घाटशिला.... असित भट्टाचार्य.....
आज घाटशिला उदास है। आज सिर्फ एक परिवार नहीं रो रहा, बल्कि घाटशिला की संवेदनाएं रो रही हैं। कल रात करीब 8:15 बजे अमाईनगर पुल के पास हुई एक भयावह सड़क दुर्घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया। तेज रफ्तार कार ने सड़क पर चल रहे लोगों को अपनी चपेट में ले लिया। इस दर्दनाक हादसे में घायल हुई मासूम श्रेया कृष्णा सिन्हा ने आज सुबह जिंदगी की जंग हार दी।
बिना किसी गलती के एक मासूम की जिंदगी खत्म हो गई। और आज भी कई लोग अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
कार चालक गोवर्धन पातर पर अत्यधिक तेज गति से वाहन चलाने का आरोप है। प्रत्यक्ष रूप से सामने आई जानकारी के अनुसार कार की रफ्तार इतनी तेज थी कि उसने गोपालपुर निवासी सुब्रत सिन्हा, सुष्मिता सिन्हा, शुभ्रदीप कृष्णा सिन्हा और मासूम श्रेया कृष्णा सिन्हा समेत कई लोगों को अपनी चपेट में ले लिया। अन्य घायलों में सुरेश भगत और नेहा वर्मा के भी घायल होने की जानकारी सामने आई है।
धक्का इतना भयानक कि सुष्मिता सिन्हा स्वर्णरेखा नदी में जा गिरीं
हादसे का सबसे भयावह दृश्य वह था, जब कार की टक्कर से सुष्मिता सिन्हा स्वर्णरेखा नदी में जा गिरीं और पानी के तेज बहाव में बहने लगीं।
रात के अंधेरे में एक परिवार की सदस्य नदी की धारा में बह रही थी और दूसरी तरफ सड़क पर लोग खून से लथपथ पड़े थे।
स्थानीय ग्रामीणों और बचाव में जुटे लोगों की मदद से सुष्मिता सिन्हा को हरिनदुगुड़ी के पास जीवित अवस्था में नदी से बाहर निकाला गया। देर रात तक प्रशासन, पुलिस और ग्रामीण अमाईनगर पुल और आसपास के इलाके में खोजबीन तथा राहत कार्य में जुटे रहे।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने घाटशिला के सामने सिर्फ सड़क दुर्घटना का सवाल नहीं छोड़ा है। इसने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब व्यवस्था को देना होगा।
एक मासूम स्ट्रेचर पर पड़ी रही... और वक्त निकलता गया!
दुर्घटना के बाद सबसे दर्दनाक तस्वीर घाटशिला अनुमंडल अस्पताल की व्यवस्था को लेकर सामने आई।
जानकारी के अनुसार, गंभीर रूप से घायल मासूम बच्ची अस्पताल के बरामदे में स्ट्रेचर पर पड़ी रही। उसका शरीर खून से लथपथ था और उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी।
सवाल है—
क्या घाटशिला जैसे बड़े अनुमंडल में गंभीर रूप से घायल मरीज को समय पर बेहतर उपचार और तत्काल रेफर करने की व्यवस्था नहीं हो सकती?
क्या जरूरत के समय एंबुलेंस की उपलब्धता सुनिश्चित करना प्रशासन और स्वास्थ्य व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं है?
बताया गया कि स्थानीय ऑटो चालक मुजफ्फर खान ने इंसानियत दिखाते हुए घायल बच्ची को अनुमंडल अस्पताल पहुंचाने में मदद की। अन्य घायलों को भी अस्पताल पहुंचाया गया।
इस बीच स्थानीय होटल व्यवसायी और सामाजिक रूप से सक्रिय रिंकू सिंह ने भी आगे बढ़कर घायल बच्ची को अपनी गाड़ी से अस्पताल पहुंचाया और आवश्यक प्रक्रिया पूरी कराकर उसे भर्ती कराने में सहयोग किया। देर रात करीब 1:14 बजे ब्लड बैंक से बच्ची के लिए रक्त की व्यवस्था की गई।
लेकिन सवाल फिर वही है—
जब एक मासूम जिंदगी बचाने के लिए आम लोग, ऑटो चालक और स्थानीय नागरिक दौड़ रहे थे, तब सरकारी व्यवस्था कहां थी?
क्या घाटशिला में एंबुलेंस भी वक्त पर नहीं मिल सकती?
यह सवाल आज केवल एक परिवार का नहीं है। यह सवाल पूरे घाटशिला विधानसभा क्षेत्र का है।
हर बड़ी घटना के बाद अस्पताल की व्यवस्था, एंबुलेंस की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर आवाज उठती है। कुछ दिन बहस होती है। अधिकारी बयान देते हैं। आश्वासन मिलते हैं।
फिर... सन्नाटा छा जाता है।
लेकिन जब अगली दुर्घटना होती है, जब कोई मां अपने बच्चे को बचाने के लिए रोती है, जब कोई घायल सड़क या अस्पताल के बरामदे में जिंदगी के लिए संघर्ष करता है—तब वही सवाल फिर जिंदा हो जाता है।
क्या हम किसी और मासूम की मौत का इंतजार कर रहे हैं?
थाना प्रभारी की छटपटाहट और व्यवस्था की बेबसी
इस भयावह रात में घाटशिला थाना प्रभारी राजेंद्र कुमार मुंडा की बेचैनी भी दिखाई दी। दुर्घटना के बाद पुलिस और प्रशासनिक स्तर पर बचाव कार्य तथा घायलों की मदद के प्रयास किए गए।
लेकिन पुलिस की तत्परता और स्थानीय लोगों की इंसानियत के बावजूद एक कड़वा सच सामने खड़ा है—
जरूरत के समय यदि एंबुलेंस और त्वरित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं हो, तो जिम्मेदार कौन होगा?
पुलिसकर्मी, ग्रामीण और आम नागरिक अपनी क्षमता के अनुसार दौड़ सकते हैं। लेकिन क्या व्यवस्था की जिम्मेदारी भी आखिरकार आम लोगों के कंधे पर छोड़ दी जाएगी?
आज घाटशिला सिर्फ दुखी नहीं, सवाल पूछ रहा है
मासूम श्रेया कृष्णा सिन्हा अब इस दुनिया में नहीं है। उसकी मौत के साथ एक परिवार का भविष्य बदल गया। उसके घर की खुशियां उजड़ गईं।
लेकिन यह कहानी केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है।
यह सड़क पर बेलगाम रफ्तार की कहानी है।
यह अस्पताल की तैयारियों पर सवाल है।
यह एंबुलेंस व्यवस्था की परीक्षा है।
यह प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल है।
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या किसी मासूम की जान जाने के बाद भी घाटशिला की व्यवस्था नहीं जागेगी?
जमीनी आवाज इस घटना को केवल एक सड़क दुर्घटना मानकर भुलाने नहीं जा रही है। आज से हम इस सवाल को उठाएंगे—
उस रात क्या हुआ?
कौन कहां था?
घायलों को अस्पताल पहुंचाने में कितना समय लगा?
एम्बुलेंस की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकी?
मासूम बच्ची को समय पर बेहतर इलाज क्यों नहीं मिल पाया?
और आखिरकार, क्या इस मौत की जिम्मेदारी सिर्फ तेज रफ्तार कार पर खत्म हो जाएगी?
आज घाटशिला के नाम एक ब्लैक डे है।
एक मासूम चली गई।
कई लोग जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं।
और घाटशिला... आज जवाब मांग रहा है।
— क्रमशः





