सरायकेला... जमीनी आवाज के ब्यूरो चीफ विजय कुमार गोप की रिपोर्ट....
देश 15 अगस्त को आजादी की 79वीं वर्षगांठ मनाएगा। राजधानी से लेकर गांवों तक तिरंगा फहराया जाएगा, देश के विकास और उपलब्धियों की तस्वीर पेश की जाएगी। लेकिन इन जश्नों के बीच अयोध्या पहाड़ की बीहड़ों में रहने वाले पहाड़िया परिवारों की जिंदगी सरकार के विकास के दावों पर एक ऐसा सवाल खड़ा करती है, जिसका जवाब जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के अयोध्या पहाड़ के दुर्गम जंगलों में बलरामपुर और बागमुंडी थाना क्षेत्र के बीच छिटपुट रूप से बसे करीब 4-5 पहाड़िया परिवार आज भी सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, पेयजल और पक्के आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं। इनके लिए जंगल ही रोजगार है, जंगल ही बाजार और जंगल ही जीवन का सहारा।
इन परिवारों के लोग जंगल से सूखी लकड़ी, कांद-मूल, शाल पत्ता और दातून जुटाकर बलरामपुर तथा बागमुंडी के बाजारों में बेचते हैं। इसी छोटी-सी आमदनी से किसी तरह परिवार का पेट पलता है।
लेकिन सबसे भयावह तस्वीर तब सामने आती है, जब घर में कोई महिला गर्भवती होती है।
स्थानीय निवासी सुमित्रा पहाड़िया के अनुसार, प्रसव पीड़ा शुरू होने पर गर्भवती महिला को खटिया पर लादकर 6 से 8 किलोमीटर तक जंगल और पहाड़ का दुर्गम रास्ता पार कर सड़क तक पहुंचाना पड़ता है। सड़क तक पहुंचने के बाद ही किसी वाहन की उम्मीद की जा सकती है। आपात स्थिति में यह सफर किसी मां और उसके होने वाले बच्चे के लिए कितना जोखिम भरा हो सकता है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
2014 में स्कूल खुला, लेकिन बाकी सुविधाएं अब भी दूर
वर्ष 2014 में बागमुंडी-1 के बड़गोड़ा गांव में प्राथमिक विद्यालय जरूर खोला गया, लेकिन इन परिवारों की मूलभूत समस्याओं का समाधान आज भी नहीं हो सका है।
पक्की सड़क नहीं है। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर पैदल चलना भी मुश्किल है। पीने के लिए शुद्ध पानी की व्यवस्था नहीं है और परिवार झरने के पानी पर निर्भर हैं। आसपास आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य केंद्र जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
कई परिवार आज भी मिट्टी की दीवार और टीन की छत वाले घरों में रहते हैं। जमीन पर सोकर रात गुजारना उनकी मजबूरी है।
पर्यटन के लिए योजनाएं, लेकिन पहाड़िया परिवारों तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं!
अयोध्या पहाड़ को पर्यटन के लिहाज से विकसित करने के लिए योजनाएं और दावे सामने आते रहे हैं। लेकिन उसी पहाड़ की दुर्गम बस्तियों में रहने वाले इन परिवारों के घर तक पहुंचने के लिए आज भी पक्की सड़क नहीं है।
सरकार से सवाल है—जिस पहाड़ को पर्यटकों तक पहुंचाने की योजना बनाई जा रही है, वहां रहने वाले नागरिकों तक सरकार की बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं पहुंच पा रहीं?
घटती आबादी और बढ़ता पलायन—कौन बचाएगा इनका भविष्य?
अभाव और रोजगार के संकट ने इस समुदाय के सामने पलायन की मजबूरी खड़ी कर दी है। कई पुरुष रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर जा चुके हैं। पीछे रह गए परिवार जंगल पर निर्भर होकर अपना जीवन चला रहे हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आधुनिक भारत की विकास यात्रा से दूर इन परिवारों में ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाया जाता है, इसकी पूरी जानकारी तक नहीं है। उनका पूरा जीवन जंगल और पहाड़ की सीमाओं में सिमटा हुआ है।
कागजों पर योजनाएं बहुत, जमीन पर सुविधाएं कब?
आदिम जनजातियों और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के उत्थान के लिए केंद्र और राज्य सरकारें अनेक योजनाएं चलाने का दावा करती हैं। लेकिन अयोध्या पहाड़ के ये परिवार उन योजनाओं की जमीनी पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
सरकार से सीधे सवाल—
- क्या आजादी के 79 साल बाद भी किसी गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए खटिया पर 6-8 किलोमीटर जंगल पार करना जरूरी है?
- क्या बिजली, सड़क, स्वच्छ पेयजल और स्वास्थ्य सुविधा मांगना इन परिवारों के लिए बहुत बड़ी मांग है?
- क्या विकास और पर्यटन की योजनाओं में उन लोगों का कोई स्थान नहीं, जो पीढ़ियों से इसी पहाड़ और जंगल में रह रहे हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—जब सरकार देश के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने की बात करती है, तो अयोध्या पहाड़ के इन पहाड़िया परिवारों तक वह विकास आखिर कब पहुंचेगा?
15 अगस्त को जब देश तिरंगे के नीचे आजादी का जश्न मनाएगा, तब अयोध्या पहाड़ के इन परिवारों के घरों में शायद फिर वही अंधेरा होगा।
आजादी का जश्न तभी सार्थक होगा, जब उसकी रोशनी उन घरों तक भी पहुंचे, जहां आज तक सड़क, बिजली और इलाज इंतजार कर रहे हैं।





