पर्यटकों को बीच रास्ते उतारकर मुजफ्फर खान ने निभाया इंसानियत का फर्ज, विधायक सोमेश चंद्र सोरेन ने तत्काल कराई एंबुलेंस की व्यवस्था
बाशाडेरा (घाटशिला) असित भट्टाचार्य
घाटशिला अनुमंडल का बाशाडेरा गांव एक बार फिर अपनी बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था और दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण चर्चा में है। चारों ओर घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा यह गांव वर्षों से मलेरिया प्रभावित क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। विडंबना यह है कि यहां आज भी स्वास्थ्य सुविधाएं नाममात्र की हैं। गांव के स्वास्थ्य केंद्र में न तो सर्पदंश जैसी आपात स्थिति से निपटने की पर्याप्त व्यवस्था है और न ही जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित है। खराब सड़कें और सीमित संसाधन ग्रामीणों की परेशानियों को और बढ़ा देते हैं।
सोमवार को गांव निवासी बुद्धेश्वर साव को एक जहरीले सांप ने डस लिया। घटना के बाद पूरे गांव में अफरा-तफरी मच गई। परिजन और ग्रामीण उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास करने लगे, लेकिन दुर्गम रास्ते और समय पर एंबुलेंस नहीं मिलने से सभी के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। हर गुजरता पल बुद्धेश्वर के लिए भारी पड़ता जा रहा था।
इसी बीच भगवान की कृपा मानिए या इंसानियत की जीत, उसी रास्ते से पर्यटकों को लेकर अपने ऑटो से गुजर रहे चालक मुजफ्फर खान को घटना की जानकारी मिली। उन्होंने बिना एक पल गंवाए बड़ा निर्णय लिया। अपने साथ आए पर्यटकों को बाशाडेरा में सुरक्षित उतारा और बुद्धेश्वर साव को अपने ऑटो में बैठाकर घाटशिला अनुमंडल अस्पताल की ओर रवाना हो गए।
रास्ते में मुजफ्फर खान ने घाटशिला के विधायक सोमेश चंद्र सोरेन को फोन कर पूरी स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि बार-बार फोन करने के बावजूद एंबुलेंस सेवा से कोई जवाब नहीं मिल रहा है और मरीज की हालत गंभीर होती जा रही है। सूचना मिलते ही विधायक ने तत्काल सक्रियता दिखाते हुए एंबुलेंस की व्यवस्था कराई।
मुजफ्फर खान बुद्धेश्वर को लेकर बाशाडेरा से कलचिती की ओर बढ़ ही रहे थे कि सामने से एंबुलेंस आती दिखाई दी। बिना समय गंवाए मरीज को ऑटो से एंबुलेंस में स्थानांतरित किया गया और तत्काल घाटशिला अनुमंडल अस्पताल पहुंचाया गया। चिकित्सकों ने समय पर उपचार शुरू किया, जिससे बुद्धेश्वर की हालत में सुधार हुआ। समाचार लिखे जाने तक उनकी जान खतरे से बाहर बताई गई।
इस घटना ने जहां एक ओर मुजफ्फर खान की संवेदनशीलता और मानवता को सामने रखा, वहीं विधायक सोमेश चंद्र सोरेन की त्वरित पहल ने भी यह साबित किया कि संकट की घड़ी में समय पर लिया गया निर्णय किसी की जिंदगी बचा सकता है। गांव के लोगों ने दोनों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यदि थोड़ी और देर हो जाती तो परिणाम बेहद दुखद हो सकता था।
लेकिन यह घटना कई गंभीर सवाल भी छोड़ गई है। आखिर कब तक बाशाडेरा जैसे आदिवासी और दुर्गम गांव बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरसते रहेंगे? आखिर क्यों एक मलेरिया और सर्पदंश प्रभावित क्षेत्र में पर्याप्त दवाएं, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध नहीं है? आज भी गांव से अस्पताल तक पहुंचने वाली टूटी सड़कें विकास के दावों पर सवाल खड़े करती हैं।
बाशाडेरा की यह घटना केवल एक व्यक्ति के बचने की कहानी नहीं, बल्कि उस भारत की तस्वीर है जहां आज भी विकास की रोशनी पूरी तरह नहीं पहुंच सकी है। यहां के लोग आज भी जंगल, पहाड़, बीमारी और बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं। उम्मीद है कि यह घटना प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को इस क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं के स्थायी समाधान की दिशा में गंभीर पहल करने के लिए प्रेरित करेगी।





