विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की 132वीं जयंती पर दो दिवसीय आयोजन, 'अरण्यक' थीम पर होगा सांस्कृतिक कार्यक्रम

घाटशिला। असित भट्टाचार्य

प्रकृति, जंगल, पहाड़ और मानवीय संवेदनाओं को अपनी लेखनी से जीवंत कर देने वाले महान बंगाली कथाशिल्पी विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की स्मृतियों से जुड़े घाटशिला में एक बार फिर साहित्य और संस्कृति का रंग चढ़ने जा रहा है। उनकी 132वीं जयंती के अवसर पर 12 और 13 सितंबर 2026 को दो दिवसीय 'विभूतिभूषण उत्सव—अरण्यक' का आयोजन किया जाएगा।

आयोजकों के अनुसार यह आयोजन गौरीकुंज उन्नयन समिति की ओर से किया जा रहा है। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल विभूतिभूषण को याद करना नहीं, बल्कि उस प्रकृति, संस्कृति और मानवीय जीवन से नई पीढ़ी को जोड़ना भी है, जिसे साहित्यकार ने अपनी रचनाओं में बेहद करीब से महसूस किया था।

विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय का घाटशिला से गहरा रिश्ता रहा है। वे यहां की प्रकृति से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने घाटशिला में अपना घर बनाया, जिसका नाम 'गौरीकुंज' रखा। घाटशिला और आसपास के जंगल, पहाड़ तथा सुवर्णरेखा नदी उनके साहित्यिक संसार का महत्वपूर्ण हिस्सा बने।

12 सितंबर को सांस्कृतिक संध्या, 13 को पर्यटन एवं प्रकृति से जुड़ा कार्यक्रम

पर्चे में दी गई जानकारी के मुताबिक 12 सितंबर को सांस्कृतिक संध्या का आयोजन होगा। इसमें छौ नृत्य, धुमुर, खाड़िया के लोकशिल्प, संगीत और नृत्य सहित विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र रहेंगी। आयोजन के माध्यम से अलग-अलग लोक परंपराओं और संस्कृतियों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया गया है।

वहीं 13 सितंबर को पर्यटकों के लिए घाटशिला के आसपास के दर्शनीय स्थलों के भ्रमण तथा भोजन की व्यवस्था का उल्लेख भी आमंत्रण पत्र में किया गया है।

'अरण्यक' सिर्फ एक साहित्यिक नाम नहीं, प्रकृति के प्रति संवेदना का संदेश

विभूतिभूषण की रचनाओं में प्रकृति महज पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि स्वयं एक जीवंत पात्र की तरह दिखाई देती है। यही कारण है कि उनके नाम पर आयोजित इस उत्सव की थीम 'अरण्यक' रखी गई है।

घाटशिला में विभूतिभूषण की स्मृतियों को सहेजने और उनके साहित्य से नई पीढ़ी को जोड़ने की कोशिशें पहले भी होती रही हैं। उनके जीवन और घाटशिला से जुड़े प्रसंगों को स्थानीय स्तर पर कला के माध्यम से भी संरक्षित किया गया है।

'जमीनी आवाज' की नजर से देखें तो यह उत्सव सिर्फ दो दिनों का सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि घाटशिला की उस साहित्यिक पहचान को फिर से सामने लाने का अवसर है, जिसे विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय ने अपनी कलम से देश-दुनिया तक पहुंचाया।