घाटशिला। असित भट्टाचार्य की रिपोर्ट
झारखंड में छात्रों और युवाओं के भविष्य को लेकर राजनीतिक दलों का आंदोलन कोई नई बात नहीं है। राजधानी रांची में छात्रों के सवाल पर प्रदर्शन, धरना और घेराव के जरिए भाजपा सहित तमाम राजनीतिक दल सरकार को घेरते रहे हैं। मंचों से युवाओं के भविष्य, रोजगार और उनके अधिकारों की चिंता जताई जाती है। लेकिन इसी झारखंड में घाटशिला से मुख्यमंत्री सारथी योजना को लेकर जो सवाल सामने आए हैं, वे राजनीति से कहीं ज्यादा गंभीर हैं।
सवाल यह है कि जिस झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में है, उसी सरकार की महत्वपूर्ण मुख्यमंत्री सारथी योजना के क्रियान्वयन में भाजपा से जुड़े लोगों का इतना प्रभाव कैसे है? और उससे भी बड़ा सवाल—क्या सरकार की योजना का लाभ वास्तविक छात्रों को मिल रहा है या कागजों पर छात्र बनाकर सरकारी राशि का खेल किया जा रहा है?
मुख्यमंत्री सारथी योजना का उद्देश्य ही ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर रोजगार से जोड़ना है। सरकार के आधिकारिक विवरण के अनुसार युवाओं को निःशुल्क प्रशिक्षण, परिवहन भत्ता और प्रशिक्षण के बाद निर्धारित समय में रोजगार नहीं मिलने पर रोजगार प्रोत्साहन भत्ता देने का प्रावधान है। ऐसे में घाटशिला से सामने आया मामला यदि जांच में सही पाया जाता है तो यह केवल किसी एक प्रशिक्षण केंद्र की अनियमितता नहीं होगी, बल्कि सरकार की पूरी कौशल विकास व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल होगा।
भाजपा नेता से जुड़ा केंद्र, JMM सरकार की योजना—फिर सवाल क्यों न उठे?
घाटशिला में मुख्यमंत्री सारथी योजना के तहत प्रशिक्षण से जुड़ी निर्माण सर्विस प्राइवेट लिमिटेड को लेकर शिकायत अनुमंडल पदाधिकारी के कार्यालय तक पहुंच चुकी है। उपलब्ध कंपनी रिकॉर्ड में सुशील कुमार दुबे इस कंपनी के निदेशक के रूप में दर्ज हैं। वहीं, शिकायतकर्ता और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध तस्वीरों में सुशील दुबे को भाजपा से जुड़े राजनीतिक व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जमीनी आवाज़ के पास सुशील दुबे के भाजपा नेताओं के साथ होने की तस्वीर भी उपलब्ध है।
इसलिए सवाल किसी राजनीतिक दल के खिलाफ सामान्य आरोप का नहीं है। सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री सारथी योजना के तहत काम करने वाली एजेंसी/केंद्रों के चयन और संचालन में राजनीतिक संबद्धता की कोई जांच होती है? क्या सरकार यह देखती है कि सरकारी योजना का संचालन करने वाली संस्था के संचालकों की राजनीतिक भूमिका क्या है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या राजनीतिक प्रभाव के कारण सरकारी योजना की निगरानी कमजोर तो नहीं पड़ रही? इन सवालों का जवाब सरकार और संबंधित विभाग को देना चाहिए।
अनुमंडल कार्यालय में शिकायत—आरोपों का पुलिंदा
बीते दिनों घाटशिला अनुमंडल पदाधिकारी के कार्यालय में एक लिखित आवेदन दिया गया। आवेदन पर अनुमंडल कार्यालय की प्राप्ति मुहर भी दिखाई दे रही है। शिकायत में प्रशिक्षणार्थियों के नामांकन, बैच, उपस्थिति और प्रशिक्षण प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि जिन बैचों में निर्धारित संख्या में विद्यार्थी होने चाहिए, उनमें वास्तविक विद्यार्थी कम रहते हैं, इसके बावजूद कागजों में बैच पूरा दिखाया जाता है। शिकायत में कथित तौर पर यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ विद्यार्थियों की जगह दूसरे लोगों की पहचान का इस्तेमाल करके उपस्थिति दर्ज कराने जैसी गड़बड़ी की जाती है। यदि यह आरोप सही है तो यह बेहद गंभीर मामला है, क्योंकि मुख्यमंत्री सारथी योजना में सरकार जिस प्रशिक्षणार्थी के नाम पर खर्च कर रही है, वह वास्तव में प्रशिक्षण ले रहा है या नहीं—यह जानना सरकार की पहली जिम्मेदारी है।
“अटेंडेंस बनाइए और घर जाइए”—क्या यही है प्रशिक्षण का मॉडल?
