नक्सलवाद की प्रेम कहानी---- जमीनी आवाज के जमशेदपुर ब्यूरो चीफ विजय कुमार गोप की रिपोर्ट

आमतौर पर नक्सलवाद से जुड़ी खबरें बंदूक, बारूद और मुठभेड़ के इर्द-गिर्द लिखी जाती हैं। लेकिन सरायकेला-खरसावां में सामने आई एक कहानी के भीतर नक्सलवाद का वह चेहरा दिखाई देता है, जिसमें कम उम्र, गरीबी, प्रलोभन, प्रेम, संगठन और अंततः सलाखें—सब एक ही कहानी में समा गए हैं।

5 अगस्त को नीमडीह थाना क्षेत्र में दलमा वाइल्डलाइफ सेंचुरी की तराई में सुरक्षा बलों के संयुक्त सर्च ऑपरेशन के दौरान दो कथित हार्डकोर नक्सलियों को हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार किए गए मीना पहाड़िया और सागर सिंह सरदार सिर्फ संगठन के साथी नहीं थे। पुलिस सूत्रों और उपलब्ध जानकारी के अनुसार दोनों करीब 16 वर्षों से साथ थे और संगठन के भीतर ही उन्होंने शादी कर ली थी।

लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल प्रेम नहीं है। सवाल यह है कि आखिर दो नाबालिग बच्चे उस उम्र में जंगल और बंदूक तक पहुंचे कैसे?

11 साल की उम्र में जंगल पहुंची मीना

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के बलरामपुर थाना क्षेत्र के बढ़कोचा टोला, आमकोचा गांव की रहने वाली मीना पहाड़िया के परिजनों के अनुसार वह बेहद कम उम्र में नक्सली संगठन के संपर्क में आई थी। पिता स्वर्गीय सुखू पहाड़िया की मृत्यु के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी और मां मोनी पहाड़िया जंगल से सूखी लकड़ी बेचकर परिवार चलाती थीं।

परिजनों का आरोप है कि परिवार को सरकारी नौकरी दिलाने का लालच देकर मीना को संगठन में ले जाया गया। उस समय उसकी उम्र महज 11 वर्ष बताई जाती है।

परिवार के मुताबिक, घर से निकलने के बाद मीना फिर वापस नहीं लौटी। वर्षों बाद जब परिवार ने उसे देखा तो उसके लिए अपनी ही बेटी को पहचानना मुश्किल हो गया।

और सबसे कड़वा सवाल यहीं खड़ा होता है—जिस सरकारी नौकरी के सपने के नाम पर बेटी जंगल चली गई, क्या वह सपना कभी पूरा हुआ?

आज भी परिवार के पास उस वादे की जगह अभाव है। परिजनों के अनुसार परिवार मिट्टी की दीवार और टीन के छप्पर वाले घर में रहता है और पानी के लिए जंगल के झरने पर निर्भर है। खराब पड़े सोलर पंप से लेकर दूर स्वास्थ्य केंद्र तक की समस्या ग्रामीण जीवन की तस्वीर सामने रखती है।

12 साल का सागर भी पहुंच गया था बंदूक की दुनिया में

दूसरी तरफ सागर सिंह सरदार नीमडीह थाना क्षेत्र के टेगाडीह पंचायत अंतर्गत बेनाडीह टोला का रहने वाला बताया गया है। परिवार के अनुसार वर्ष 2008 में महज 12 साल की उम्र में वह दलमा क्षेत्र के तत्कालीन हार्डकोर नक्सली एवं एरिया कमांडर रहे स्वर्गीय महावीर खड़िया के संपर्क में आया और संगठन से जुड़ गया।

एक तरफ मीना—जिसे परिवार के अनुसार 11 वर्ष की उम्र में संगठन तक पहुंचाया गया। दूसरी तरफ सागर—जो 12 साल की उम्र में जंगल और संगठन की दुनिया में चला गया।

दोनों की उम्र उस समय खेलने, पढ़ने और स्कूल जाने की थी; लेकिन उनकी जिंदगी जंगल, संगठन और हथियारों के बीच चली गई।

