श्रेया के बाद पिता सुब्रतो सिन्हा की भी मौत, कई जिंदगी मौत से जूझ रही—60 वर्षीय सुरेश भगत का पैर काटने की नौबत

चालक पर कार्रवाई के बाद भी गाड़ी के मालिक तक पुलिस क्यों नहीं पहुंची? हादसे के बाद से वाहन मालिक की तलाश पर उठ रहे गंभीर सवाल

घाटशिला। असित भट्टाचार्य

2 सितंबर की वह शाम… अमाईनगर पुल पर रेनॉल्ट ट्राइबर Jh-05-DK-0236 जैसे यमराज का रूप लेकर आई और कई परिवारों की जिंदगी बदल गई।

इस हादसे में एक ही परिवार के चार लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। पांच वर्षीय श्रेया कृष्णा सिन्हा ने 3 सितंबर को दम तोड़ दिया। इसके बाद 9 सितंबर को उसके पिता सुब्रतो सिन्हा (41) की भी मौत हो गई।

एक ही हादसा… एक ही परिवार की दो मौतें… और कई परिवार आज भी दर्द में।

लेकिन इन मौतों के बीच एक सवाल लगातार खड़ा है—आखिर Jh-05-DK-0236 किसकी गाड़ी है? क्या पुलिस ने वाहन के वास्तविक मालिक की पहचान कर ली है? अगर पहचान हो गई है तो मालिक अब तक पुलिस की गिरफ्त में क्यों नहीं है? और अगर पहचान नहीं हुई है तो सवाल और गंभीर है—इतने महत्वपूर्ण वाहन के मालिक तक पुलिस क्यों नहीं पहुंच पा रही?

सूत्रों के दावे ने बढ़ाई जांच की जरूरत

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार यह रेनॉल्ट ट्राइबर गुरुचरण भगत से जुड़ी बताई जा रही है। बताया जा रहा है कि वह मुसाबनी में मोटर गैरेज का काम करता था और उसका संबंध पिछली गांव से बताया जा रहा है।

सूत्रों का दावा है कि हादसे के बाद से गुरुचरण भगत और उसके परिवार के लोग अपने ठिकाने पर नहीं हैं।

यह भी जानकारी सामने आ रही है कि गुरुचरण भगत की बेटी शोभा भगत जमशेदपुर के TMH में कार्यरत है और सूत्रों के अनुसार गुरुचरण के उसके पास होने की संभावना जताई जा रही है।

इन सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि और पुलिस जांच आवश्यक है।

एक अन्य महत्वपूर्ण जानकारी यह भी सामने आई है कि वाहन फाइनेंस पर लिया गया हो सकता है। अगर ऐसा है तो सवाल और सीधा है—वाहन का पंजीकृत मालिक कौन है? फाइनेंसर कौन है? वाहन किसके नाम पर है? हादसे के वक्त वाहन कौन चला रहा था? और हादसे के बाद वाहन मालिक की भूमिका क्या रही?

इन सवालों का जवाब वाहन के दस्तावेज और आधिकारिक जांच से सामने आ सकता है।

मालिक की तलाश इसलिए जरूरी है, क्योंकि पीड़ितों का इलाज कौन कराएगा?

सवाल सिर्फ गाड़ी के मालिक को खोजने का नहीं है। सवाल उन परिवारों का है, जिनके घरों में इस हादसे के बाद जिंदगी का संघर्ष शुरू हो गया है।

60 वर्षीय सुरेश भगत गंभीर रूप से घायल हैं। डॉक्टरों ने उनके पैर को काटने की बात कही है। उनका इलाज परिवार और आसपास के लोगों द्वारा चंदा जुटाकर कराया जा रहा है।

अब सवाल है—सुरेश भगत का इलाज कौन कराएगा? उनकी पत्नी शर्मिला भगत और बेटे अजय भगत का भविष्य कौन संभालेगा? हादसे में घायल बाकी लोगों के इलाज का खर्च कौन उठाएगा? पीड़ित परिवारों को मुआवजा कौन देगा? क्या इन परिवारों को सिर्फ संवेदना मिलेगी, या उनकी जिंदगी बचाने की जिम्मेदारी भी कोई उठाएगा?

एक कार, दो मौतें और अनगिनत सवाल

2 सितंबर को अमाईनगर पुल पर हुआ हादसा अब सिर्फ सड़क दुर्घटना की खबर नहीं रह गया है।

यह सवाल बन चुका है कि—वाहन किसका था? वाहन का मालिक कौन है? वाहन की स्थिति क्या थी? वाहन के कागजात दुरुस्त थे या नहीं? चालक की भूमिका क्या थी? और हादसे के बाद वाहन से जुड़े लोगों की भूमिका क्या रही?

इन सभी सवालों का जवाब जांच से मिलना चाहिए। क्योंकि दो जिंदगियां जा चुकी हैं और कई लोग आज भी जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं।

जमीनी आवाज का सीधा सवाल—गाड़ी मालिक कहां है?

एक कार आई। कई लोगों को घायल कर गई। एक मासूम चली गई। कुछ दिन बाद उसका पिता भी चला गया। कई परिवार आज भी अस्पतालों और इलाज के खर्च से जूझ रहे हैं।

तो फिर—गाड़ी मालिक कहां है?

अगर मालिक निर्दोष है तो जांच के सामने आए। अगर वाहन किसी और के नाम पर है तो दस्तावेज सामने आएं। अगर वाहन फाइनेंस पर है तो पंजीकृत मालिक और फाइनेंसर की जानकारी जांच में सामने आए। और अगर किसी की लापरवाही साबित होती है तो कानून के मुताबिक कार्रवाई हो।

पुलिस के पास वाहन का नंबर है। वाहन का रिकॉर्ड है। आरटीओ का रिकॉर्ड है। फाइनेंस का रिकॉर्ड भी जांच का हिस्सा बन सकता है।

तो फिर सवाल वही है—दो मौतों के बाद भी Jh-05-DK-0236 के मालिक तक पुलिस क्यों नहीं पहुंच पाई?

श्रेया वापस नहीं आएगी। सुब्रतो सिन्हा भी वापस नहीं आएंगे। लेकिन उनकी मौत के बाद अगर जिम्मेदारी तय नहीं हुई, तो अगली श्रेया और अगला सुब्रतो कौन होगा?

जमीनी आवाज की मांग है कि अमाईनगर हादसे की निष्पक्ष और व्यापक जांच हो। वाहन के पंजीकृत मालिक, चालक, वाहन की फिटनेस, बीमा, फाइनेंस और हादसे से जुड़े तमाम पहलुओं की जांच की जाए तथा जो भी जिम्मेदार पाया जाए, उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई हो।

यह सिर्फ एक परिवार की लड़ाई नहीं है। यह सड़क पर सुरक्षित जिंदगी के अधिकार की लड़ाई है।