मामले से जुड़े लोगों के अनुसार एक और गंभीर आरोप यह है कि विद्यार्थियों की उपस्थिति दर्ज करने के बाद उन्हें घर जाने के लिए कहा जाता है, और जब कभी अधिकारी निरीक्षण के लिए आने वाले होते हैं, तब विद्यार्थियों को केंद्र पर बुलाने की व्यवस्था की जाती है। अब यहां सबसे बड़ा सवाल है—क्या बायोमेट्रिक उपस्थिति वास्तव में प्रशिक्षणार्थी की मौजूदगी प्रमाणित करती है? अगर हां, तो पिछले कई महीनों का बायोमेट्रिक डेटा निकाला जाए—किस दिन कौन आया, कितने घंटे केंद्र में रहा, किस बैच में कितने विद्यार्थी थे, किस विद्यार्थी ने कितने दिन प्रशिक्षण लिया। इन सवालों का जवाब किसी बयान से नहीं, डिजिटल रिकॉर्ड से मिल सकता है।
एक बैच में 30 विद्यार्थी जरूरी, लेकिन क्या कागजों पर पूरे?
शिकायत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बैच को लेकर है। आरोप है कि एक बैच में निर्धारित संख्या पूरी दिखाने के लिए ऐसे विद्यार्थियों के नाम दर्ज किए जाते हैं जो वास्तविक रूप से नियमित प्रशिक्षण में मौजूद नहीं रहते। जमीनी आवाज़ के पास कथित फर्जी बैच से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध होने का दावा है। अब इसकी जांच बेहद आसान है—प्रशासन संबंधित केंद्र से बैचवार सूची ले, फिर उन नामों का आधार सत्यापन करे, फिर बायोमेट्रिक रिकॉर्ड से मिलान करे, फिर बैंक खाते में पहुंचे प्रशिक्षण/भत्ता संबंधी भुगतान का मिलान करे, और अंत में प्रत्येक विद्यार्थी से व्यक्तिगत रूप से पूछे—“क्या आपने वास्तव में यहां प्रशिक्षण लिया था?” सिर्फ इतना करने से आरोपों की सच्चाई सामने आ सकती है।
प्लेसमेंट का सपना—लेकिन छात्रों के हाथ में कितना वेतन?
घाटशिला में प्रशिक्षण लेने वाले विद्यार्थियों को नामी कंपनियों में नौकरी दिलाने का दावा किए जाने की बात सामने आई है। बताया जाता है कि डिमना, सरिता डिजिटल, चेन्नई और बेंगलुरु सहित अन्य स्थानों की कंपनियों में रोजगार दिलाने की बात कही जाती है। लेकिन छात्रों के अनुसार वास्तविकता अलग है। कुछ छात्रों का दावा है कि जिस नौकरी के लिए 22 से 23 हजार रुपये तक वेतन बताए जाने की बात कही गई थी, वहां पहुंचने के बाद उनके हाथ में लगभग 12 से 13 हजार रुपये ही आते हैं। साथ ही बाहर जाकर काम करने वाले विद्यार्थियों ने रहने और खाने की व्यवस्था को लेकर भी असंतोष जताया है। यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल है—जिस कंपनी का नाम प्रवेश के समय बताया गया, क्या उसी कंपनी ने छात्र को नियुक्त किया? क्या उसके पास नियुक्ति पत्र है? क्या कंपनी के पेरोल में उसका नाम है? क्या बैंक खाते में उसी कंपनी से वेतन आया? यदि नहीं, तो फिर प्लेसमेंट के नाम पर विद्यार्थियों को क्या बताया गया था?
घाटशिला की चाय दुकानों पर छात्र, कागजों में रोजगार?
मामले की जमीनी तस्वीर और भी दिलचस्प है। स्थानीय लोगों के अनुसार घाटशिला में अक्सर ऐसे युवा दिखाई देते हैं जिन्हें प्रशिक्षण या रोजगार से जुड़े रिकॉर्ड में दिखाया जाता है, लेकिन उनकी वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल हैं। यही वजह है कि इस पूरे मामले में कागज और जमीन—दोनों का मिलान होना चाहिए। सरकार को सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि कितने प्रमाणपत्र जारी हुए। सरकार को देखना चाहिए कि कितने युवाओं को वास्तविक नौकरी मिली, कितने आज भी नौकरी कर रहे हैं, कितनों के बैंक खाते में वेतन आ रहा है, और कितने केवल सरकारी रिकॉर्ड में “प्लेस्ड” हैं।
उपायुक्त के निरीक्षण की तस्वीर भी मौजूद—फिर जांच कहां तक पहुंची?
