जमशेदपुर में POSH Act-2013 पर विशेष प्रशिक्षण, महिलाओं से चुप्पी तोड़ने और कानूनी अधिकारों के लिए आगे आने की अपील

जमशेदपुर। विजय कुमार गोप की रिपोर्ट

क्या हर महिला अपने कार्यस्थल पर वास्तव में सुरक्षित महसूस करती है? क्या अपमान, अभद्र टिप्पणी, अश्लील इशारे या यौन उत्पीड़न का शिकार होने के बाद भी कई महिलाएं डर, शर्म या दबाव के कारण चुप रह जाती हैं? ऐसे ही गंभीर सवालों के बीच कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर जिला विधिक सेवा प्राधिकार, जमशेदपुर ने एक महत्वपूर्ण पहल की है।

जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डालसा) द्वारा न्याय सदन के कॉन्फ्रेंस हॉल में कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 यानी POSH Act को लेकर अधिकार मित्रों (पीएलवी) के लिए एक दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया।

प्रशिक्षण का स्पष्ट संदेश था—कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को चुपचाप सहन करना मजबूरी नहीं है। महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा की रक्षा के लिए कानून मौजूद है और अब इस कानून की जानकारी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना जरूरी है।

डालसा सचिव कुमार सौरभ त्रिपाठी और मध्यस्थ अधिवक्ता प्रीति मुर्मू ने प्रशिक्षण शिविर में मौजूद अधिकार मित्रों को POSH Act-2013 के विभिन्न प्रावधानों, महिलाओं के अधिकारों और शिकायत दर्ज कराने की कानूनी प्रक्रिया की विस्तार से जानकारी दी।

महिलाओं की गरिमा से समझौता नहीं

प्रशिक्षण में बताया गया कि POSH Act, 2013 का पूरा नाम कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करना, सुरक्षित और अनुकूल कार्य वातावरण तैयार करना तथा शिकायतों के निवारण के लिए स्पष्ट व्यवस्था सुनिश्चित करना है।

कानून महिलाओं के गरिमापूर्ण जीवन और समानता के अधिकार की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा प्रदान करता है।

प्रशिक्षण में कहा गया कि यौन उत्पीड़न केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है। अवांछित शारीरिक संपर्क, यौन संबंध की मांग, अश्लील टिप्पणियां, भद्दे इशारे और किसी भी प्रकार का अवांछित मौखिक, गैर-मौखिक या शारीरिक आचरण भी इसके दायरे में आ सकता है।

10 से अधिक कर्मचारी तो शिकायत समिति जरूरी

अधिनियम के तहत सरकारी और निजी संस्थानों, कंपनियों, शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों और असंगठित क्षेत्रों सहित विभिन्न कार्यस्थलों को कानून के दायरे में रखा गया है।

जिन संस्थानों या कार्यालयों में 10 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं, वहां आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का गठन करना अनिवार्य है। पीड़ित महिला इस समिति के समक्ष अपनी लिखित शिकायत दर्ज करा सकती है।

वहीं, 10 से कम कर्मचारियों वाले संस्थानों या नियोक्ता के खिलाफ शिकायत के लिए जिला स्तर पर स्थानीय शिकायत समिति (LCC) की व्यवस्था की गई है।

प्रशिक्षण के दौरान बताया गया कि पीड़ित महिला को घटना के तीन महीने के भीतर लिखित शिकायत दर्ज करानी होती है।

अब चुप्पी नहीं, अधिकारों की आवाज बनेगा जागरूकता अभियान

अधिकार मित्रों को निर्देश दिया गया कि वे गांवों, मोहल्लों और कार्यस्थलों तक POSH Act की जानकारी पहुंचाएं। महिलाओं को यह बताया जाए कि कार्यस्थल पर किसी भी प्रकार के यौन उत्पीड़न, अभद्र व्यवहार या अपमान को चुपचाप सहन करने की आवश्यकता नहीं है।

प्रशिक्षण में यह भी विशेष रूप से बताया गया कि शिकायत और जांच से संबंधित जानकारी की गोपनीयता बनाए रखना कानून का महत्वपूर्ण प्रावधान है।

संदेश साफ था कि सुरक्षित कार्यस्थल बनाना केवल महिला की जिम्मेदारी नहीं है। नियोक्ता, सहकर्मी और पूरे संस्थान को मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करना होगा, जहां किसी महिला को भय, दबाव या अपमान के बीच काम न करना पड़े।

उपस्थित सभी पीएलवी को निर्देश दिया गया कि वे POSH Act, 2013 को लेकर कर्मचारियों और आम लोगों के बीच जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करें और महिलाओं के लिए सुरक्षित एवं सम्मानजनक कार्य वातावरण सुनिश्चित करने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाएं।

प्रशिक्षण शिविर में पीएलवी नागेंद्र कुमार, सुनील पांडेय, शिव शंकर महतो, आशीष प्रजापति, नंदा रजक, अरुण रजक, संजय तिवारी, प्रकाश मिश्रा, सदानंद महतो, राम कंडे मिश्रा, जोबा रानी बास्के, सुनीता कुमारी, गोलोरिया पूर्ति, सीमा देवी, सुनीता झा, प्रशीष मरांडी, रीना तिवारी, जयंतो नंदी, बालेश्वर दास और गौरव कुमार सहित अन्य अधिकार मित्र उपस्थित थे।

सवाल आज भी वही है—क्या हर कार्यस्थल महिलाओं के लिए सचमुच सुरक्षित है?

कानून अपनी जगह है, शिकायत समितियां अपनी जगह हैं और नियम भी स्पष्ट हैं। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती है चुप्पी तोड़ना और कानून को कागजों से निकालकर हर कार्यस्थल तक पहुंचाना।

जमीनी आवाज की नजर में संदेश बिल्कुल साफ है—महिलाओं की सुरक्षा कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि सम्मानजनक और सभ्य समाज की पहली शर्त है। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ अब चुप्पी नहीं, कानून और जागरूकता की मजबूत आवाज जरूरी है।