घाटशिला... असित भट्टाचार्य
कभी-कभी कोई जगह सिर्फ जगह नहीं रहती, वह इतिहास बन जाती है। कोई नदी सिर्फ नदी नहीं रहती, वह किसी कहानी का हिस्सा बन जाती है और कोई लेखक सिर्फ लेखक नहीं रहता—वह उस मिट्टी की आवाज बन जाता है। घाटशिला की धरती और महान कहानीकार विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय का रिश्ता कुछ ऐसा ही है।
इसी रिश्ते को महसूस करने, यादों को फिर से जीवंत करने और साहित्य को नई पीढ़ी के सामने उसी संवेदना के साथ रखने का खूबसूरत प्रयास देखने को मिला गौरीकुंज में आयोजित ‘विभूति उत्सव 2026’ में। विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की 133वीं जयंती पर आयोजित यह समारोह देखते-देखते सिर्फ श्रद्धांजलि का कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि साहित्य, संस्कृति और स्मृति का ऐसा संगम बन गया, जहां घाटशिला की आत्मा मंच पर उतरती दिखाई दी।




मंच पर जब करम, झूमर, पाता और छऊ की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां हुईं, तो लगा जैसे किताबों में दर्ज गांव, जंगल, प्रकृति और लोकजीवन फिर से आंखों के सामने आ खड़ा हुआ हो। नृत्य-नाटिका, गीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने वातावरण को जीवंत बना दिया। विभूतिभूषण को याद करना यानी अपनी मिट्टी को याद करना विभूतिभूषण की रचनाओं में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं थी, बल्कि वह स्वयं एक पात्र की तरह मौजूद रहती थी। गांव, जंगल, नदी, साधारण इंसान और उसकी छोटी-छोटी खुशियां उनकी साहित्यिक दुनिया की ताकत थीं।
इसलिए घाटशिला में उनकी जयंती मनाना महज किसी महान साहित्यकार की तस्वीर पर पुष्प अर्पित करना नहीं है। यह उस साहित्यिक विरासत के सामने सिर झुकाना है, जिसने इस धरती को शब्दों में अमर किया। ‘विभूति उत्सव 2026’ ने इसी भाव को सामने रखा। जब संस्कृति ने संभाली स्मृतियों की मशाल गौरीकुंज उन्नयन समिति की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम की खूबसूरती यह रही कि इसमें स्मृति को सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रखा गया। साहित्य के साथ लोक संस्कृति को जोड़ा गया। मंच पर प्रस्तुतियां हुईं। कलाकारों ने अपनी कला के माध्यम से परंपरा को जीवित किया और दर्शकों ने उस विरासत को महसूस किया। यही किसी सांस्कृतिक आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि है— जब इतिहास किताब से निकलकर लोगों के बीच सांस लेने लगे। कार्यक्रम की सफलता में तपोश चटर्जी, शिल्पी सरकार, सुमन गुप्त और कोषाध्यक्ष मीनल कांति बिस्वास के साथ आयोजन और सहयोग से जुड़े डॉ. संदीप चंद्र, पूर्णिमा राय, शिखा मुखर्जी, प्रदीप भद्रा, शिखरक्षित, सोम सरकार, साधना पाल, नीलू दत्त, साधु चरण पाल, उत्तम सिंह, श्याम सरकार, अर्पिता राय, अर्चना शर्मा, पुतुल मुखर्जी, संदीप राय चौधरी, शिवाजी चटर्जी, पार्थो प्रतिम घोष, गौतम बारिक, टोप्पो वर्तक, गिरी अरूप चौधरी, मौसमी दत्त, रश्मि शर्मा, पल्लब डे, दीपक गठईटी, सुभाष दे, लक्ष्मी मुर्मू, सुभाष दास और राखाल बिसोय समेत अनेक लोगों की सहभागिता रही।
घाटशिला को सिर्फ विकास नहीं, अपनी सांस्कृतिक पहचान भी बचानी होगी आज के दौर में जब नई पीढ़ी तेजी से डिजिटल दुनिया की ओर बढ़ रही है, ऐसे आयोजन एक महत्वपूर्ण सवाल भी छोड़ जाते हैं— क्या हम अपने बच्चों को सिर्फ आधुनिक दुनिया से जोड़ना चाहते हैं, या उन्हें यह भी बताएंगे कि जिस जमीन पर वे खड़े हैं, उसकी अपनी एक कहानी है? घाटशिला की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता से है, लेकिन उसकी आत्मा उसकी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत में भी बसती है। इस विरासत को बचाने की जिम्मेदारी केवल किसी संस्था या आयोजन समिति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। जमीनी आवाज की नजर में... विभूति उत्सव 2026 की सबसे बड़ी उपलब्धि मंच पर हुए कार्यक्रम नहीं, बल्कि वह भावना है जो कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी लोगों के भीतर बची रही। क्योंकि साहित्य मरता नहीं, अगर समाज उसे याद रखता है। संस्कृति मिटती नहीं, अगर नई पीढ़ी उसे अपनाती है। और किसी महान रचनाकार की स्मृति कमजोर नहीं पड़ती, अगर उसकी कर्मभूमि उसकी कहानी को अपनी कहानी मानकर आगे बढ़ाती रहे। गौरीकुंज में आयोजित यह उत्सव इसी उम्मीद की मशाल लेकर आगे बढ़ा है। विभूतिभूषण की कलम ने कभी घाटशिला को शब्द दिए थे। अब घाटशिला की संस्कृति उन शब्दों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का काम कर रही है। यही है ‘विभूति उत्सव’ की असली कहानी। यही है उस मिट्टी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि।