इस मामले से जुड़े केंद्र के निरीक्षण को लेकर भी तस्वीरें उपलब्ध होने की बात सामने आई है, जिसमें उपायुक्त स्तर के अधिकारी के निरीक्षण की तस्वीर होने का दावा किया गया है। अब सवाल यह है कि यदि निरीक्षण हुआ था तो उस निरीक्षण में क्या पाया गया? क्या विद्यार्थियों की संख्या जांची गई? क्या बायोमेट्रिक रिकॉर्ड देखा गया? क्या प्लेसमेंट के दस्तावेज देखे गए? क्या प्रमाणपत्रों का सत्यापन हुआ? क्या किसी विद्यार्थी से अलग से पूछताछ की गई? यदि जांच हुई तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? और अगर जांच नहीं हुई तो शिकायत मिलने के बाद अब स्वतंत्र जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
रांची में आंदोलन और घाटशिला में सवाल—भाजपा से भी जवाब मांगेगी जनता
राजधानी रांची में छात्रों और युवाओं के मुद्दे पर भाजपा नेता सड़क पर उतरते हैं, धरना होता है, प्रदर्शन होता है, सरकार का घेराव होता है, युवाओं के अधिकारों की बात होती है। यह लोकतंत्र में उनका अधिकार भी है। लेकिन अब घाटशिला का युवा भी एक सवाल पूछ सकता है—जब राजधानी में छात्रों के लिए आवाज उठाई जाती है, तो घाटशिला में भाजपा से जुड़े व्यक्ति की संस्था पर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ के इतने गंभीर आरोप क्यों उठ रहे हैं? अगर आरोप झूठे हैं तो जांच कराकर उन्हें गलत साबित किया जाए। अगर आरोप सही हैं तो दोषियों पर कार्रवाई हो। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन छात्र का भविष्य राजनीति से ऊपर होना चाहिए।
JMM सरकार में भाजपा का दबदबा कैसे?
यह मामला अब केवल घाटशिला का नहीं रह गया है। यह सवाल झारखंड सरकार से भी है। जब राज्य में झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाली सरकार है, मुख्यमंत्री खुद श्रम, नियोजन, प्रशिक्षण एवं कौशल विकास से जुड़े विभाग की समीक्षा कर रहे हैं, तो मुख्यमंत्री सारथी योजना के जमीनी क्रियान्वयन में भाजपा से जुड़े लोगों की भूमिका पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? क्या योजना का संचालन राजनीतिक पहचान से प्रभावित है? क्या एजेंसियों के चयन में पर्याप्त पारदर्शिता है? क्या केंद्रों का वास्तविक निरीक्षण होता है? क्या सरकारी पैसा वास्तविक प्रशिक्षणार्थियों तक पहुंच रहा है? और क्या प्लेसमेंट के आंकड़े वास्तव में जमीन पर मौजूद हैं? इन सवालों का जवाब केवल घाटशिला के अधिकारी नहीं, बल्कि झारखंड सरकार को देना चाहिए।
“करोड़ों का घोटाला” या गंभीर अनियमितता? फैसला जांच करेगी
शिकायतकर्ता की ओर से करोड़ों रुपये की संभावित अनियमितता के आरोप लगाए गए हैं। लेकिन किसी भी राशि को “घोटाला” या किसी दस्तावेज को “फर्जी” अंतिम रूप से घोषित करने का अधिकार जांच एजेंसी का है। इसलिए अब प्रशासन को चाहिए कि वह बैचवार रिकॉर्ड, बायोमेट्रिक उपस्थिति, आधार सत्यापन, बैंक भुगतान, प्रशिक्षण प्रमाणपत्र, प्लेसमेंट रिकॉर्ड, नियुक्ति पत्र, कंपनियों के पेरोल और विद्यार्थियों के बयान—सभी की स्वतंत्र जांच करे। अगर सब कुछ सही निकला तो संस्था पर लगे आरोप समाप्त हो जाएंगे। लेकिन अगर एक भी बैच, एक भी फर्जी उपस्थिति, एक भी फर्जी प्रमाणपत्र या एक भी फर्जी प्लेसमेंट साबित होता है तो मामला बेहद गंभीर होगा, क्योंकि यह सिर्फ सरकारी पैसे का सवाल नहीं होगा—यह उस गरीब और बेरोजगार झारखंडी युवा के भविष्य का सवाल होगा, जिसने मुख्यमंत्री सारथी योजना पर भरोसा किया था।
जमीनी आवाज़ का सवाल
रांची की सड़कों पर छात्रों के लिए नारे लगाने वालों से लेकर झारखंड सरकार तक—घाटशिला के इन छात्रों का भविष्य कौन देखेगा? सरकारी योजना में राजनीतिक पहुंच का सवाल कौन देखेगा? और अगर आरोप सही निकले तो सरकारी खजाने की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
जमीनी आवाज़ इस मामले की अगली कड़ी में कथित फर्जी बैच, प्रमाणपत्र, विद्यार्थियों की उपस्थिति और प्लेसमेंट से जुड़े दस्तावेजों को क्रमवार सामने रखेगा। जारी रहेगा...





