घाटशिला.. असित भट्टाचार्य
यह सिर्फ एक सड़क दुर्घटना नहीं है। यह घाटशिला के लिए ब्लैक डे है।
एक परिवार की आंखों के सामने उसकी दुनिया उजड़ गई। पांच साल की मासूम श्रेया कृष्णा सिन्हा जिंदगी की जंग हार गई। पिता सुब्रतो सिन्हा गंभीर रूप से घायल हैं। मां सुष्मिता सिन्हा—जिन्हें एक बेकाबू कार की टक्कर ने उफनती स्वर्णरेखा नदी में फेंक दिया—चारों ओर अंधेरा, कीचड़, जंगल और तेज बहाव के बीच जिंदगी से लड़ती रहीं।
और सबसे बड़ा सवाल—
आखिर इस परिवार की गलती क्या थी?
बुधवार रात अमाईनगर स्थित स्वर्णरेखा नदी पुल के पास कथित रूप से तेज रफ्तार और अनियंत्रित कार ने कई लोगों और वाहनों को अपनी चपेट में लिया। पुलिस के अनुसार कार चालक की पहचान मुसाबनी निवासी गोवर्धन पातर के रूप में हुई है। स्थानीय लोगों ने चालक के नशे में होने का आरोप लगाया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
लेकिन इस हादसे की भयावहता सिर्फ इतनी नहीं है।
एक टक्कर... और मां उफनती नदी में
टक्कर इतनी जोरदार थी कि सुष्मिता सिन्हा पुल की रेलिंग से नीचे उफनती स्वर्णरेखा नदी में जा गिरीं।
बारिश का मौसम। नदी में तेज बहाव। घनघोर अंधेरा। चारों तरफ कीचड़ और झाड़-जंगल।
ऐसे समय में किसी महिला का नदी में गिरना लगभग मौत के मुंह में जाने जैसा था।
लेकिन सुष्मिता ने हार नहीं मानी।
घटना के बाद पुलिस के साथ स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों ने नदी के किनारे खोज अभियान शुरू किया। टिंकू सिंह और स्थानीय युवाओं ने लगभग साढ़े चार घंटे तक नदी किनारे हरिनडूंगरी की दिशा में तलाश जारी रखी।
फिर अंधेरे के बीच... कराहने की आवाज सुनाई दी।

टिंकू सिंह और युवाओं ने आवाज की दिशा में पहुंचकर सुष्मिता को खोज निकाला।
कीचड़ में लथपथ। गंभीर रूप से घायल। लेकिन जिंदा।
एक ऐसा जीवन, जिसने उस रात मौत को चुनौती दे दी।
कमर से टूटा पैर... फिर भी बच्चों को पुकारती रही मां
बताया जा रहा है कि सुष्मिता का पैर गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त है। इसके बावजूद वह नदी के तेज बहाव में जिंदगी से लड़ती रहीं।
और जब उन्हें बाहर निकाला गया, तब भी उनके मुंह से अपने परिवार की चिंता निकल रही थी—
"पति कहां हैं...? बेटी कहां है...? बेटा कहां है...?"


उन्हें क्या पता था कि उनकी मासूम बेटी श्रेया जिंदगी की जंग हार चुकी है।
ताजा रिपोर्टों के अनुसार पांच वर्षीय श्रेया कृष्णा सिन्हा की TMH में इलाज के दौरान मौत हो गई। सुष्मिता और उनके पति सुब्रतो सिन्हा का इलाज जारी है।
मां को नदी से ग्रामीणों ने निकाला, एंबुलेंस का सवाल फिर खड़ा
यह भी इस घटना का बेहद गंभीर पक्ष है।
इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद घायलों को अस्पताल पहुंचाने के लिए समय पर एंबुलेंस उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई। स्थानीय लोगों ने अपने वाहनों और ऑटो की मदद से घायलों को अस्पताल पहुंचाया। बाद में सुष्मिता को भी बोलेरो से घाटशिला अनुमंडल अस्पताल ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद गंभीर स्थिति को देखते हुए TMH भेजा गया।
सवाल है—जब दुर्घटना इतनी भयावह थी तो सरकारी आपातकालीन व्यवस्था कहां थी?