जंगल में मिले, प्रेम हुआ और वहीं कर ली शादी

संगठन में रहने के दौरान मीना और सागर की मुलाकात हुई। धीरे-धीरे दोनों के बीच संबंध बने और उन्होंने संगठन के भीतर ही शादी कर ली।

करीब 16 वर्षों तक दोनों एक साथ दस्ते में रहे।

यह कहानी जितनी व्यक्तिगत है, उतनी ही बड़ी सामाजिक तस्वीर भी सामने रखती है। दो परिवार अपने बच्चों से दूर रहे, दोनों ने अपनी जवानी जंगल में गुजार दी और जिस व्यवस्था या संगठन ने उन्हें बेहतर जिंदगी के सपने दिखाए, उसका अंतिम पड़ाव अब जेल की सलाखें बन गया।

5 अगस्त को संयुक्त सर्च ऑपरेशन में दोनों की हथियारों के साथ गिरफ्तारी के बाद उनकी 16 साल लंबी साथ की जिंदगी अचानक एक नए मोड़ पर पहुंच गई। फिलहाल पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां दोनों से पूछताछ कर रही हैं।

'क्रांति' के नारों के बीच परिवारों के हिस्से में क्या आया?

इस कहानी का सबसे गंभीर पहलू यही है।

अगर परिजनों के आरोप सही हैं कि सरकारी नौकरी और बेहतर भविष्य का लालच देकर कम उम्र की मीना को संगठन में ले जाया गया, तो सवाल सिर्फ नक्सलवाद से नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों से भी है जिनका फायदा उठाकर बच्चों को जंगल तक पहुंचाया गया।

और अगर 11 और 12 साल की उम्र में बच्चे संगठन के संपर्क में पहुंच गए, तो सवाल यह भी है कि उनके स्कूल, गांव, परिवार और प्रशासनिक तंत्र ने उन्हें समय रहते क्यों नहीं रोका?

नक्सल संगठन जिन सपनों, बदलाव और व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष के दावे करता रहा, उसके बावजूद इन परिवारों की मौजूदा स्थिति खुद एक बड़ा सवाल खड़ी करती है।

वादे अगर सच थे तो परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं से जूझ क्यों रहे हैं? क्रांति अगर बेहतर भविष्य के लिए थी तो इन बच्चों का भविष्य जंगल में क्यों बीता? और सबसे बड़ा सवाल—कम उम्र के बच्चों को बंदूक तक पहुंचाने वाली उस सोच और नेटवर्क पर निर्णायक प्रहार कब होगा?

सरकार के सामने भी बड़ी चुनौती

सुरक्षा बलों के लगातार अभियान से नक्सल गतिविधियों पर दबाव बढ़ने के बीच यह मामला एक दूसरे मोर्चे की ओर भी ध्यान खींचता है—नक्सल प्रभावित और सीमांत इलाकों में विकास और पुनर्वास।

सड़क, शिक्षा, पेयजल, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं यदि गांवों तक प्रभावी ढंग से पहुंचती हैं तो किसी भी संगठन के लिए गरीबी और अभाव को हथियार बनाकर युवाओं को अपने साथ जोड़ना कठिन होगा।

मीना और सागर की कहानी का अंत गिरफ्तारी के साथ हुआ है। लेकिन असली सवाल अभी बाकी है—क्या जंगल से दो हथियार बरामद कर लेने भर से कहानी खत्म हो जाती है, या उन परिस्थितियों को भी खत्म करना होगा जो किसी 11-12 साल के बच्चे को बंदूक की दुनिया तक पहुंचाती हैं?

कानून अपना काम करेगा। पूछताछ होगी, जांच होगी और अदालत में आगे की प्रक्रिया चलेगी।

लेकिन इन दोनों परिवारों की कहानी शायद तब पूरी होगी, जब जंगल में बंदूक नहीं, स्कूल दिखाई देगा; झरने का पानी नहीं, घर-घर नल पहुंचेगा; और रोजगार का झूठा प्रलोभन नहीं, गांव में वास्तविक अवसर मिलेगा।

16 साल की यह 'प्रेम कहानी' अब सलाखों के पीछे है—लेकिन इसके पीछे छिपे सवाल अभी खुले हैं।