जमीनी आवाज | संपादकीय
स्कूल-कॉलेजों में बैठकें और निर्देश बहुत हुए, अब बताइए—कितने पात्र युवाओं का नाम वास्तव में मतदाता सूची में जुड़ा?
लोकतंत्र में सबसे ताकतवर चीज क्या है? सरकार? सत्ता? पद? पैसा? नहीं। सबसे ताकतवर है—एक आम नागरिक का वोट। लेकिन सवाल यह है कि जिस वोट के लिए चुनाव के समय राजनीतिक दल गांव-गांव, गली-गली और घर-घर पहुंच जाते हैं, उसी वोट का अधिकार हासिल करने के लिए एक 18 साल के युवा को कितनी जानकारी, कितनी मदद और कितनी सुविधा मिलती है?
सरायकेला में जिला निर्वाचन पदाधिकारी द्वारा विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं प्रशिक्षण संस्थानों के प्रधानाचार्यों के साथ बैठक कर पात्र विद्यार्थियों तथा 01 अक्टूबर 2026 को 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं का नाम मतदाता सूची में जोड़ने के निर्देश दिए गए हैं।
निर्देश जरूरी है। लेकिन क्या सिर्फ निर्देश से लोकतंत्र मजबूत होगा? यही सबसे बड़ा सवाल है। हर साल हजारों युवा 18 वर्ष की उम्र पूरी करते हैं। वे कॉलेज में प्रवेश लेते हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, रोजगार की तलाश करते हैं और अपने भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। लेकिन क्या उन्हें कोई यह बताने के लिए गंभीरता से उनके बीच पहुंचता है कि "अब आप सिर्फ विद्यार्थी नहीं रहे, आप देश के निर्णय में भागीदारी करने वाले नागरिक भी हैं।" अगर नहीं, तो यह हमारी शिक्षा व्यवस्था, प्रशासन और समाज—तीनों के लिए चिंता का विषय है।
चुनाव के समय मतदाता याद, बाकी समय क्यों नहीं?
चुनाव आते ही राजनीतिक दलों को मतदाता की ताकत याद आ जाती है। पोस्टर लगते हैं, सभाएं होती हैं, प्रचार होता है, बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। लेकिन लोकतंत्र की असली जिम्मेदारी चुनाव की घोषणा के साथ शुरू नहीं होती। वह जिम्मेदारी उस दिन शुरू होती है, जब कोई युवा 18 वर्ष का होता है।
इसलिए सवाल प्रशासन से भी है और समाज से भी—क्या हर पात्र विद्यार्थी तक मतदाता पंजीकरण की जानकारी पहुंची? क्या हर कॉलेज ने अपने विद्यार्थियों की स्थिति को गंभीरता से जांचा? क्या ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के युवाओं तक यह सुविधा आसानी से पहुंच रही है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या हम सिर्फ मतदाताओं की संख्या बढ़ाना चाहते हैं या जागरूक मतदाता भी तैयार करना चाहते हैं?
नाम जुड़ना जरूरी है, लेकिन आंखें खुलना उससे भी ज्यादा जरूरी
मतदाता सूची में नाम जुड़ना लोकतांत्रिक अधिकार का पहला कदम है। लेकिन केवल पहचान पत्र बन जाने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। जरूरत है ऐसे मतदाता की जो उम्मीदवार से सवाल पूछ सके। जो जाति, धर्म, लालच, डर और झूठे वादों से ऊपर उठकर अपने विवेक से निर्णय ले सके। जो यह पूछ सके कि उसके गांव में सड़क क्यों नहीं बनी? अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं है? स्कूल में शिक्षक क्यों नहीं है? युवाओं को रोजगार क्यों नहीं मिला? भ्रष्टाचार पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और चुनाव के बाद जनता के सवालों का जवाब कौन देगा? ऐसा मतदाता ही लोकतंत्र की असली ताकत है।
शिक्षण संस्थान सिर्फ डिग्री बांटने की जगह नहीं
स्कूल और कॉलेजों से भी एक सीधा सवाल है। अगर किसी संस्थान में 18 वर्ष की उम्र पूरी कर चुके सैकड़ों विद्यार्थी हैं, तो क्या केवल एक सूचना चस्पा कर देना पर्याप्त है? नहीं। शिक्षण संस्थानों को चाहिए कि वे पात्र विद्यार्थियों की पहचान करें, उन्हें प्रक्रिया समझाएं और जरूरत पड़ने पर पंजीकरण में सहयोग करें। क्योंकि लोकतंत्र की शिक्षा केवल संविधान की किताब में नहीं होती। वह तब पूरी होती है, जब विद्यार्थी अपने अधिकार का इस्तेमाल करना सीखता है।
और प्रशासन से एक सवाल—आंकड़ा नहीं, जवाबदेही चाहिए
निर्वाचन विभाग को भी इस अभियान को केवल लक्ष्य और आंकड़ों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि अभियान के बाद कितने पात्र युवाओं के नाम जुड़े। कितने आवेदन आए। कितने लंबित हैं। कितने खारिज हुए और क्यों। और जिनके आवेदन में त्रुटियां थीं, उन्हें सुधारने के लिए क्या सहायता दी गई? लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल चुनाव के दिन नहीं, मतदाता बनने की प्रक्रिया में भी होनी चाहिए।
आज का 18 वर्षीय युवा कल का नेता, अधिकारी, शिक्षक, मजदूर, किसान, उद्यमी और समाज का निर्णयकर्ता है। अगर हमने उसे जागरूक मतदाता बना दिया, तो लोकतंत्र की जड़ मजबूत होगी। अगर हमने उसे केवल चुनावी आंकड़ा बना दिया, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होगी।
इसलिए यह अभियान सिर्फ मतदाता सूची सुधारने का अभियान नहीं होना चाहिए। यह अभियान युवा चेतना का अभियान बनना चाहिए। क्योंकि सत्ता बदलने का अधिकार जनता के पास है। लेकिन जनता की ताकत तभी सामने आती है—जब उसका नाम मतदाता सूची में हो, उसके हाथ में वोट हो और उसके दिमाग में सवाल हों। यही लोकतंत्र है। यही नागरिकता है। और यही असली "जमीनी आवाज" है।





