घाटशिला..... असित भट्टाचार्य की रिपोर्ट

मुख्यमंत्री सारथी योजना के नाम पर चल रही NSPL गोपालपुर यूनिट को लेकर जमीनी आवाज द्वारा लगातार उठाए जा रहे सवाल अब एक नए मोड़ पर पहुंच गए हैं। सवाल अब सिर्फ कथित अनियमितताओं का नहीं, बल्कि यह भी है कि आखिर मुख्यमंत्री सारथी योजना की कमान किसके हाथ में है?

क्या यह झारखंड सरकार की योजना है या फिर घाटशिला में इसका संचालन किसी कथित राजनीतिक गठजोड़ की छाया में हो रहा है?

जमीनी आवाज की खबर सामने आने के बाद 1 सितंबर को NSPL से जुड़े कृष्णा सिंह घाटशिला पहुंचे। बताया गया कि उन्होंने गोपालपुर कार्यालय, हरिनडूंगरी, बड़ाजुड़ी भारत सेवाश्रम संघ और बहरागोड़ा सहित कई स्थानों की गतिविधियों को देखा और इसके बाद रांची लौटकर उच्च अधिकारियों को रिपोर्ट देने की बात कही।

2 सितंबर को फुलडुंगरी स्थित चिकन चाऊ रेस्टोरेंट में जमीनी आवाज के संपादक के साथ कृष्णा सिंह की मुलाकात हुई। उनके साथ आसनसोल यूनिट की गतिविधियां देखने वाले बताए जा रहे नीरज कुमार भारती भी मौजूद थे।

बातचीत में जब गंभीर सवाल सामने आए तो कृष्णा सिंह को जवाब देने के लिए दिनेश वाल्मीकि, अमित हाजरा और विवेक महापात्र को भी बुलाना पड़ा। बातचीत के दौरान उठे सवालों पर कृष्णा सिंह की दलीलों को मौजूद लोगों ने चुनौती दी और कई सवालों के जवाबों पर असहमति सामने आई।

कृष्णा सिंह ने दावा किया कि महीने के अंतिम दिनों में उच्च अधिकारियों की जांच टीम घाटशिला पहुंचेगी और पूरी स्थिति की जांच कर सब कुछ स्पष्ट कर दिया जाएगा।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

1, 2 और 3 सितंबर को गतिविधियां चलीं और कृष्ण सिंह के कथन के अनुसार 4 सितंबर को वह रांची लौट गए। अब सवाल यह है कि जांच टीम कब आएगी? किस तारीख को आएगी? जांच का स्वरूप क्या होगा? और अब तक जनता के सामने इसकी कोई स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं है?

जमीनी आवाज के संपादक के अनुसार, कृष्णा सिंह की बातों में कई ऐसे बिंदु रहे जिनसे संतुष्टि नहीं हुई। बल्कि बातचीत से यह सवाल और गहरा हुआ कि क्या यहां व्यवस्था को समझाने से ज्यादा संभालने की कोशिश की जा रही है?

इसी सवाल के बीच जमीनी आवाज अब अपने अगले चरण में उन लोगों की आवाज सामने ला रहा है, जो इस यूनिट से जुड़े रहे हैं।

पहला वीडियो—विवेक सिंह का दावा

जमीनी आवाज के पास उपलब्ध लगभग 5 मिनट 30 सेकंड के वीडियो में NSPL गोपालपुर यूनिट के पूर्व छात्र एवं बाद में वहीं मोबिलाइजर के रूप में काम कर चुके विवेक सिंह ने कई गंभीर आरोप लगाए हैं।

विवेक सिंह के अनुसार, छात्रों को चार महीने की ट्रेनिंग और प्रतिमाह ₹1,000 भत्ते की बात कही गई थी। प्लेसमेंट के समय प्रत्येक छात्र से ₹1,000 लिए जाने का दावा भी उन्होंने किया।

उनके अनुसार चार महीने का कोर्स लगभग छह महीने में पूरा हुआ और देरी के सवाल पर छात्रों को कथित तौर पर "ऑफिशियल प्रॉब्लम" बताकर बात टाल दी जाती थी।

