घाटशिला। संवाददाता

बंगला भाषा, शिक्षा और मातृभाषा के संरक्षण के क्षेत्र में लगातार सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता तापस चटर्जी को निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन की पश्चिम बंगाल स्थित रूपनारायणपुर शाखा की ओर से उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। सम्मान मिलने के बाद तापस चटर्जी ने इसे व्यक्तिगत उपलब्धि के बजाय मातृभाषा और सांस्कृतिक विरासत के प्रति जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया।

सम्मान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए तापस चटर्जी ने कहा कि बंगला भाषा और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मानित होना उनके लिए गर्व के साथ-साथ जिम्मेदारी का क्षण भी है। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन्हें बंगला भाषा, मातृभाषा और अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए और अधिक निरंतरता के साथ काम करने की प्रेरणा देता है।

तापस चटर्जी ने बताया कि घाटशिला के दाहीगोड़ा स्थित गौरी कुंज में वर्ष 2018 में ‘अपुर पाठशाला’ की शुरुआत की गई थी। इसका उद्देश्य बच्चों को बंगला भाषा से जोड़ना और उन्हें अपनी मातृभाषा के प्रति जागरूक करना रहा है। उनका मानना है कि किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान उसकी भाषा से गहराई से जुड़ी होती है और बच्चों को प्रारंभिक स्तर से ही अपनी मातृभाषा से जोड़ना भविष्य की पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

उन्होंने कहा कि आज के बदलते सामाजिक और शैक्षणिक परिवेश में मातृभाषा के प्रति बच्चों में रुचि और जागरूकता पैदा करना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है। ‘अपुर पाठशाला’ के माध्यम से इसी दिशा में प्रयास लगातार जारी है।

तापस चटर्जी ने सम्मान के लिए निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन एवं रूपनारायणपुर शाखा के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मान केवल उनके व्यक्तिगत कार्य की पहचान नहीं है, बल्कि बंगला भाषा, मातृभाषा और सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने के प्रयासों का सम्मान है। उन्होंने कहा कि सम्मान के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है और वे आने वाले दिनों में भाषा एवं शिक्षा के क्षेत्र में अपने प्रयासों को और व्यापक बनाने की दिशा में काम करते रहेंगे।

तापस चटर्जी का संदेश स्पष्ट है—मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, संस्कृति और पहचान की धरोहर है। इसलिए भाषा का सम्मान आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का भी सम्मान है।