संपादकीय | जमीनी आवाज
झारखंड बने 26 साल हो गए। यह राज्य देश के सबसे समृद्ध खनिज क्षेत्रों में गिना जाता है, लेकिन आज भी एक सवाल लगातार पीछा कर रहा है—खनिज संपदा से आखिर किसका विकास हो रहा है और इसकी असली कीमत कौन चुका रहा है? सामने आई जानकारी के अनुसार अक्टूबर 2024 से झारखंड में खनिज-युक्त भूमि पर नए प्रकार के टैक्स की व्यवस्था लागू की गई और अब खनिज से होने वाले संभावित राजस्व को लेकर बहस और तेज हो गई है।
सवाल टैक्स लगाने के अधिकार का ही नहीं है। सवाल यह है कि जब रॉयल्टी, DMF, डीएमएफ से जुड़े भुगतान, नीलामी शुल्क और दूसरे माध्यमों से पहले से ही हजारों करोड़ रुपये का राजस्व आ रहा था, तब नए टैक्स की जरूरत क्यों पड़ी? अगर सरकार का तर्क है कि इससे राज्य की आय बढ़ेगी, तो जनता को यह भी जानने का पूरा अधिकार है कि यह अतिरिक्त पैसा कहां जाएगा।
पोस्ट में दिए आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में खनिज बेयरिंग लैंड से अनुमानित राजस्व करीब 1,976 करोड़ रुपये, 2025-26 में करीब 13,442 करोड़ रुपये और 2026-27 के बजट अनुमान में करीब 14,656 करोड़ रुपये बताया गया है। आंकड़े यदि सही हैं तो यह मामूली रकम नहीं, बल्कि झारखंड की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डालने वाली राशि है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—इतना राजस्व आएगा तो उसका लाभ खनन क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों, आदिवासियों, विस्थापित परिवारों और स्थानीय युवाओं तक कितना पहुंचेगा?
झारखंड का इतिहास बताता है कि खनिज संपदा के बावजूद खनन क्षेत्रों के आसपास गरीबी, बेरोजगारी, विस्थापन, प्रदूषण और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे सवाल खत्म नहीं हुए हैं। इसलिए नया टैक्स केवल सरकारी खजाना भरने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। सरकार को स्पष्ट करना होगा कि खनिज से मिलने वाली अतिरिक्त आय का कितना हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय रोजगार पर खर्च होगा।
यह भी जरूरी है कि खनिज नीति केवल सरकार और कंपनियों के बीच का विषय न रहे। जिस जमीन के नीचे खनिज है, उस जमीन के ऊपर रहने वाले लोगों की आवाज सबसे महत्वपूर्ण होनी चाहिए। खनिज संपदा प्रकृति की देन है और उसका इस्तेमाल विकास के लिए हो, लेकिन विकास की कीमत स्थानीय समाज को उजड़कर नहीं चुकानी चाहिए।
आज जरूरत किसी भी नीति का अंधा विरोध करने की नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और न्यायपूर्ण हिस्सेदारी की है। सरकार यदि नया राजस्व जुटा रही है तो उसका पूरा हिसाब जनता के सामने रखे। कितना पैसा आया, किस जिले से आया, कहां खर्च हुआ और उससे स्थानीय लोगों को क्या मिला—इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।
झारखंड के पास खनिज का खजाना है। अब समय है कि यह खजाना सिर्फ सरकारी आंकड़ों में नहीं, बल्कि झारखंड के गांवों, युवाओं और आम लोगों की जिंदगी में भी दिखाई दे।
जमीनी आवाज का सवाल सीधा है—खनिज हमारा है, राजस्व भी हमारा है, तो विकास का हक भी सबसे पहले झारखंड की जनता का क्यों नहीं?
— जमीनी आवाज
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