घाटशिला/मुसाबनी। असित भट्टाचार्य की रिपोर्ट
आखिर ऐसा क्या हुआ कि मुसाबनी प्रखंड प्रमुख रामदेव हेंब्रम की पत्नी शिवानी हेंब्रम को कथित मारपीट और छेड़खानी के मामले में न्याय की मांग लेकर अदालत की चौखट तक पहुंचना पड़ा? जिस मामले में पहले पुलिस प्रशासन से कार्रवाई की मांग की गई, चेतावनी दी गई और कथित तौर पर पीड़ित पक्ष लगातार न्याय की गुहार लगाता रहा, उसी मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है।
शिवानी हेंब्रम की ओर से अब बिराज के खिलाफ शिकायत वाद न्यायालय में दर्ज कराया गया है। न्यायालयीय रिकॉर्ड के अनुसार मामले का Filing No. COMPLAINT CASE/1156/2026 है, जबकि Regn. No. COMPLAINT CASE/229/2026 के तहत इसे 01 सितंबर 2026 को पंजीकृत किया गया है। मामले का शीर्षक Shivani Vs Biraj दर्ज है।
यह मामला उस कथित घटना से जुड़ा है, जिसमें शिवानी हेंब्रम के साथ मारपीट और कथित रूप से छेड़खानी किए जाने के आरोप लगाए गए थे। पीड़ित पक्ष का आरोप रहा है कि घटना के बाद अपेक्षित और प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। यही वजह बताई जा रही है कि मामला अब पुलिस प्रशासन की चौखट से निकलकर सीधे न्यायालय तक पहुंच गया है।
पहले चेतावनी, अब कोर्ट—क्या पुलिस की कथित निष्क्रियता ने बढ़ाया विवाद?
इस मामले को लेकर मुसाबनी प्रखंड प्रमुख रामदेव हेंब्रम पहले ही कड़ा रुख अपना चुके थे। उन्होंने कथित घटना के बाद कार्रवाई की मांग करते हुए चेतावनी दी थी कि यदि दोषियों के खिलाफ शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो पीड़ित पक्ष आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होगा।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि चेतावनी के बावजूद पीड़ित पक्ष को अदालत क्यों जाना पड़ा? क्या पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई से पीड़ित पक्ष संतुष्ट नहीं था? क्या मामले की जांच और कार्रवाई को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई गई? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—यदि पीड़ित पक्ष की शिकायत में दम नहीं था तो उसे अदालत की चौखट तक पहुंचने की जरूरत क्यों महसूस हुई, और यदि शिकायत गंभीर थी तो समय पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इन सवालों का जवाब अब केवल पीड़ित परिवार ही नहीं, बल्कि स्थानीय जनता भी जानना चाहती है।
मारपीट, पत्नी के साथ कथित बदसलूकी और फिर कार्रवाई पर सवाल
पीड़ित पक्ष के अनुसार, घटना में केवल प्रमुख रामदेव हेंब्रम ही नहीं, बल्कि उनकी पत्नी शिवानी हेंब्रम के साथ भी कथित रूप से मारपीट और बदसलूकी की गई थी। मामले में कथित छेड़खानी के आरोप भी सामने आए थे।
घटना के बाद पीड़ित पक्ष की ओर से पुलिस प्रशासन से कार्रवाई की मांग की गई। लेकिन पीड़ित पक्ष का आरोप है कि उन्हें अपेक्षित न्याय और कार्रवाई नहीं मिली। इसी कथित निष्क्रियता से असंतुष्ट होकर अब शिवानी हेंब्रम ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।
अब सवाल यह है कि क्या एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि के परिवार को भी न्याय के लिए अदालत की शरण लेनी पड़े, तो आम पीड़ितों की स्थिति क्या होगी? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कानून-व्यवस्था और पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाने की जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन पर होती है। ऐसे में किसी मामले का सीधे शिकायत वाद के रूप में न्यायालय तक पहुंच जाना, पुलिस कार्रवाई को लेकर उठ रहे सवालों को और तेज कर सकता है।
‘24 घंटे में कार्रवाई नहीं तो आंदोलन’—चेतावनी के बाद भी नहीं बदली तस्वीर?
कथित घटना के बाद प्रमुख रामदेव हेंब्रम की ओर से पहले ही यह चेतावनी दी गई थी कि यदि 24 घंटे के भीतर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन किया जाएगा। उस समय यह मामला स्थानीय स्तर पर काफी चर्चा में रहा। अब उसी मामले में प्रमुख की पत्नी द्वारा न्यायालय में शिकायत वाद दर्ज कराए जाने से विवाद ने एक बार फिर गंभीर रूप ले लिया है। सवाल यह है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बनीं कि आंदोलन की चेतावनी के बाद भी मामला समाप्त होने के बजाय कोर्ट तक पहुंच गया?
अब कोर्ट में होगी आरोपों की कानूनी परीक्षा
शिवानी बनाम बिराज मामले के पंजीकृत होने के बाद अब आरोपों और शिकायत में प्रस्तुत तथ्यों की कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच होगी। शिकायत वाद का पंजीकरण आरोपों के सिद्ध हो जाने का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह जरूर दर्शाता है कि शिकायतकर्ता ने अपने आरोपों के संबंध में न्यायालय से कानूनी हस्तक्षेप की मांग की है।
अब सभी की निगाहें न्यायालय की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। दूसरी ओर, इस पूरे प्रकरण ने पुलिस की कथित कार्रवाई, जांच की प्रक्रिया और पीड़ित पक्ष की संतुष्टि को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल—अगर पुलिस स्तर पर समय रहते निष्पक्ष और संतोषजनक कार्रवाई हो जाती, तो क्या शिवानी हेंब्रम को न्याय की तलाश में अदालत की चौखट तक पहुंचना पड़ता?
जमीनी आवाज इस मामले में आगे की न्यायिक कार्रवाई और पुलिस प्रशासन का पक्ष भी प्रमुखता से पाठकों तक पहुंचाएगा।





