घाटशिला। असित भट्टाचार्य

घाटशिला की पहचान सिर्फ उसकी प्राकृतिक सुंदरता, पहाड़ों, जंगलों और स्वर्णरेखा नदी से नहीं है, बल्कि यह धरती महान साहित्यकार विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की साहित्यिक साधना की भी साक्षी रही है। जिस घाटशिला की प्रकृति और परिवेश ने विभूतिभूषण की रचनात्मकता को नई उड़ान दी, उसी धरती से उन्होंने ऐसी रचनाएं दीं, जिन्होंने उन्हें बंगाल ही नहीं, बल्कि देश-दुनिया के साहित्यिक पटल पर अमर पहचान दिलाई।

विभूतिभूषण घाटशिला के लिए महज एक महान साहित्यकार नहीं, बल्कि इस धरती के साहित्यिक आभूषण थे। उनकी लेखनी में घाटशिला की प्रकृति, यहां का जीवन, जंगल, नदी और आम लोगों की संवेदनाएं जीवंत दिखाई देती हैं। यही कारण है कि आज भी घाटशिला में उनकी स्मृतियां साहित्य और संस्कृति के प्रति लोगों को जोड़ने का काम करती हैं।

इसी साहित्यिक विरासत को जीवित रखने और नई पीढ़ी को विभूतिभूषण की रचनाओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास गौरीकुंज उन्नयन समिति लंबे समय से करती आ रही है। समिति के अध्यक्ष तपस चटर्जी बांग्ला भाषा और साहित्य के संरक्षण तथा उसके उत्थान के लिए लगातार सक्रिय रहे हैं। विभूतिभूषण की स्मृतियों को सहेजने में भी उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है।

कार्यक्रम की जानकारी साझा करते हुए मंच पर महान साहित्यकार विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के पौत्र त्रिणांकुर बनर्जी विशेष रूप से उपस्थित रहे। उनके साथ गौरीकुंज उन्नयन समिति के अध्यक्ष तपस चटर्जी, मीठू विश्वास, शोभना गुप्ता और नीलू दत्ता सहित कई गणमान्य लोग तथा कोलकाता के मीडिया प्रतिनिधि मौजूद थे।

समिति ने लोगों से अपील की कि साहित्य, प्रकृति और विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की रचनाओं से जुड़ी इस विशेष विरासत को करीब से महसूस करने के लिए अधिक से अधिक लोग घाटशिला पहुंचें और 'विभूति उत्सव' को सफल बनाएं।

दरअसल, यह उत्सव केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि घाटशिला की उस सांस्कृतिक आत्मा को बचाने का प्रयास है, जिसे विभूतिभूषण ने अपनी लेखनी में शब्द दिए थे। तपस चटर्जी जैसे लोगों की कोशिशें इस बात की उम्मीद जगाती हैं कि विभूतिभूषण की स्मृतियां केवल किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियां भी घाटशिला की इस महान साहित्यिक विरासत को महसूस कर सकेंगी।