घाटशिला। असित भट्टाचार्य

देश और झारखंड के राजनीतिक परिदृश्य में आदिवासी समाज की भागीदारी आज पहले से कहीं अधिक दिखाई देती है। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आदिवासी समाज की महिला राष्ट्रपति हैं और झारखंड की सत्ता की बागडोर भी आदिवासी नेतृत्व के हाथों में है। यह निश्चित रूप से आदिवासी समाज के लिए गौरव का विषय है। लेकिन इसी गौरव के बीच जमीन से उठ रहा एक सवाल अब नजरअंदाज करना आसान नहीं है—जब सत्ता के शीर्ष तक आदिवासी पहुंच गए हैं, तो गांव की चौखट पर खड़ा आदिवासी आज भी बुनियादी सुविधाओं, शिक्षा और रोजगार के लिए क्यों जूझ रहा है?

यह सवाल किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि एक पढ़े-लिखे बेरोजगार युवक कंदरा किस्कू का है। उन्होंने अपनी लिखित बात के माध्यम से आदिवासी समाज की वर्तमान स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है।

कंदरा किस्कू का कहना है कि आदिवासी समाज को केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलने से उसकी वास्तविक तस्वीर नहीं बदलेगी। जरूरत इस बात की है कि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में भी बदलाव जमीन पर दिखाई दे।

डिग्री हाथ में, रोजगार की तलाश जारी

आज आदिवासी समाज का एक बड़ा युवा वर्ग उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहा है। गांवों से निकलकर युवा कॉलेज और विश्वविद्यालय तक पहुंच रहे हैं। लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके सामने सबसे बड़ा सवाल रोजगार का खड़ा हो जाता है।

कंदरा किस्कू का सवाल है—अगर पढ़ा-लिखा युवा रोजगार के लिए भटकता रहे, तो शिक्षा का वास्तविक लाभ आखिर किसे मिल रहा है?

सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या, प्रतियोगी परीक्षाओं में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और निजी क्षेत्र में स्थानीय युवाओं के लिए सीमित अवसरों ने ग्रामीण युवाओं की चिंता बढ़ाई है। ऐसे में केवल योजनाओं और घोषणाओं से नहीं, बल्कि स्थायी रोजगार के अवसर पैदा करने की जरूरत है।

जल-जंगल-जमीन की बात से आगे बढ़ना होगा

आदिवासी समाज की पहचान सदियों से जल, जंगल और जमीन से जुड़ी रही है। लेकिन आज सवाल केवल जमीन बचाने का नहीं है। सवाल यह भी है कि उस जमीन से जुड़े परिवारों की अगली पीढ़ी को बेहतर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन कैसे मिलेगा।

विकास की बड़ी-बड़ी योजनाओं के बीच अगर किसी गांव में सड़क, स्वास्थ्य सुविधा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा या रोजगार का अभाव बना रहे, तो विकास की तस्वीर अधूरी ही मानी जाएगी।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व गर्व का विषय, लेकिन…

राष्ट्रपति पद तक आदिवासी समाज की पहुंच और झारखंड में आदिवासी नेतृत्व का मजबूत होना सामाजिक बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत है। लेकिन इसका अर्थ तभी सार्थक होगा, जब इसका असर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।

सवाल यह नहीं कि सत्ता में आदिवासी है या नहीं। सवाल यह है कि सत्ता में आदिवासी होने का लाभ उस आदिवासी परिवार तक कितना पहुंचा, जिसके घर का युवा आज भी बेरोजगार है।

कंदरा किस्कू की चिंता इसी अंतर को लेकर है—प्रतिनिधित्व और वास्तविक बदलाव के बीच की दूरी कब खत्म होगी?

युवाओं को सिर्फ भाषण नहीं, अवसर चाहिए

आज का आदिवासी युवा सिर्फ आश्वासन नहीं चाहता। वह अच्छी शिक्षा चाहता है, कौशल विकास चाहता है, रोजगार चाहता है और अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता है। वह चाहता है कि उसके गांव में भी वही बुनियादी सुविधाएं हों, जो शहरों में सहज रूप से उपलब्ध हैं।

सरकारों के सामने चुनौती यही है कि आदिवासी समाज के लिए बनाई जाने वाली योजनाएं कागजों से निकलकर गांव की जमीन तक पहुंचें और उनका वास्तविक परिणाम दिखाई दे।

कंदरा किस्कू का सवाल दरअसल एक व्यक्ति का सवाल नहीं है। यह उन हजारों पढ़े-लिखे युवाओं की बेचैनी है, जो डिग्री लेकर रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं।

सत्ता के शिखर पर आदिवासी नेतृत्व निश्चित रूप से गौरव की बात है, लेकिन असली उपलब्धि उस दिन होगी, जब आदिवासी गांव का युवा बेरोजगारी के बजाय अपने भविष्य की बात करेगा और आदिवासी परिवार विकास की योजनाओं का लाभ लेने के लिए किसी कार्यालय के चक्कर लगाने के बजाय अपने गांव में ही बेहतर जीवन जी सकेगा।

यही वह सवाल है, जिस पर अब सत्ता, समाज और व्यवस्था—तीनों को गंभीरता से सोचना होगा।

— जमीनी आवाज
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