ब्रेकिंग न्यूज़
सांसद रत्न का सम्मान मिला, लेकिन घाटशिला पूछ रहा है—दुख में हमारे सांसद-विधायक कहां थे?
By असित भट्टाचार्य12 September 2026 at 02:40 am254 views

संसद में प्रदर्शन का पुरस्कार अपनी जगह, पर क्या यह जनता के हर सुख-दुख में मौजूद रहने की गारंटी भी है?
घाटशिला.... असित भट्टाचार्य
पुरस्कार सम्मान देता है, लेकिन जनता सवाल पूछती है।
जमशेदपुर के सांसद विद्युत वरण महतो को हाल ही में ‘संसद रत्न’ सम्मान मिलने की खबर ने उनके संसदीय प्रदर्शन को लेकर चर्चा जरूर छेड़ी है। यह सम्मान सांसद के संसदीय कामकाज और योगदान की कसौटियों से जुड़ा है। लेकिन अब घाटशिला की जनता के बीच एक दूसरा सवाल भी उठ रहा है—क्या संसद में अच्छे प्रदर्शन का सम्मान जनता के हर सुख-दुख में जनप्रतिनिधि की मौजूदगी की भी गारंटी है?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले करीब दस दिनों से घाटशिला एक दर्दनाक हादसे के बाद शोक और पीड़ा के दौर से गुजर रहा है। जिस परिवार ने अपनों को खोया, वहां मातम पसरा है। परिजनों के लिए यह समय राजनीति या भाषण का नहीं, बल्कि सांत्वना और साथ खड़े होने का है।
जनता का सवाल है—क्या इस कठिन समय में सांसद और स्थानीय विधायक पीड़ित परिवार के घर पहुंचे? क्या उन्होंने परिजनों के आंसू पोंछने और उनका दुख बांटने की कोशिश की?
और फिर आज घाटशिला स्टेशन पर एक अलग तस्वीर दिखाई दी।
गीतांजलि एक्सप्रेस के घाटशिला में ठहराव के अवसर पर सांसद और विधायक स्टेशन पहुंचे। रेल सुविधा घाटशिला के लिए निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है और इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन इसी मौके ने जनता के मन में एक कड़वा सवाल भी पैदा कर दिया—
ट्रेन को झंडी दिखाने के लिए जनप्रतिनिधि पहुंच सकते हैं, तो मौत के बाद मातम में डूबे परिवार के दरवाजे तक पहुंचने में इतनी दूरी क्यों?
यह सवाल किसी उपलब्धि को छोटा करने के लिए नहीं है। सवाल सिर्फ प्राथमिकता का है।
जनप्रतिनिधि का असली मूल्यांकन केवल मंच, माला, सम्मान और उद्घाटन से होगा या उस वक्त भी होगा जब जनता कैमरों से दूर दर्द में होती है?
संसद रत्न सम्मान बड़ा है, लेकिन जनता का विश्वास उससे भी बड़ा
‘संसद रत्न’ सम्मान निश्चित रूप से सांसद के संसदीय कामकाज का एक सम्मान है। लेकिन इसे जनता के हर मुद्दे पर उत्कृष्ट प्रदर्शन की प्रमाण-पत्र या जनसेवा की पूर्ण गारंटी मान लेना उचित नहीं होगा। संसद का प्रदर्शन एक अलग कसौटी है और क्षेत्र में जनता के बीच मौजूद रहना दूसरी।
यही वजह है कि घाटशिला की जनता शायद अब यह जानना चाहती है—
संसद में सवाल उठाने वाले सांसद, क्या अपने क्षेत्र के सवालों को भी उतनी ही गंभीरता से सुनते हैं?
विकास की उपलब्धियों के बीच क्या किसी शोकाकुल परिवार की चीख भी जनप्रतिनिधि तक पहुंचती है?
और क्या जनप्रतिनिधित्व का मतलब सिर्फ जनता के लिए सुविधाएं लाना है, या जनता के दुख में उसके साथ खड़ा होना भी है?
जनता को सिर्फ रिबन काटने वाला नहीं, कंधे पर हाथ रखने वाला प्रतिनिधि चाहिए
घाटशिला में गीतांजलि एक्सप्रेस का रुकना खुशी की बात है। रेलवे सुविधा के लिए प्रयास करने वाले सभी लोगों को जनता धन्यवाद देगी। लेकिन उसी जनता को यह अधिकार भी है कि वह अपने सांसद और विधायक से पूछे—
"हमारे अच्छे दिनों में आप हमारे साथ हैं, यह हमने देख लिया। अब हमारे बुरे दिनों में आप हमारे साथ कितने खड़े हैं?"
क्योंकि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि केवल वोट से नहीं बनता, विश्वास से बनता है।
पुरस्कार मिलते रहेंगे, मंच सजते रहेंगे, झंडे लहराते रहेंगे और तस्वीरें बनती रहेंगी।
लेकिन इतिहास में सबसे गहरी तस्वीर वह होती है—
जब पूरा शहर रो रहा हो और उसका प्रतिनिधि उसके साथ खड़ा दिखाई दे।
अब सवाल घाटशिला की जनता का है और जवाब उसके जनप्रतिनिधियों को देना है।
संसद रत्न सम्मान अपनी जगह सम्मानित है—लेकिन जनता के दिल का "जनप्रतिनिधि रत्न" बनने के लिए क्या कसौटी सिर्फ संसद है, या जनता का दुख भी?
More from घाटशिला

घाटशिला के डामपाड़ा में मेदिनीपुर से नेटवर्किंग लीडर्स सक्रिय, मनी मार्केटिंग को लेकर उठे सवाल
15 September 2026 at 03:23 am

रात के अंधेरे में बालू का खेल: घाटशिला मुख्य सड़क पर 3 बजे के बाद दौड़ती OD-11 गाड़ियां
15 September 2026 at 03:14 am

गणपति आए हैं, अब विवेक भी जगना चाहिए: नशे के खिलाफ जागरूकता की जरूरत
14 September 2026 at 05:16 am

कुणाल की मौत के बाद सड़क सुरक्षा पर आक्रोश, सैकड़ों लोगों ने थाने पहुंचकर की कार्रवाई की मांग
13 September 2026 at 07:09 pm
