घाटशिला। असित भट्टाचार्य की रिपोर्ट

करीब 15 वर्ष पहले बड़ा घाट के रास्ते पर एक मासूम बच्चा लावारिस हालत में पड़ा मिला था। न उसके साथ कोई पहचान थी, न कोई दावा करने वाला। वह बच्चा किस जाति का था, किस परिवार से था, उसके जन्मदाता कौन थे—आज भी शायद यह सवाल अनुत्तरित है।

लेकिन उस दिन दो लोगों ने एक सवाल का जवाब दिया था—इंसानियत अभी जिंदा है।

कृष्ण लामा और उषा लांबा ने प्रधान और ग्रामीणों से पूछताछ करने के बाद उस मासूम को अपने साथ लिया। उसे सिर्फ छत नहीं दी, घर दिया। सिर्फ खाना नहीं दिया, मां-बाप का प्यार दिया। सिर्फ नाम नहीं दिया, पहचान दी।

कुणाल उनके लिए कोई सड़क से उठाया हुआ बच्चा नहीं था। वह उनका बेटा था।

उसकी पढ़ाई के लिए उसे सूरदास सेंट्रल स्कूल में दाखिला दिलाया गया। सपने देखे गए। उम्मीदें लगाई गईं। जिस बच्चे को जन्म देने वालों ने सड़क पर छोड़ दिया था, उसे इन दोनों ने अपने हाथों से जिंदगी की राह पर चलना सिखाया।

लेकिन जिंदगी ने उसी कुणाल को एक ऐसी सड़क पर पहुंचा दिया, जहां रफ्तार ने उसकी सांसें छीन लीं।

एक पल की रफ्तार और खत्म हो गया 15 साल का सपना

बताया जा रहा है कि स्कूल से छुट्टी के बाद विद्यार्थियों को ले जा रहे मैजिक वाहन में बच्चे सवार थे। इसी दौरान पल्सर बाइक पर सवार दो युवक तेज रफ्तार में आए और मैजिक से टकरा गए। दुर्घटना इतनी गंभीर थी कि वाहन में बैठे कई विद्यार्थी घायल हो गए।

और कुणाल… कुणाल अब कभी घर नहीं लौटेगा।

जिस घर में कभी उसके कदमों की आहट से खुशियां आती थीं, वहां अब उसकी यादें हैं। जिस मां ने उसे जन्म नहीं दिया, लेकिन मां से बढ़कर ममता दी—आज उसी मां की आंखों के सामने उसका बेटा हमेशा के लिए चला गया। जिस पिता ने उसे अपना नाम दिया—आज वही पिता शायद खुद से पूछ रहे होंगे—“मैंने उसे सड़क से उठाया था… क्या सड़क ही उसे मुझसे छीन लेगी?”

कुणाल की जाति मत पूछिए… उसकी कहानी पूछिए

आज अगर कोई यह पूछे कि कुणाल किस जाति का था, तो यह सवाल शायद इस कहानी के सामने सबसे छोटा सवाल है। उसकी जाति क्या थी, इससे बड़ा सवाल यह है कि उसे इंसान किसने बनाया? जन्म देने वालों की पहचान नहीं थी। लेकिन पालने वालों की पहचान थी—मानवता।

कृष्ण लामा और उषा लांबा ने कुणाल को सिर्फ पाल-पोसकर बड़ा नहीं किया। उन्होंने उसे शिक्षा दी, संस्कार दिए और समाज में सिर उठाकर जीने का अवसर दिया। इसलिए कुणाल की मौत सिर्फ एक सड़क दुर्घटना नहीं है। यह उस इंसानियत पर भी चोट है, जिसने 15 साल पहले सड़क किनारे पड़े एक लावारिस बच्चे को जिंदगी दी थी।

अब पुलिस प्रशासन जवाब दे—सिर्फ पंचनामा काफी नहीं!

