बिलारी। जन आंदोलनों की बुलंद आवाज, राष्ट्रवादी विचारक, शिक्षाविद एवं वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. राकेश रफीक के निधन की खबर से सामाजिक और जनआंदोलन से जुड़े लोगों में शोक की लहर है। लंबे समय तक आम आदमी, किसानों और जनहित के मुद्दों को लेकर संघर्ष करने वाले डॉ. रफीक अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन की जानकारी उनके शिष्य एवं अनुयायी गौरव क्रांति ने दी।

डॉ. राकेश रफीक का अंतिम संस्कार 28 सितंबर 2026 को सुबह 10 बजे बिलारी श्मशान घाट पर किया जाएगा।
आंदोलन की पाठशाला में गुरु थे डॉ. रफीक
डॉ. राकेश रफीक का जीवन केवल एक व्यक्ति का जीवन नहीं, बल्कि लंबे सामाजिक और जनआंदोलनों के संघर्षों की एक यात्रा रहा। जेपी आंदोलन से लेकर अन्ना आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन, किसान आंदोलनों और विभिन्न जनहित के संघर्षों तक वे सक्रिय रहे।
उन्होंने आंदोलनों को केवल भीड़ जुटाने या नारे लगाने का माध्यम नहीं माना, बल्कि आम आदमी के सवालों को सत्ता और व्यवस्था के सामने मजबूती से रखने का जरिया बनाया।

अन्याय, भ्रष्टाचार और जनसमस्याओं के खिलाफ आवाज उठाना उनके सार्वजनिक जीवन की प्रमुख पहचान रही।
गौरव क्रांति ने गुरु को किया याद
डॉ. राकेश रफीक के शिष्य गौरव क्रांति अपने गुरु को याद करते हुए भावुक हैं। उनका कहना है कि “आंदोलन और राजनीति का क, ख, ग, घ मैंने रफीक जी से ही सीखा।”
गौरव क्रांति के अनुसार डॉ. रफीक उनके लिए केवल गुरु नहीं थे, बल्कि आंदोलनों को समझने, जनहित के मुद्दों को पहचानने और संघर्ष का रास्ता सीखने वाले मार्गदर्शक थे।
उन्होंने कहा कि रफीक जी ने उन्हें केवल आंदोलन करने की तकनीक नहीं सिखाई, बल्कि यह भी सिखाया कि जनता के बीच रहकर जनता के सवालों को समझना और उनके लिए खड़े होना ही असली संघर्ष है।
जेपी आंदोलन से शुरू हुआ संघर्ष का सफर
डॉ. रफीक के आंदोलनकारी जीवन की शुरुआत जेपी आंदोलन से जुड़ी रही। इसके बाद वे किसान आंदोलनों, नर्मदा बचाओ आंदोलन, अन्ना आंदोलन सहित कई जनसरोकारों से जुड़े संघर्षों में सक्रिय रहे।
उनका मानना था कि किसी भी आंदोलन का केंद्र आम आदमी की समस्या होनी चाहिए। किसानों, मजदूरों और आम नागरिकों से जुड़े सवालों को लेकर वे लगातार सक्रिय रहे।
उनकी संघर्ष यात्रा का एक कठिन अध्याय भ्रष्टाचार और राजनीति में अपराधीकरण के खिलाफ आंदोलनों से भी जुड़ा रहा। संघर्ष के दौरान उन्हें गंभीर परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद उनका सामाजिक सरोकार समाप्त नहीं हुआ और वे सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय बने रहे।
अंतिम समय तक जनहित के सवालों से जुड़े रहे
श्रद्धांजलि संदेश के अनुसार जीवन के अंतिम दौर में भी डॉ. राकेश रफीक जनहित के मुद्दों से जुड़े रहे। उम्र और परिस्थितियों के बावजूद आम लोगों की समस्याओं को लेकर उनकी चिंता कम नहीं हुई।
यही उनके व्यक्तित्व की प्रमुख पहचान रही—मुद्दा कोई भी हो, यदि वह जनता से जुड़ा है तो उस पर आवाज उठाना जरूरी है।

“गुरु चले गए, लेकिन संघर्ष की मशाल छोड़ गए”
गौरव क्रांति के लिए रफीक जी का जाना केवल व्यक्तिगत क्षति नहीं है। उनके शब्दों में, जिस व्यक्ति से उन्होंने आंदोलन और राजनीति की बुनियादी समझ सीखी, वही आज उनके बीच नहीं है।
डॉ. राकेश रफीक के समर्थकों और अनुयायियों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा जनहित, सामाजिक न्याय और आम आदमी की आवाज को मजबूत करने में लगाया।
उनके निधन के बाद अब उनके साथियों और शिष्यों के सामने उनकी विचारधारा और संघर्ष की विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है।
28 सितंबर की सुबह बिलारी श्मशान घाट पर डॉ. राकेश रफीक को अंतिम विदाई दी जाएगी। जमिनी आवाज परिवार की ओर से डॉ. राकेश रफीक को भावभीनी श्रद्धांजलि।
“संघर्ष कभी समाप्त नहीं होता—संघर्ष की मशाल आगे बढ़ती रहती है।”