क्या यह केवल हादसा था या व्यवस्था की भी हार?
स्थानीय लोगों के आरोप हैं कि कार चालक नशे की हालत में था। यदि ऐसा था तो सवाल और गंभीर है—
क्या चालक का मेडिकल परीक्षण हुआ?
उसके रक्त में शराब या किसी अन्य नशीले पदार्थ की जांच हुई?
कार की गति कितनी थी?
क्या वाहन के ब्रेक और अन्य तकनीकी हिस्सों की जांच हुई?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या पुलिस यह जांच करेगी कि चालक ने वाहन चलाने से पहले शराब या कोई अन्य नशीला पदार्थ लिया था या नहीं?
इन सवालों का जवाब सिर्फ चालक को दोषी ठहराने से नहीं मिलेगा। जांच को वैज्ञानिक और निष्पक्ष होना होगा।
घाटशिला की सड़कें कब तक बनती रहेंगी मौत की पटरी?
आज एक परिवार उजड़ा है। लेकिन सवाल सिर्फ आज का नहीं है।
घाटशिला विधानसभा क्षेत्र में लगातार सड़क दुर्घटनाओं में जानें जा रही हैं। कुछ सप्ताह पहले भी मुसाबनी क्षेत्र में सड़क दुर्घटना में एक किशोर की मौत के बाद एंबुलेंस को लेकर गंभीर सवाल उठे थे।
तो सवाल है—
कितनी मौतों के बाद प्रशासन जागेगा?
कितने परिवार उजड़ने के बाद सड़क की रफ्तार पर लगाम लगेगी?
कितनी माताओं की गोद सूनी होने के बाद बैरियर लगाए जाएंगे?
घाटशिला की जनता लगातार मांग कर रही है कि दुर्घटना संभावित स्थानों पर स्पीड बैरियर, पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था, चेतावनी संकेत और प्रभावी ट्रैफिक नियंत्रण सुनिश्चित किया जाए।
लेकिन सवाल फिर वही है—
कौन रोकेगा मौत की रफ्तार?
नेता? प्रशासन? पुलिस?
या फिर हर बार दुर्घटना के बाद आम जनता ही सड़क पर उतरकर अपनी व्यवस्था खुद करेगी?
गोपालपुर का वह घर आज खामोश है
गोपालपुर स्थित सुब्रतो सिन्हा का घर आज जैसे सांस लेना भूल गया है।
जिस घर में आए दिन एक नन्ही बच्ची की किलकारी गूंजती थी, वहां आज सन्नाटा है।
जिस मां को अपने बच्चों की चिंता में नदी के तेज बहाव से लड़ते हुए ग्रामीणों ने जिंदा निकाला, उसे अभी यह भी नहीं पता कि उसकी पांच साल की मासूम बेटी अब इस दुनिया में नहीं है।
एक मां अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रही है। एक पिता गंभीर हालत में है। और एक मासूम बेटी हमेशा के लिए चली गई।
इसके बाद भी अगर घाटशिला की सड़कों पर रफ्तार को रोकने की व्यवस्था नहीं होती, तो सवाल सिर्फ एक चालक पर नहीं रहेगा।
यह सवाल व्यवस्था के कटघरे में भी खड़ा होगा—
क्या श्रेया की मौत सिर्फ एक ड्राइवर की गलती थी?
या फिर उन तमाम व्यवस्थागत कमियों की भी कीमत थी, जिन्हें समय रहते दूर किया जा सकता था?
जमीनी आवाज पूछता है—
घाटशिला को और कितनी लाशें चाहिए, ताकि सड़क पर मौत की रफ्तार रोकने के लिए स्थायी इंतजाम किए जाएं?
अब कार्रवाई होगी या फिर श्रेया की मौत भी बाकी हादसों की तरह कुछ दिनों बाद फाइलों में दब जाएगी?