दुर्घटनाएं हमेशा केवल हादसे नहीं होतीं। कई बार उनके पीछे लापरवाही, तेज रफ्तार, यातायात नियमों की अनदेखी और व्यवस्था की कमजोर निगरानी भी सवाल बनकर खड़ी होती है। इसलिए जमीनी आवाज पुलिस प्रशासन से पूछता है—

1. क्या दुर्घटना की पूरी और निष्पक्ष जांच होगी? क्या पुलिस यह स्पष्ट करेगी कि दुर्घटना कैसे हुई और जिम्मेदारी किसकी थी?

2. बाइक की वास्तविक रफ्तार कितनी थी? क्या पुलिस ने वाहन की स्थिति, तकनीकी साक्ष्य और उपलब्ध सीसीटीवी/प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्यों की जांच की है?

3. बाइक पर सवार दोनों युवकों की भूमिका क्या थी? क्या दोनों की पहचान, ड्राइविंग लाइसेंस और वाहन संबंधी दस्तावेजों की जांच की गई?

4. क्या तेज रफ्तार के खिलाफ नियमित कार्रवाई हो रही है? अगर सड़क पर रफ्तार लगातार जान ले रही है, तो पुलिस और परिवहन विभाग की निगरानी व्यवस्था आखिर कहां है?

5. स्कूल वाहनों और बच्चों की सुरक्षा की जांच कौन करेगा? क्या प्रशासन यह सुनिश्चित कर रहा है कि स्कूल से आने-जाने वाले बच्चों की सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक मानकों का पालन हो रहा है?

6. घायल बच्चों की जिम्मेदारी कौन लेगा? दुर्घटना में घायल विद्यार्थियों के इलाज, सुरक्षा और परिवारों को आवश्यक सहायता के लिए प्रशासन ने क्या कदम उठाए?

7. क्या कुणाल के परिवार को न्याय मिलेगा? उस परिवार ने कुणाल को जन्म नहीं दिया, लेकिन 15 साल तक अपना बेटा बनाकर पाला। क्या प्रशासन उस परिवार की पीड़ा और उनके अधिकारों को भी गंभीरता से देखेगा?

8. आखिर अगला कुणाल कब तक? क्या प्रशासन किसी और परिवार के घर मातम पहुंचने का इंतजार करेगा, या इस दुर्घटना के बाद सड़क सुरक्षा को लेकर ठोस कार्रवाई जमीन पर दिखाई देगी?

यह खबर खत्म नहीं हुई… असली सवाल अब शुरू हुआ है

कुणाल चला गया। लेकिन उसकी कहानी यहीं खत्म नहीं होनी चाहिए। एक लावारिस बच्चा सड़क किनारे पड़ा था—दो इंसानों ने उसे उठाया और अपना बना लिया। उन्होंने कुणाल से उसकी जाति नहीं पूछी थी। आज समाज को भी जाति नहीं पूछनी चाहिए।

आज सवाल पूछना चाहिए—क्या उसकी मौत के लिए जिम्मेदारी तय होगी? क्या रफ्तार पर लगाम लगेगी? क्या घायल बच्चों की आवाज सुनी जाएगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या कृष्ण लामा और उषा लांबा जैसे माता-पिता को सिर्फ अपने बेटे की लाश मिलेगी, या व्यवस्था उन्हें न्याय भी देगी?

जमीनी आवाज किसी को पहले से दोषी घोषित नहीं करता। लेकिन जमीनी आवाज यह भी साफ कहना चाहता है—अगर सड़क पर किसी की लापरवाही से एक जिंदगी जाती है, तो उसे महज "दुर्घटना" कहकर फाइल बंद नहीं होनी चाहिए।

कुणाल जन्म से लावारिस था। लेकिन उसे लावारिस मरने नहीं दिया गया था। उसे दो इंसानों ने अपना बनाया था। आज वही दो इंसान फिर अकेले खड़े हैं।

अब देखना यह है कि पुलिस प्रशासन उनके साथ खड़ा होता है या यह कहानी भी बाकी हादसों की तरह कागजों में दफन हो जाती है।

जमीनी आवाज पूछता रहेगा। जवाब प्रशासन को देना होगा।