बंद कंपनी से बन रहे विद्युत पोल या फाइलों में चल रहा खेल? घाटशिला में विद्युत विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल
आरपी कंक्रीट का CTO 2019 में खत्म होने का दावा, 2020 से कंपनी बंद होने की बात; फिर मुसाबनी में विद्युत विभाग के काम में इसी कंपनी की भूमिका कैसे?
नए पोल लगाने का पैसा मिलता है तो पुराने पोल हटाने और नष्ट करने का भुगतान कहां जा रहा? घाटशिला अनुमंडल में सैकड़ों पुराने पोल आज भी खड़े, कई जमीन पर गिरे

विद्युत विभाग के काम में इस्तेमाल होने वाले कंक्रीट पोल की गुणवत्ता, निर्माण करने वाली कंपनी के पर्यावरणीय अनुपालन और पुराने पोल हटाने के नाम पर होने वाले खर्च को लेकर घाटशिला अनुमंडल में सवाल खड़े हो रहे हैं। मामला सिर्फ एक कंपनी का नहीं है, बल्कि यह सवाल विद्युत विभाग की पूरी कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर भी उठ रहा है।
घाटशिला अनुमंडल में आरपी कंक्रीट नाम से संचालित पोल निर्माण कंपनी को लेकर उपलब्ध जानकारी और सामने आए दस्तावेजों ने कई सवाल खड़े किए हैं। विद्युत विभाग के ठेकेदार प्रणब कृष्ण पाल के अनुसार कंपनी अनुराधा पाल के नाम से है। उनका दावा है कि कंपनी वर्ष 2020 से बंद पड़ी है, जबकि कंपनी के प्लांट का Consent to Operate (CTO) वर्ष 2019 में ही समाप्त हो चुका है।
सबसे बड़ा सवाल यहीं से शुरू होता है—यदि कंपनी वास्तव में 2020 से बंद है और उसका CTO 2019 में समाप्त हो चुका है, तो हाल के दिनों में मुसाबनी क्षेत्र में विद्युत विभाग के काम में इस कंपनी से जुड़े पोल या कार्य कैसे इस्तेमाल हुए?




प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रिकॉर्ड पर भी सवाल
झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, आदित्यपुर से संबंधित जानकारी के अनुसार कंपनी की ओर से प्रदूषण संबंधी अनुमति के नवीनीकरण का मामला भी सवालों के घेरे में है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक कंपनी ने अब तक प्रदूषण संबंधी लाइसेंस/सहमति का नवीनीकरण नहीं कराया है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, लागू औद्योगिक इकाइयों को संचालन से पहले संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से आवश्यक Consent to Establish और Consent to Operate प्राप्त करना होता है तथा ये अनुमतियां समय-समय पर नवीनीकृत की जाती हैं। Water Act के तहत भी संबंधित परिस्थितियों में राज्य बोर्ड की पूर्व सहमति के बिना ऐसी औद्योगिक गतिविधि स्थापित या संचालित करने पर कानूनी प्रावधान लागू होते हैं।
ऐसे में सवाल सीधा है—अगर आरपी कंक्रीट का संचालन वास्तव में बंद था, CTO समाप्त था और प्रदूषण संबंधी अनुमति का नवीनीकरण नहीं हुआ था, तो विद्युत विभाग के हालिया काम में कंपनी की भूमिका क्या थी?
नया पोल लगा, पुराना पोल गया कहां?
घाटशिला अनुमंडल में दूसरा सवाल इससे भी बड़ा है। विद्युत विभाग की ओर से कई इलाकों में पुराने पोल हटाकर नए पोल लगाए जाते हैं। नए पोल लगाने के काम के साथ पुराने पोल को हटाने या नष्ट करने से संबंधित कार्य और भुगतान भी होने की बात सामने आती है।
लेकिन जमीन पर तस्वीर कुछ और नजर आती है। अनुमंडल के विभिन्न इलाकों में बड़ी संख्या में पुराने विद्युत पोल आज भी उसी तरह खड़े दिखाई देते हैं। कई पुराने पोल गिर चुके हैं, कई बेकार हालत में पड़े हैं, जबकि कई जगह नए पोल लगाए जाने के बावजूद पुराने पोल हटाए नहीं गए।
ऐसे में विभाग से सबसे अहम सवाल हैं:
- नए पोल लगाने और पुराने पोल हटाने/नष्ट करने के नाम पर कितनी राशि स्वीकृत हुई?
