बोकारो.... असित भट्टाचार्य

झारखंड के बोकारो जिले से जुड़ा सेजल झा लापता प्रकरण अब केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि देश की कानून-व्यवस्था, जांच एजेंसियों की कार्यशैली और बेटियों की सुरक्षा पर खड़ा सबसे बड़ा सवाल बन चुका है। 16 अक्टूबर 2020 को पिंड्राजोड़ा थाना क्षेत्र से ट्यूशन के लिए निकली 14 वर्षीय छात्रा सेजल झा उर्फ पाखी कुमारी झा आज भी लापता है। साढ़े पांच साल, 66 महीने और 2114 दिनों के बाद भी उसका कोई सुराग नहीं मिल पाया है।

जिस दिन सेजल घर से निकली थी, कुछ ही देर बाद सड़क किनारे उसकी साइकिल, स्कूल बैग और चप्पलें बरामद हुईं। इसके बाद पुलिस ने कई कोणों से जांच की, संदिग्धों से पूछताछ हुई, नार्को टेस्ट तक कराए गए, लेकिन न तो घटना की गुत्थी सुलझी और न ही सेजल का पता चल सका। समय बीतता गया, फाइलें बदलती रहीं और एक मां का इंतजार और लंबा होता गया।

सेजल की मां उषा झा, जो पेशे से शिक्षिका हैं, पिछले 2114 दिनों से अपनी बेटी की तलाश में प्रशासन से लेकर न्यायपालिका तक लगातार गुहार लगा रही हैं। उन्होंने जिला प्रशासन, पुलिस, राज्य सरकार और देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक न्याय की अपील की, लेकिन अब तक उनकी झोली में केवल आश्वासन ही आए हैं।

मामले की गंभीरता को देखते हुए अप्रैल 2026 में जांच सीआईडी को सौंपी गई। इसके बाद जुलाई 2026 में झारखंड हाईकोर्ट ने सीबीआई को पक्षकार बनाते हुए सीआईडी के साथ संयुक्त जांच का निर्देश दिया। इसके बावजूद आज तक जांच किसी निर्णायक नतीजे तक नहीं पहुंच सकी है।

इस बीच विधायक अरूप चटर्जी ने मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह केवल एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा, "अगर आज हर घर से आवाज नहीं उठी तो कल किसी और की बेटी गायब होगी। सेजल के लिए न्याय की लड़ाई पूरे समाज को मिलकर लड़नी होगी।"

30 जुलाई 2026 को किसान संग्राम समिति के केंद्रीय सदस्य कॉमरेड गयाराम शर्मा ने सेजल की मां से मुलाकात कर कहा कि अब चुप रहना अपराध के बराबर है। उन्होंने देशभर के नागरिकों, सामाजिक संगठनों, सभी राजनीतिक दलों और मीडिया से अपील की कि वे एक स्वर में पूछें— "सेजल कहाँ है?" उनका कहना था कि जब तक समाज एकजुट होकर आवाज नहीं उठाएगा, तब तक न केवल सेजल जैसी बेटियों को न्याय मिलने में देरी होगी, बल्कि मानव तस्करी और बेटियों के खिलाफ अपराधों पर भी प्रभावी रोक लगाना मुश्किल होगा।

आदिवासी नेत्री सोनिया कुमारी मुर्मू ने भी समाज को चेताते हुए कहा कि यदि आज लोग चुप रहे तो कल किसी और परिवार को इसी पीड़ा से गुजरना पड़ सकता है। उन्होंने बेटियों की सुरक्षा को राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी बताया।

एक बच्ची साढ़े पांच साल से लापता है। एक मां की आंखें आज भी दरवाजे पर टिकी हैं। जांच एजेंसियां सक्रिय हैं, लेकिन जवाब अब भी अधूरा है।

अब यह सिर्फ बोकारो का सवाल नहीं रहा।

यह पूरे देश से पूछा जा रहा सवाल है— "सेजल झा कहाँ है?"


