79 साल की आजादी के बाद भी मजदूरों के अधिकार अधूरे? नियुक्ति पत्र, वेतन पर्ची, बोनस, ईएसआई और पीएफ को लेकर भी उठे सवाल

जमीनी आवाज के सहयोगी की रिपोर्ट। नई दिल्ली

देश की आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले मजदूरों के अधिकारों और श्रम कानूनों के क्रियान्वयन को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। मजदूर नेता एवं लेखक मुनेश त्यागी ने अपने विस्तृत लेख में दावा किया है कि देश के करीब 85 प्रतिशत मजदूरों को न्यूनतम वेतन का लाभ नहीं मिल पा रहा है, जबकि बड़ी संख्या में श्रमिकों को नियुक्ति पत्र और वेतन पर्ची तक उपलब्ध नहीं कराई जाती।

त्यागी ने अपने लेख में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान शहीद चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह सहित क्रांतिकारियों द्वारा मजदूरों के अधिकार, न्यूनतम वेतन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास तथा संगठन बनाने की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को उठाए जाने का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि आजादी के बाद संविधान और विभिन्न श्रम कानूनों के माध्यम से इन्हीं अधिकारों को संस्थागत रूप देने का प्रयास किया गया, लेकिन समय के साथ इनके प्रभावी क्रियान्वयन में कमी आई।

करीब पांच दर्जन श्रम कानूनों से चार श्रम संहिताओं तक का सफर

लेख के अनुसार, देश में मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए न्यूनतम मजदूरी, वेतन भुगतान, औद्योगिक विवाद, कर्मचारी क्षतिपूर्ति, ईएसआई, भविष्य निधि समेत अनेक कानून बनाए गए। लेखक का दावा है कि एक समय देश में लगभग 48 अलग-अलग श्रम कानून मजदूरों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए मौजूद थे।

हालांकि, आर्थिक नीतियों में बदलाव और विशेष रूप से 1991 के बाद उदारीकरण एवं आर्थिक सुधारों के दौर में श्रम बाजार में बड़े परिवर्तन आए। लेख में आरोप लगाया गया है कि इस दौर के बाद अनेक प्रतिष्ठानों में श्रम कानूनों के अनुपालन में कमी आई और बड़ी संख्या में मजदूरों को नौकरी की सुरक्षा, मुआवजा तथा सामाजिक सुरक्षा से जुड़े अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ा।

कारखाने बंद हुए तो मजदूरों के बकाये का क्या हुआ?

मुनेश त्यागी ने अपने लेख में बंद हुए कारखानों के मजदूरों के बकाये का भी मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि कई मामलों में कारखाने बंद होने के बाद मजदूरों को छंटनी अथवा बंदी मुआवजा, ग्रेच्युटी, बोनस और अन्य वैधानिक देयों का भुगतान नहीं हो सका।

लेख में यह भी आरोप लगाया गया है कि अनेक श्रमिकों के मामलों में ईएसआई और भविष्य निधि से जुड़े प्रावधानों का पालन नहीं किया गया। हालांकि ऐसे दावों की वास्तविक स्थिति अलग-अलग प्रतिष्ठानों और मामलों में संबंधित सरकारी रिकॉर्ड तथा न्यायिक निर्णयों से ही निर्धारित की जा सकती है।

12 घंटे काम और 8-9 हजार रुपये वेतन का दावा

लेख में वर्तमान स्थिति को लेकर सबसे गंभीर दावा यह किया गया है कि कई कारखानों, दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में मजदूरों से कथित रूप से 12-12 घंटे तक काम कराया जाता है, लेकिन उन्हें महज 8 से 9 हजार रुपये मासिक वेतन दिया जाता है।

यदि किसी प्रतिष्ठान में निर्धारित न्यूनतम वेतन से कम भुगतान कराया जाता है या निर्धारित कार्य अवधि से अधिक काम लिया जाता है और उसका वैधानिक भुगतान नहीं किया जाता, तो यह श्रमिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है। ऐसे मामलों में श्रम विभाग की निगरानी और प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

'85 प्रतिशत मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं'—दावे ने खड़े किए सवाल

लेख में वर्ष 2022 की एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि भारत के 85 प्रतिशत मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं मिल रहा था। इसी आंकड़े को आधार बनाकर लेखक ने सवाल उठाया है कि यदि देश के इतने बड़े श्रमिक वर्ग को कानूनी न्यूनतम वेतन का लाभ नहीं मिल रहा, तो श्रम कानूनों के वास्तविक क्रियान्वयन की स्थिति क्या है?

