संपादकीय | असित भट्टाचार्य

जमशेदपुर : निखिल टीम संवाद पर आधारित...

परसुडीह पुलिस द्वारा 510 ग्राम गांजा के साथ एक व्यक्ति की गिरफ्तारी को हम केवल एक पुलिस कार्रवाई के रूप में नहीं देखते। यह उस बड़े सवाल का हिस्सा है, जो आज पूरे समाज के सामने खड़ा है—हमारी अगली पीढ़ी को नशे से कैसे बचाया जाए?

पूर्वी सिंहभूम पुलिस का सक्रिय होना स्वागतयोग्य है। सूचना मिली, टीम बनी, छापेमारी हुई, गांजा बरामद हुआ और आरोपी जेल भेजा गया। कानून अपना काम करे, यह जरूरी है। लेकिन एक जिम्मेदार समाज और एक जिम्मेदार मीडिया का काम सिर्फ पुलिस की कार्रवाई की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उस कार्रवाई की दिशा पर भी सवाल उठाना है।

और यहीं से एक जरूरी बात सामने आती है।

हर नशे को एक ही तराजू पर तौलना क्या सही है?

गांजे को लेकर समाज में सदियों से अलग-अलग धारणाएं रही हैं। भारतीय परंपरा में इसका धार्मिक और औषधीय संदर्भ भी मिलता है। पुराने समय में कई जगहों पर भांग और गांजे का सामाजिक इस्तेमाल भी असामान्य नहीं माना जाता था। यानी गांजे को लेकर भारतीय समाज का इतिहास आज के संदर्भ से कहीं अधिक जटिल है।

लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं कि आज अवैध तरीके से गांजे की खरीद-बिक्री को नजरअंदाज किया जाए। कानून यदि प्रतिबंध लगाता है तो उसका पालन होना ही चाहिए। पुलिस को सूचना मिले तो कार्रवाई भी होनी चाहिए।

लेकिन क्या गांजे की एक पुड़िया और ब्राउन शुगर की एक खेप समाज के लिए समान खतरा पैदा करती है? यह सवाल हमें गंभीरता से पूछना होगा।

ब्राउन शुगर—वह नशा जो घर नहीं, पूरी जिंदगी उजाड़ देता है

आज चिंता का सबसे बड़ा विषय उन सिंथेटिक और अत्यधिक नशीले पदार्थों का बढ़ता नेटवर्क है, जिनकी गिरफ्त में आने के बाद युवा धीरे-धीरे परिवार, पढ़ाई, रोजगार और सामाजिक जीवन से कटता चला जाता है।

ब्राउन शुगर जैसे नशीले पदार्थों का कारोबार सिर्फ एक अपराध नहीं है। यह एक पूरी पीढ़ी के भविष्य पर हमला है।

इसलिए पुलिस को गांजा बरामदगी जैसी कार्रवाई के साथ-साथ उन नेटवर्क पर विशेष ध्यान देना चाहिए जो युवाओं तक ब्राउन शुगर और दूसरे खतरनाक नशीले पदार्थ पहुंचा रहे हैं।

सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि "नशा किसके पास मिला?" सवाल यह होना चाहिए—

  • "नशा आया कहां से?"
  • "पहुंचाया किसने?"
  • "पैसा किसके पास जा रहा है?"
  • "इसके पीछे कौन है?"
  • "युवाओं को ग्राहक कौन बना रहा है?"

