जमीनी आवाज | असित भट्टाचार्य की रिपोर्ट

शिवपूजन अवार्ड को लेकर सामने आए दस्तावेज और शिकायतें अब केवल श्रमिक विवाद का विषय नहीं रह गई हैं। आरोपों का दायरा नौकरी, श्रमिक अधिकार, यूनियन की भूमिका और प्रबंधन की कार्यप्रणाली तक पहुंच गया है। शिकायत में दावा किया गया है कि अवार्ड के तहत मिलने वाली वैध नियुक्तियों को कथित तौर पर मुकदमों और विवादों के माध्यम से बाधित किया गया, जबकि दूसरी ओर औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (ITI) की रिक्तियों में कथित अनियमित तरीके से नियुक्तियां किए जाने के आरोप लगाए गए हैं।

सबसे गंभीर सवाल T1 से T5 तक के पदों को लेकर है। शिकायतकर्ता का कहना है कि इन पदों पर नियुक्तियां नहीं की गईं और इसी प्रक्रिया के भीतर कथित अनियमितताओं की पूरी कड़ी छिपी हो सकती है। यदि ऐसा है तो यह केवल कुछ नियुक्तियों का मामला नहीं, बल्कि उन युवाओं और श्रमिक परिवारों के भविष्य का सवाल है, जिनकी आजीविका इन पदों से जुड़ सकती थी।

शिकायत में यह भी आरोप है कि शिवपूजन अवार्ड के अंतर्गत मृत्यु, चिकित्सकीय अयोग्यता, सेवानिवृत्ति और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति जैसे मामलों में मिलने वाली वैध नियुक्तियों को कथित रूप से दुर्भावनापूर्ण मुकदमों के माध्यम से प्रभावित किया गया। दूसरी ओर, सक्षम अधिकारियों द्वारा कथित भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के जरिए अवैध नियुक्तियों का आरोप भी लगाया गया है।

मामला यहीं नहीं रुकता। शिकायत में ICCWU (AITUC संबद्ध, पंजीकरण संख्या 989) की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि यूनियन ने औद्योगिक विवाद अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन किया, श्रमिकों के मूलभूत अधिकार प्रभावित हुए और अगस्त 2019 से उपक्रम का उत्पादन बाधित रहने की स्थिति बनी। शिकायत में यूनियन के चुनाव की प्रक्रिया और गुप्त मतदान के प्रावधानों को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई है।

सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं, उजड़ती जिंदगियों का है

इस पूरे प्रकरण का सबसे दर्दनाक पहलू उन परिवारों का है जिनकी उम्मीद रोजगार से जुड़ी थी। अगर आरोप सही साबित होते हैं तो किसी की नौकरी का रास्ता रोका गया, किसी की आजीविका का सहारा छिना और किसी को विवाद अथवा मुकदमे में उलझना पड़ा—तो इसका जवाब केवल विभागीय फाइलों में नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करके देना होगा।

जमीनी आवाज का सवाल सीधा है—अगर शिवपूजन अवार्ड के तहत वैध नियुक्तियां होनी थीं, तो वे कहां गईं? T1 से T5 तक के पदों पर नियुक्तियां क्यों नहीं हुईं? ITI की रिक्तियों में किस आधार पर नियुक्तियां हुईं? किसे लाभ मिला और किसे बाहर किया गया?

इन सवालों का जवाब किसी एक पक्ष की सफाई से नहीं, बल्कि पूरी नियुक्ति प्रक्रिया, रिक्त पदों, पात्र अभ्यर्थियों, चयन सूची, नियुक्ति आदेश, संबंधित फाइलों, यूनियन की भूमिका और प्रबंधन के निर्णयों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।

यदि जांच निष्पक्ष तरीके से होती है तो आरोपों की सच्चाई सामने आने के साथ यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि कहीं प्रबंधन और यूनियन की मिलीभगत, प्रशासनिक लापरवाही अथवा किसी अन्य स्तर पर अनियमितता ने रोजगार के अधिकार को तो प्रभावित नहीं किया।

यह मामला किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि उन सवालों का जवाब खोजने का है जिनसे वर्षों से रोजगार और आजीविका की उम्मीद लगाए बैठे परिवारों का भविष्य जुड़ा है। इसलिए जांच अब विकल्प नहीं, आवश्यकता दिखाई देती है।