घाटशिला। भादो का महीना इस बार घाटशिला अनुमंडल के लिए सिर्फ मौसम का बदलाव लेकर नहीं आया। सड़क हादसों की लगातार खबरों, मौतों और अस्पतालों में जिंदगी के लिए जूझते घायलों ने इलाके के लोगों के भीतर ऐसा डर पैदा कर दिया है, जिसे शब्दों में समेटना आसान नहीं।

इसी भयावह दौर को देखकर कांग्रेस के जिला महासचिव शिवाजी चटर्जी ने सोशल मीडिया पर अपने युवा साथियों और अभिभावकों से एक भावुक अपील की है। उनकी एक पंक्ति—“रास्ते पर चलने से अब डर लगता है”—दरअसल उस सामूहिक बेचैनी को सामने लाती है, जिससे आज आम लोग गुजर रहे हैं।
“जो बीत गया वापस नहीं आएगा, लेकिन जूझ रहे लोगों को बचाना होगा”
शिवाजी चटर्जी ने हाल के दिनों में देखे गए हादसों और उनके भयावह मंजर का जिक्र करते हुए कहा कि जो बीत गया, उसे वापस नहीं लाया जा सकता। जिन लोगों की जान चली गई, उनकी कमी कोई पूरी नहीं कर सकता। लेकिन जो लोग अभी जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं, उनके लिए समाज कुछ कर सकता है। उनका संदेश सिर्फ शोक व्यक्त करने तक सीमित नहीं है। उन्होंने लोगों से प्रशासन का सकारात्मक सहयोग करने और जरूरतमंद पीड़ितों तक मदद पहुंचाने की अपील की है।
एसडीपीओ की अपील से मिलती है शिवाजी की आवाज
दिलचस्प बात यह है कि शिवाजी चटर्जी की अपील ऐसे समय सामने आई है, जब एक दिन पहले अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी की ओर से भी समाज के अग्रणी लोगों से हादसों के पीड़ित परिवारों की मदद के लिए आगे आने की बात कही गई थी। मुद्दा सिर्फ दुर्घटना के बाद पुलिस कार्रवाई या अस्पताल तक पहुंचाने का नहीं है। कई पीड़ित परिवारों को यह तक स्पष्ट नहीं होता कि मुआवजा, इलाज, सरकारी सहायता या संबंधित विभाग तक अपनी बात पहुंचाने के लिए उन्हें किस दरवाजे पर जाना है। यहीं समाज के जिम्मेदार लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

सीडीपीओ की पहल भी इसी दिशा में
घाटशिला के सीडीपीओ की ओर से भी पीड़ितों से सीधे मिलने और अपनी समस्या रखने की अपील की गई है। इसका मतलब साफ है—जरूरत सिर्फ संवेदना की नहीं, बल्कि सही व्यक्ति तक सही समय पर पीड़ित की आवाज पहुंचाने की भी है। अगर किसी परिवार का सदस्य हादसे में घायल है, परिवार आर्थिक और मानसिक संकट में है और उसे सरकारी सहायता की प्रक्रिया की जानकारी नहीं है, तो समाज के जागरूक लोग उसके साथ खड़े होकर प्रशासन तक उसकी बात पहुंचा सकते हैं।
क्या यह सिर्फ हादसों की कहानी है?
जमीनी आवाज का सवाल यही है—क्या हर हादसे के बाद कुछ दिनों तक शोक मनाना और फिर अगली दुर्घटना का इंतजार करना ही हमारी नियति बन जाएगी? सड़क पर निकलने से डरने वाला नागरिक सिर्फ अपनी व्यक्तिगत चिंता नहीं बता रहा। वह सड़क सुरक्षा, तेज रफ्तार, यातायात अनुशासन, प्रशासनिक निगरानी और सामूहिक जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़ा कर रहा है। हादसा होने के बाद कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि अगला हादसा कैसे रोका जाए।
युवाओं को भी समझना होगा कि सड़क पर कुछ सेकेंड की जल्दबाजी किसी परिवार की पूरी जिंदगी बदल सकती है। अभिभावकों को भी बच्चों की सुरक्षा और यातायात अनुशासन को लेकर लगातार जागरूक करना होगा।
एक युवा की अपील, पूरे समाज के नाम संदेश
शिवाजी चटर्जी का यह संदेश इसलिए भी चर्चा के योग्य है क्योंकि यह किसी राजनीतिक बहस को आगे बढ़ाने के बजाय सीधे इंसानी जिंदगी की बात करता है। वे कांग्रेस नेता और समाजसेवी तापस चटर्जी के पुत्र हैं और स्वयं सामाजिक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं। ऐसे समय में उनकी अपील का केंद्र राजनीति नहीं, बल्कि पीड़ितों की मदद और प्रशासन के साथ सकारात्मक सहयोग है।
जो चले गए, वे लौटकर नहीं आएंगे। लेकिन जो अभी अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी के लिए लड़ रहे हैं, उनके लिए शायद समाज की एक पहल, प्रशासन तक पहुंची एक आवाज और समय पर मिली सहायता बहुत मायने रख सकती है। भादो की इन दर्दनाक घटनाओं ने घाटशिला के लोगों को झकझोर दिया है। अब सवाल यह है कि इस दर्द से समाज सिर्फ आंसू लेकर बाहर निकलेगा या जिंदगी बचाने की सामूहिक जिम्मेदारी भी उठाएगा?
जमीनी आवाज की पड़ताल यहीं से शुरू होती है। खबरें जमीन की, जमाने की। — असित भट्टाचार्य, संपादक, जमीनी आवाज