इसके बाद बेंगलुरु में प्लेसमेंट की बात सामने आई। विवेक सिंह के मुताबिक वहां पहुंचने के बाद शुरुआती दिनों में छात्रों को अपने खर्च पर रहना-खाना पड़ा और रहने की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे।

उन्होंने बताया कि सैलरी ₹23,000 बताई गई थी, लेकिन हाथ में लगभग ₹13,800 मिले और शेष राशि PF आदि के नाम पर कटने की बात कही गई।

यहीं विवेक सिंह ने एक बड़ा सवाल उठाया—

क्या PF के नाम पर इतनी बड़ी राशि काटी जा सकती है?

इसके बाद चार महीने काम करने के बाद विवेक सिंह घाटशिला लौट आए और उनके अनुसार उन्हें NSPL में मोबिलाइजर का काम दिया गया।

और यहीं से सामने आता है सबसे गंभीर आरोप

विवेक सिंह ने दावा किया कि यदि कोई विद्यार्थी ट्रेनिंग में उपस्थित नहीं होता था तो मोबिलाइजर लैपटॉप लेकर उसके घर जाता था और किसी तरह उसका फिंगरप्रिंट लेकर आता था।

उनके आरोप के मुताबिक इसके बाद पोर्टल पर विद्यार्थी की उपस्थिति दर्ज हो सकती थी, भले ही वह उस दिन प्रशिक्षण केंद्र में मौजूद न रहा हो।

अगर यह आरोप सही है तो सवाल बेहद गंभीर है—

क्या सरकारी योजना के प्रशिक्षण और उपस्थिति की निगरानी व्यवस्था में फर्जी उपस्थिति दर्ज कराने की गुंजाइश है?

और अगर ऐसा हुआ है तो कितने विद्यार्थियों की उपस्थिति इस तरीके से दर्ज की गई? कितनी राशि का भुगतान हुआ? और इसकी जिम्मेदारी किसकी है?

इन सवालों का जवाब किसी आरोप लगाने वाले व्यक्ति से नहीं, बल्कि सरकारी जांच और डिजिटल रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए।

कॉफी-सैंडविच के बीच सवाल नहीं दबेंगे!

कृष्णा सिंह की घाटशिला यात्रा और स्थानीय स्तर पर हुई बैठकों के बाद अब एक सवाल जनता के बीच चर्चा में है—

क्या जांच सचमुच होगी या मामला बातचीत, भरोसे और आश्वासन तक ही सीमित रहेगा?

जमीनी आवाज किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं कर रहा। लेकिन जिन आरोपों और वीडियो को सामने लाया जा रहा है, वे इतने गंभीर हैं कि इनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है।

जमीनी आवाज के पास केवल विवेक सिंह का वीडियो नहीं है। लड़कों और लड़कियों से जुड़े कई अन्य वीडियो भी मौजूद होने का दावा है, जिन्हें क्रमशः जनता के सामने रखा जाएगा।

आज शुरुआत विवेक सिंह से। आगे और आवाजें आएंगी।

और अब सबसे बड़ा सवाल—मुख्यमंत्री सारथी योजना के असली सारथी कौन?

सरकार? योजना के अधिकारी? या फिर वे लोग जिनके नाम और राजनीतिक संबंधों को लेकर घाटशिला में सवाल उठ रहे हैं?

सुशील दुबे, कृष्णा सिंह और नीरज कुमार भारती की भूमिका क्या है?

क्या NSPL की घाटशिला और आसनसोल इकाइयों की गतिविधियों की उच्चस्तरीय जांच होगी?

क्या डिजिटल अटेंडेंस, PF कटौती, प्लेसमेंट और छात्रों से कथित वसूली के रिकॉर्ड की जांच होगी?

जमीनी आवाज इन सवालों के जवाब मांगता रहेगा।

क्योंकि सवाल किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं—एक सरकारी योजना की पारदर्शिता के पक्ष में है।

क्रमशः.....