अगर पुलिस इन सवालों के जवाब तक पहुंचती है, तभी असली लड़ाई जीती जाएगी।

एक गिरफ्तारी से ज्यादा जरूरी है पूरे नेटवर्क की गिरफ्तारी

जमीन पर काम करने वाले पत्रकारों और आम लोगों की आंखों से देखें तो तस्वीर साफ है। किसी एक छोटे विक्रेता को पकड़ लेना आसान हो सकता है, लेकिन उसके पीछे खड़े बड़े नेटवर्क तक पहुंचना असली चुनौती है।

इसलिए पूर्वी सिंहभूम पुलिस से "जमीनी आवाज" की अपील है—छोटे पेडलर तक कार्रवाई सीमित मत रखिए। सप्लाई लाइन तक जाइए।

अगर कोई युवक नशे का शिकार बन रहा है तो सिर्फ उसे अपराधी की नजर से मत देखिए। यह भी पता कीजिए कि उसे नशे तक पहुंचाने वाला कौन है। क्योंकि नशे का ग्राहक खत्म करने से ज्यादा जरूरी है नशे का बाजार खत्म करना।

पुलिस की सक्रियता बनी रहे, लेकिन प्राथमिकता भी तय हो

परसुडीह पुलिस की कार्रवाई इसलिए सराहनीय है कि उसने सूचना पर तुरंत कदम उठाया। पूर्वी सिंहभूम पुलिस का यह सक्रिय रवैया कायम रहना चाहिए।

लेकिन संसाधन सीमित हैं। पुलिस के पास हर अपराध के पीछे जाने के लिए असीमित समय और बल नहीं है। इसलिए प्राथमिकता तय करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।

जहां युवा बर्बाद हो रहे हैं, जहां परिवार टूट रहे हैं, जहां स्कूल-कॉलेज के आसपास नशीले पदार्थों का नेटवर्क फैल रहा है—वहां पुलिस की नजर सबसे पहले और सबसे कठोर होनी चाहिए।

कानून अपना काम करे, समाज अपनी जिम्मेदारी निभाए

नशे के खिलाफ लड़ाई सिर्फ पुलिस के भरोसे नहीं जीती जा सकती।

माता-पिता को बच्चों के व्यवहार में बदलाव पर नजर रखनी होगी। स्कूल-कॉलेजों को जागरूकता बढ़ानी होगी। समाज को नशे के कारोबारियों को सामाजिक संरक्षण देना बंद करना होगा। जनप्रतिनिधियों को भी इस विषय पर राजनीति से ऊपर उठकर आवाज उठानी होगी।

और प्रशासन को केवल गिरफ्तारी का आंकड़ा नहीं, बल्कि नशे की सप्लाई लाइन तोड़ने का परिणाम सामने रखना होगा।

"जमीनी आवाज" की स्पष्ट बात

हम पुलिस की कार्रवाई की तारीफ करते हैं, क्योंकि कानून का राज जरूरी है। हम गांजे की अवैध बिक्री पर कार्रवाई का भी समर्थन करते हैं, क्योंकि कानून सभी के लिए समान होना चाहिए।

लेकिन हम यह भी कहना चाहते हैं कि नशे के खिलाफ अभियान में प्राथमिकता का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

गांजा बरामद करना खबर है। लेकिन ब्राउन शुगर का नेटवर्क तोड़ना समाज बचाने की लड़ाई है।

और जब पुलिस अपराध की जड़ तक पहुंचती है, प्रशासन ईमानदारी से कार्रवाई करता है और समाज अपनी जिम्मेदारी निभाता है, तभी एक सुरक्षित समाज बनता है।

पूर्वी सिंहभूम पुलिस से उम्मीद है कि उसका यह "एक्शन मोड" केवल आज की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा। नशे के हर कारोबारी तक कानून का हाथ पहुंचे—लेकिन खास तौर पर उन लोगों तक, जो ब्राउन शुगर और दूसरे घातक नशों के जरिए युवाओं की जिंदगी और परिवारों का भविष्य बेच रहे हैं।

क्योंकि सवाल सिर्फ आज की एक गिरफ्तारी का नहीं है। सवाल आने वाली पीढ़ी का है।

और "जमीनी आवाज" साफ शब्दों में कहती है—"नशा बेचने वाले का कारोबार नहीं, युवा का भविष्य बचना चाहिए।"

—संपादकीय
जमीनी आवाज
"खबरें जमीन की, जमाने की"