का समाधान नहीं है। यह धीरे-धीरे व्यक्ति की सोच, स्वास्थ्य, परिवार, शिक्षा, रोजगार और भविष्य—सबको अपने कब्जे में ले लेता है।

 उन्होंने युवाओं से कहा कि वे नशे को अपनी पहचान और आधुनिकता का हिस्सा न बनने दें। जिस उम्र में सपने देखने और उन्हें पूरा करने की तैयारी होनी चाहिए, उस उम्र को नशे के धुएं में बर्बाद करना अपने ही भविष्य से धोखा है। ‘रफ्तार रोमांच हो सकती है, लेकिन जिंदगी की कीमत पर नहीं’ तेज रफ्तार वाहन चलाने की प्रवृत्ति पर भी उन्होंने युवाओं को गंभीर संदेश दिया। उनका संकेत साफ था कि सड़क पर कुछ सेकंड का रोमांच जिंदगी भर का पछतावा बन सकता है। बाइक की रफ्तार से ज्यादा महत्वपूर्ण घर पर इंतजार कर रहे माता-पिता और परिवार का भरोसा है। उन्होंने युवाओं को यह सोचने का संदेश दिया कि सड़क पर निकलते समय केवल अपनी जान नहीं, बल्कि दूसरे लोगों की जिंदगी की जिम्मेदारी भी उनके हाथ में होती है। साहित्य और संस्कृति से जुड़ें, तभी आधुनिकता सार्थक होगी थाना प्रभारी ने युवाओं को साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों में भागीदारी के लिए भी प्रेरित किया। उनका संदेश था कि युवा केवल तकनीक और सोशल मीडिया की दुनिया के उपभोक्ता बनकर न रहें, बल्कि साहित्य पढ़ें, संस्कृति को समझें, समाज से जुड़ें और अपनी जड़ों को पहचानें। ‘पाथेर पांचाली’ से शुरू हुई उनकी बात अंततः इसी संदेश पर आकर ठहरी कि समय कितना भी आधुनिक क्यों न हो जाए, इंसान को इंसान बनाए रखने वाली चीजें—संस्कार, परिवार, संवेदना और जिम्मेदारी—कभी पुरानी नहीं होतीं।

 विभूतिभूषण बंदोपाध्याय की 133वीं जयंती के अवसर पर आयोजित इस उत्सव में थाना प्रभारी राजेंद्र कुमार मुंडा का यह वक्तव्य साहित्यिक आयोजन से आगे बढ़कर घाटशिला के युवाओं के लिए एक सामाजिक संदेश बन गया— नशे को ना कहें, रफ्तार को नियंत्रित करें, अभिभावकों की सुनें और आधुनिकता के साथ अपनी संस्कृति और संस्कारों को भी साथ लेकर चलें।