जमीनी आवाज़ | संपादकीय। कल हमारे घर के मोती का जन्मदिन है। मोती 2014 में पैदा हुआ था। यानी अब वह 12 साल का हो चुका है। कुत्तों की सामान्य उम्र करीब 12 से 15 साल मानी जाती है। इसलिए परिवार में जन्मदिन की खुशी के साथ एक सवाल भी है—मोती अगले जन्मदिन तक रहेगा या नहीं? क्योंकि कुत्ता कितना भी वफादार हो, प्रकृति उसकी उम्र की सीमा तय कर देती है।
बिना शर्त वफादारी की मिसाल
मोती ने कभी यह नहीं पूछा कि घर में पैसा कितना है। उसने कभी टिकट नहीं मांगा। कभी पद नहीं मांगा। कभी कुर्सी नहीं मांगी। और न ही मालिक के बदलते हालात देखकर अपनी वफादारी बदली। बस मालिक को अपना माना और जिंदगी भर उसके साथ रहा।
अब जरा राजनीति की तरफ आइए
कल देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी जन्मदिन है। 17 सितंबर 1950 को जन्मे नरेंद्र मोदी का यह जन्मदिन हर साल राजनीतिक और सामाजिक आयोजनों के साथ चर्चा में आता है। इस बार जन्मदिन पर घर-घर दीप जलाने की अपील भी सामने आई है। PIB की रिपोर्ट के अनुसार 17 सितंबर की शाम 7 बजे घरों में दीप जलाने की अपील की गई है।
दीया जलाने के लिए तेल कौन देगा?
दीया जलाइए… जरूर जलाइए। लेकिन पत्रकार का सवाल यहीं से शुरू होता है—दीया जलाने के लिए तेल कौन देगा? तेल जनता का होगा या किसी संगठन का? दीया आस्था का होगा या राजनीति का? और अगर दीया जलाने वाला किसी के प्रति वफादार है तो वह वफादारी विचार की है, व्यक्ति की है या उम्मीद की?
मोती को देखिए। उसकी वफादारी का कोई प्रायोजक नहीं है। उसे कोई यह नहीं बताता कि आज किसके घर के बाहर पूंछ हिलानी है। वह किसी के जन्मदिन पर इसलिए नहीं जाता कि वहां से उसे हड्डी मिल जाएगी। उसका हिसाब सीधा है—जिसने अपनाया, उसके साथ रहना है। राजनीति में हिसाब इतना सीधा नहीं होता।
खर्च कौन उठा रहा है?
यहां वफादारी भी दिखाई देती है, नारे भी दिखाई देते हैं, दीये भी दिखाई देते हैं और जन्मदिन भी दिखाई देता है। लेकिन पत्रकार को एक सवाल पूछने का अधिकार है—इन सबके पीछे खर्च कौन उठा रहा है? और इससे भी बड़ा सवाल—जिस जनता के घर में महंगाई, बेरोजगारी, बीमारी और रोजमर्रा की जरूरतों का तेल मुश्किल से आता है, उसके घर में राजनीतिक दीया जलाने की अपील का अर्थ क्या है?
यह सवाल किसी एक पार्टी का नहीं है। यह सवाल राजनीति की उस संस्कृति का है जहां नेता का जन्मदिन जनता के उत्सव में बदल जाता है और कार्यकर्ता की वफादारी सार्वजनिक प्रदर्शन में।
वफादारी का मूल्य उसकी कीमत से नहीं, निभाने से तय होता है
मोती की उम्र छोटी है। शायद 2029 तक वह हमारे साथ रहे, शायद उससे पहले ही प्रकृति उसे अपने पास बुला ले। लेकिन मोती हमें एक बड़ा सबक देकर जाएगा—वफादारी का मूल्य उसकी कीमत से नहीं, उसके निभाने से तय होता है। राजनीति में भी यही कसौटी होनी चाहिए। दीया कितना बड़ा था, यह नहीं। उसके उजाले से जनता के घर में कितना प्रकाश पहुंचा—यह सवाल होना चाहिए। किसने जन्मदिन मनाया, यह भी महत्वपूर्ण नहीं। जन्मदिन के बाद जनता के जीवन में क्या बदला—यह महत्वपूर्ण है।
जनता का सवाल लंबा है
मोती को कल जन्मदिन की शुभकामना दी जाएगी। शायद केक भी मिलेगा। और मन में यह डर भी रहेगा कि पता नहीं अगला जन्मदिन देख पाएगा या नहीं। लेकिन राजनीति के मोदी और उनके मालिकों से जनता का सवाल लंबा है—वफादारी कितने दिन की है? दीया कितनी देर जलेगा? तेल कौन देगा? और उजाला आखिर किसके घर पहुंचेगा?
Happy Birthday मोती… तुम कम से कम अपनी वफादारी की कीमत नहीं लगाते। यही तुम्हारी सबसे बड़ी खूबी है। — असित भट्टाचार्य, संपादक, जमीनी आवाज। "खबरें जमीन की, जमाने की।"