"लोकतंत्र में सवालों से डर क्यों? गाली पर ज्ञान और सत्ता पर मौन—यह दोहरा चरित्र कब तक?"

प्रधानमंत्री की अपील स्वागत योग्य, लेकिन क्या यह संदेश सत्ता के गलियारों में भी समान रूप से लागू होगा?

सम्मान केवल विपक्ष का कर्तव्य नहीं, सत्ता का भी दायित्व है—लोकतंत्र संवाद से चलता है, अपमान से नहीं।

संपादकीय.....

प्रधानमंत्री ने हाल ही में कहा कि राजनीति में गाली-गलौज की जगह नहीं होनी चाहिए। यह बात सिद्धांत रूप से बिल्कुल सही है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में भाषा की मर्यादा बनी रहनी चाहिए। असहमति हो सकती है, लेकिन अभद्रता नहीं।

लेकिन यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या यह सीख केवल जनता और विपक्ष के लिए है, या सत्ता पक्ष पर भी उतनी ही लागू होती है?

पिछले कुछ वर्षों में देश ने ऐसा राजनीतिक माहौल भी देखा है, जहाँ विरोधियों को देशद्रोही, भ्रष्ट, टुकड़े-टुकड़े गैंग, माफिया और न जाने कितने विशेषणों से नवाज़ा गया। कई बार नेताओं की सभाओं से लेकर सोशल मीडिया तक ऐसी भाषा सुनने को मिली जिसने राजनीतिक बहस का स्तर गिराया। यदि मर्यादा की बात हो रही है, तो शुरुआत सबसे पहले सत्ता के शीर्ष से दिखनी चाहिए।

लोकतंत्र में जनता का सबसे बड़ा अधिकार सवाल पूछना है। सवाल पूछना गुनाह नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। यदि कोई सरकार के निर्णयों पर प्रश्न उठाता है, तो उसे देशविरोधी या शत्रु मान लेना लोकतांत्रिक परंपरा के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। आलोचना और गाली में फर्क होता है। हर असहमति अपमान नहीं होती।

सत्ता में बैठा व्यक्ति केवल प्रशंसा सुनने के लिए नहीं होता। उसे आलोचना भी सुननी पड़ती है। जनता ने अधिकार दिया है, इसलिए जनता जवाब भी मांगेगी। यदि हर सवाल पर नाराज़गी और हर आलोचना पर आक्रोश होगा, तो संवाद की जगह दूरी पैदा होगी।

यह भी सच है कि सोशल मीडिया ने भाषा को काफी विषाक्त बनाया है। किसी भी दल के समर्थक हों, यदि वे किसी की मां, बहन, बेटी या परिवार को निशाना बनाकर अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हैं, तो उसकी निंदा होनी ही चाहिए। राजनीतिक मतभेद कभी भी व्यक्तिगत सम्मान पर हमला करने का लाइसेंस नहीं बन सकते।

देश को ऐसे आदर्श की आवश्यकता है जहाँ नेता केवल भाषणों से नहीं, अपने आचरण से भी उदाहरण प्रस्तुत करें। यदि गाली गलत है, तो वह हर मंच पर गलत है; यदि सम्मान जरूरी है, तो वह हर व्यक्ति के लिए जरूरी है; और यदि संवाद लोकतंत्र की पहचान है, तो सवाल पूछने वालों का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है।

भारत का लोकतंत्र किसी एक नेता या एक दल से बड़ा है। इसकी असली ताकत यही है कि यहां सत्ता से सवाल पूछे जा सकते हैं, बहस हो सकती है और मतभेद के बावजूद लोकतांत्रिक मर्यादा कायम रह सकती है।

सत्ता को आलोचना से नहीं, अहंकार से डरना चाहिए। क्योंकि जब सवालों को दुश्मनी समझ लिया जाता है, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है।

...............................असित भट्टाचार्य,, जमीनी आवाज