यह आंकड़ा जिस रिपोर्ट या अध्ययन से लिया गया है, उसकी मूल रिपोर्ट, अध्ययन पद्धति और वर्तमान स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। बावजूद इसके, यह दावा देश में न्यूनतम मजदूरी के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर सार्वजनिक बहस की जरूरत जरूर सामने रखता है।

श्रम न्यायालयों में लंबित मामलों पर भी चिंता

मुनेश त्यागी ने श्रम न्यायालयों और औद्योगिक न्यायाधिकरणों में लंबित मामलों को लेकर भी चिंता जताई है। उनका दावा है कि बड़ी संख्या में मजदूर गैरकानूनी बर्खास्तगी, न्यूनतम वेतन, ग्रेच्युटी, दुर्घटना मुआवजा, ईएसआई और पीएफ जैसे मामलों में न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

लेख में उत्तर प्रदेश के श्रम न्यायालयों का उदाहरण देते हुए दावा किया गया है कि 26 श्रम न्यायालयों में से 16 में लंबे समय तक पीठासीन अधिकारी के पद रिक्त रहे। यदि यह स्थिति आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्ट होती है तो यह श्रमिकों को समयबद्ध न्याय उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़ा करती है।

नई श्रम संहिताओं को लेकर भी विरोध

लेख में केंद्र सरकार द्वारा लाई गई चार श्रम संहिताओं को लेकर भी तीखी आपत्ति दर्ज की गई है। लेखक का आरोप है कि नई श्रम संहिताएं मजदूरों के पुराने संरक्षण को कमजोर करती हैं और इससे श्रमिकों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

दूसरी ओर, सरकार की ओर से श्रम संहिताओं को श्रम कानूनों को सरल और आधुनिक बनाने तथा रोजगार एवं कारोबारी माहौल को बेहतर करने की दिशा में कदम बताया गया है। इसलिए इस विषय पर निष्पक्ष मूल्यांकन के लिए कानूनों के वास्तविक प्रावधानों, उनके नियमों और जमीनी क्रियान्वयन—तीनों को देखना जरूरी है।

सवाल सिर्फ न्यूनतम वेतन का नहीं, सम्मानजनक जीवन का भी

मजदूरों के अधिकारों की बहस केवल वेतन तक सीमित नहीं है। नियुक्ति पत्र, वेतन पर्ची, काम के घंटे, ओवरटाइम, ईएसआई, पीएफ, ग्रेच्युटी, दुर्घटना मुआवजा, नौकरी की सुरक्षा और शिकायत पर त्वरित सुनवाई—ये सभी श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

जमीनी आवाज का मानना है कि मजदूरों के अधिकारों से जुड़े किसी भी दावे का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि सरकारी आंकड़ों, श्रम विभाग के रिकॉर्ड, प्रतिष्ठानों के वेतन रजिस्टर, पीएफ-ईएसआई रिकॉर्ड और श्रम न्यायालयों के फैसलों की पारदर्शी जांच से होना चाहिए।

आज जब देश अपनी आजादी के 79 वर्ष पूरे कर चुका है, तब यह सवाल महत्वपूर्ण है कि जिस मजदूर के श्रम से देश की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है, क्या उसे कानून में मिले उसके अधिकार वास्तव में जमीन पर मिल रहे हैं?

मुनेश त्यागी ने अपने लेख के अंत में मजदूर-किसान, छात्र-नौजवान और बुद्धिजीवियों की एकजुटता तथा श्रम कानूनों के पूर्ण क्रियान्वयन की मांग की है। उनका संदेश है कि श्रम कानूनों का पालन हो, कानून तोड़ने वालों पर कार्रवाई हो और मजदूरों को सम्मानजनक वेतन एवं सामाजिक सुरक्षा मिले।

जमीनी आवाज का सवाल भी यही है—कानून किताबों में मजबूत होने से ज्यादा जरूरी है कि उसका लाभ उस मजदूर तक पहुंचे, जिसके श्रम पर देश की अर्थव्यवस्था खड़ी है।