- कितने पुराने पोल वास्तव में नष्ट किए गए?
- कितने पोल हटाकर विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज किए गए?
- इस मद में अब तक कितना भुगतान किया गया?
अगर पुराने पोल वास्तव में नष्ट नहीं किए गए, तो पुराने पोल हटाने या नष्ट करने के नाम पर भुगतान हुआ या नहीं—इसका हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए।
कागज में पुराने पोल हटे या जमीन पर अब भी खड़े हैं?
यह मामला सिर्फ सरकारी पैसे का नहीं है। पुराने और जर्जर पोल तथा विद्युत सामग्री का मौके पर पड़े रहना सुरक्षा से भी जुड़ा सवाल है। अगर विभाग के रिकॉर्ड में किसी पुराने पोल को हटाया हुआ या नष्ट दिखाया गया है, लेकिन वही पोल मौके पर मौजूद है, तो यह रिकॉर्ड और जमीन की हकीकत के बीच अंतर का मामला बन सकता है।
इसलिए विभाग को प्रत्येक कार्यस्थल का भौतिक सत्यापन कर यह बताना चाहिए कि कितने नए पोल लगाए गए और उसके बदले कितने पुराने पोल हटाए गए।
राजेश स्टेट में तारों की हालत—किस हादसे का इंतजार?
घाटशिला अनुमंडल के राजेश स्टेट क्षेत्र में विद्युत विभाग द्वारा हाल में खींचे गए तारों की स्थिति को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी है। लोगों का आरोप है कि कई जगह तारों की स्थिति बेहद खराब है और इससे कभी भी गंभीर दुर्घटना की आशंका बनी हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शिकायत करने के बावजूद उनकी बात न तो ठेकेदार गंभीरता से सुनते हैं और न ही विभागीय स्तर पर प्रभावी कार्रवाई होती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि विद्युत लाइन बिछाने के बाद उसकी सुरक्षा और गुणवत्ता की जांच कौन करता है?
- क्या विभागीय अधिकारियों ने इन तारों और पोलों का भौतिक निरीक्षण किया?
- क्या काम पूरा होने के बाद गुणवत्ता की जांच की गई?
- क्या ठेकेदार को भुगतान से पहले सुरक्षा मानकों की जांच हुई?
- अगर हुई, तो राजेश स्टेट जैसे इलाकों में जमीन पर यह बदहाल स्थिति क्यों दिखाई दे रही है?
विभाग जवाब दे—कंपनी से लेकर पुराने पोल तक पूरा हिसाब सामने आए
घाटशिला अनुमंडल में मामला अब सिर्फ एक पोल बनाने वाली कंपनी का नहीं रह गया है। सवाल यह है कि विद्युत विभाग के काम की निगरानी कैसे हो रही है और सरकारी भुगतान के बाद जमीन पर वास्तविक काम कितना हुआ? विद्युत विभाग को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि—
- आरपी कंक्रीट का वर्तमान CTO स्टेटस क्या है?
- कंपनी ने अंतिम बार प्रदूषण संबंधी अनुमति कब प्राप्त की थी?
- यदि कंपनी 2020 से बंद थी, तो मुसाबनी में हालिया कार्य में उसके पोल/सामग्री कैसे इस्तेमाल हुई?
- पिछले वर्षों में आरपी कंक्रीट से कितने पोल खरीदे या लगाए गए?
- नए पोल लगाने के साथ पुराने पोल हटाने/नष्ट करने के लिए कितनी राशि स्वीकृत और भुगतान की गई?
- अब तक कितने पुराने पोल वास्तव में हटाए या नष्ट किए गए?
- विभागीय रिकॉर्ड और जमीन पर मौजूद पोलों का मिलान कब किया गया?
- राजेश स्टेट और अन्य संवेदनशील इलाकों में विद्युत तारों की सुरक्षा जांच कब हुई?
सवाल सिर्फ पोल का नहीं है—सवाल उस व्यवस्था का है, जहां सरकारी फाइल में काम पूरा होने के बाद भी जमीन पर पुराने पोल खड़े दिखाई देते हैं और जर्जर तार लोगों की जान के लिए खतरा बने हुए हैं।
अब देखना यह है कि विद्युत विभाग इन सवालों का जवाब देता है या फिर फाइलों की चुप्पी जमीन पर मौजूद पोलों और तारों की सच्चाई पर भारी पड़ती है।





