घाटशिला... असित भट्टाचार्य
कभी-कभी कोई हादसा सिर्फ जिंदगी नहीं छीनता, बल्कि पूरे सिस्टम का चेहरा सामने ला देता है। घाटशिला का यह दिन भी शायद ऐसी ही एक काली तारीख बन गया है।

सड़क पर घायल पड़े लोग मदद की आस में तड़प रहे थे। अफरा-तफरी थी। किसी को पानी में गिरी महिला को बचाने की चिंता थी, किसी को दुर्घटनाग्रस्त वाहन को थाने तक पहुंचाने की। लेकिन इसी अफरातफरी के बीच एक पांच साल की मासूम श्रेया कृष्णा सिन्हा अपने कटे हुए पैर को पकड़कर रो रही थी।
उसकी जुबान पर अपने दर्द की शिकायत नहीं थी। वह बार-बार सिर्फ यही कह रही थी—
"मेरी मां नदी में गिर गई है… पहले मेरी मां को बचाओ।"
किडजी में पढ़ने वाली यह नन्ही बच्ची शायद यह भी नहीं समझ पा रही थी कि उसका अपना शरीर कितना गंभीर रूप से घायल हो चुका है। दर्द असहनीय था, शरीर से खून बह रहा था, लेकिन मां की चिंता उसके अपने दर्द से बड़ी थी।
मुजफ्फर खान ने इंसानियत दिखाई, सिस्टम कहां था?
इस भयावह स्थिति में ऑटो चालक मुजफ्फर खान ने आगे बढ़कर घायल बच्ची को अपने ऑटो से अनुमंडल अस्पताल पहुंचाया। लेकिन अस्पताल पहुंचने के बाद भी कहानी खत्म नहीं हुई।

बताया गया कि डॉक्टर दूसरे घायलों को देखने में व्यस्त थे और मासूम श्रेया बरामदे में स्ट्रेचर पर पड़ी रही। उसके शरीर से खून रिसता रहा।
एक पांच साल की बच्ची… गंभीर हालत… खून बह रहा था… और तत्काल इलाज तथा एंबुलेंस की व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े होते रहे।
आखिरकार रिंकू सिंह अपनी गाड़ी से बच्ची को लेकर टाटा मेन हॉस्पिटल पहुंचे। उन्होंने खुद बच्ची का एडमिशन कराया और रात करीब 1:14 बजे उसके लिए ब्लड बैंक से खून की व्यवस्था की। बाद में एक और बोतल खून दिया गया। कुल तीन बोतल खून की व्यवस्था की गई।
लेकिन वक्त हाथ से निकल चुका था।
रिंकू सिंह की आंखों में आंसू थे… और फिर आई वह खबर
सुबह जब 'जमीनी आवाज' के संपादक रिंकू सिंह के घर से निकल रहे थे, तब उनकी आंखों में आंसू थे। वह बच्ची को बचाने की पूरी कोशिश के बावजूद उसे न बचा पाने के दर्द में टूटे हुए थे।
इसके करीब दो मिनट बाद ही संपादक के फोन पर रिंकू सिंह का फोन आया।
आवाज में दर्द था।
श्रेया नहीं रही।
इतना कहते-कहते रिंकू सिंह रो पड़े और फोन काट दिया।
जिस बच्ची को वह रात में अपनी गाड़ी से लेकर टीएमएच पहुंचे थे, जिसके लिए उन्होंने खून की व्यवस्था की, जिसके इलाज के लिए उन्होंने अपनी पूरी कोशिश की—वह सुबह जिंदगी की जंग हार चुकी थी।
कल जन्माष्टमी में सजने वाली थी श्रेया… आज तस्वीर बन गई
सबसे दर्दनाक बात यह है कि श्रेया जन्माष्टमी के स्कूल कार्यक्रम को लेकर बेहद उत्साहित थी। उसने सजने के लिए ड्रेस समेत दूसरी चीजें खरीदी थीं और अपने परिवार को दिखाया था।
लेकिन जिस बच्ची को आज अपने स्कूल में कृष्ण जन्माष्टमी के रंग में सजना था, वह आज तस्वीर बन चुकी है।
उसका किडजी स्कूल बंद है। उसके सहपाठी स्तब्ध हैं। शिक्षक दुखी हैं। परिवार टूट चुका है। और पूरा समाज इस सवाल के सामने खड़ा है—
आखिर श्रेया का कसूर क्या था?
गोवर्धन पातर हिरासत में, लेकिन क्या सिर्फ गिरफ्तारी से इंसाफ होगा?
हादसे में रेनॉल्ट चालक गोवर्धन पातर को हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई है। आरोप है कि चालक नशे में था और उसके वाहन की चपेट में कई लोग आए, जिनमें कई लोग जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं।
अगर जांच में नशे में वाहन चलाने और लापरवाही से वाहन चलाने की पुष्टि होती है, तो यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि गंभीर आपराधिक लापरवाही का मामला बन सकता है।
लेकिन सवाल सिर्फ चालक पर कार्रवाई का नहीं है।
क्या उस सिस्टम की भी जवाबदेही तय होगी, जिसने हादसे के बाद एक घायल मासूम को समय पर वह चिकित्सा व्यवस्था नहीं दी, जिसकी उसे जरूरत थी?
कानून अपना रास्ता तय करेगा। आरोपी को आज नहीं तो कल जमानत भी मिल सकती है।
लेकिन—
क्या श्रेया को उसका परिवार दोबारा पा सकेगा?
नहीं।
यही इस ब्लैक डे का सबसे कड़वा सच है।
जमीनी आवाज का सवाल
घाटशिला को आज सिर्फ शोक नहीं चाहिए। जवाब चाहिए।
घटना के बाद एंबुलेंस कहां थी?
घायल बच्ची को तत्काल चिकित्सा क्यों नहीं मिली?
अनुमंडल अस्पताल की आपात व्यवस्था किसके भरोसे थी?
घायलों के लिए तत्काल ट्रॉमा रिस्पॉन्स की व्यवस्था क्यों नहीं थी?
और अगर एक सामाजिक व्यक्ति अपनी निजी गाड़ी से गंभीर घायल बच्ची को टीएमएच ले जा सकता है, तो सरकारी आपात व्यवस्था आखिर किस दिन और किसके लिए काम करेगी?
श्रेया की मौत सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं है। यह घाटशिला की स्वास्थ्य और आपातकालीन व्यवस्था के सामने खड़ा एक कठोर सवाल है।
आज एक मां ने अपनी बच्ची खोई है। और घाटशिला ने एक मासूम नागरिक खोया है।
श्रेया की आखिरी पुकार—"पहले मेरी मां को बचाओ"—अब घाटशिला के सिस्टम से जवाब मांग रही है।
क्रमशः....





