महंगाई के दौर में 'एक अंडा कितने का?' पूछना हुआ पुराना, सरकार की निगरानी में अंडे का भाव ₹84.17 किलो

कल तक मुर्गी गिनती थी अंडे, दुकानदार गिनता था पीस—अब तराजू बताएगा प्रोटीन की कीमत!

जमीनी आवाज़ | विशेष व्यंग्य। प्रस्तुति असित भट्टाचार्य

देश बदल रहा है... बाजार बदल रहा है... और अब लगता है कि अंडे की किस्मत भी बदलने वाली है।

कल तक आपने दुकानदार से पूछा—"भैया, अंडा कितने का है?" दुकानदार ने जवाब दिया—"आठ-दस रुपये पीस।" आपने कहा—"छह दे दीजिए।"

लेकिन अब जमाना शायद ऐसा आने वाला है कि दुकानदार कहेगा—"कितने किलो दूं?"

जी हां, जिस अंडे को भारतीय परिवार दशकों से गिनकर खरीदता आया है, उसका सरकारी Price Monitoring System अब भाव किलोग्राम में दर्ज कर रहा है। 26 अगस्त 2026 को सरकारी निगरानी आंकड़ों में अंडे का अखिल भारतीय औसत खुदरा भाव ₹84.17 प्रति किलो दर्ज है।

यानी अंडा अब सिर्फ नाश्ते की प्लेट में नहीं, महंगाई की गणित की किताब में भी किलो के साथ प्रवेश कर चुका है।

'दो अंडे देना' से '250 ग्राम तौल देना' तक?

सोचिए, आने वाले दिनों में अगर कोई ग्राहक बोले—"भैया, दो अंडे देना।" दुकानदार शायद पलटकर पूछे—"कितने ग्राम?"

ग्राहक हक्का-बक्का! "अरे भाई, अंडा चाहिए... आलू नहीं!"

दुकानदार गंभीर होकर कह सकता है—"साहब, जमाना बदल गया है। अब अंडा भी वजन से समझिए। सरकारी हिसाब से किलो का भाव है!"

और यहीं से शुरू होगी भारत की नई 'अंडा अर्थव्यवस्था'।

अंडा अब सिर्फ अंडा नहीं, आर्थिक इकाई है!

एक समय था जब अंडा गरीब की थाली का सस्ता प्रोटीन माना जाता था। आज अंडे की कीमतों में उतार-चढ़ाव पर बाजार, पोल्ट्री उद्योग, दाना और मक्का तक की चर्चा होने लगी है। हाल की रिपोर्टों में भी अंडे की कीमत बढ़ने के पीछे पोल्ट्री फीड की लागत और मक्का की मांग जैसे कारणों का जिक्र हुआ है।

यानी अंडे के अंदर सिर्फ पीली जर्दी और सफेद हिस्सा नहीं है। उसके अंदर अब महंगाई, बाजार, उत्पादन लागत और सरकारी निगरानी—सब कुछ बंद है।

अब मुर्गी से भी पूछा जाएगा—कितने किलो अंडा देती हो?

कल तक मुर्गी से सवाल होता था—"कितने अंडे देती हो?" भविष्य का सवाल शायद होगा—"कितने किलो देती हो?"

मुर्गी भी सोच रही होगी—"मैं अंडा देती हूं या सरकारी आंकड़ा?"

और अगर कोई मुर्गी रोज एक अंडा देती है तो संभव है कि आने वाले समय में उसका प्रदर्शन भी इस तरह मापा जाए—"आज उत्पादन 52 ग्राम।"

मुर्गी का मन करेगा कि वह भी किसी दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहे—"मेरे उत्पादन का किलोवार मूल्यांकन बंद किया जाए!"

गरीब की थाली में गणित बढ़ता जा रहा है

सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि अंडा किलो में दर्ज हो रहा है। सवाल यह है कि जिस परिवार के लिए दो अंडे भी पोषण का सहारा हैं, उसके लिए अंडा कितना सस्ता और सुलभ रहेगा?

सरकारी निगरानी में किलो का आंकड़ा दर्ज होना अपनी जगह है, लेकिन बाजार में आम आदमी अब भी अंडा पीस के हिसाब से खरीदता है।

इसलिए असली खबर तराजू पर रखे अंडे का वजन नहीं है। असली खबर यह है कि महंगाई ने हमारी रोजमर्रा की चीजों को भी आंकड़ों की ऐसी भाषा में पहुंचा दिया है, जिसे गरीब आदमी अपनी थाली में बैठकर नहीं, कैलकुलेटर लेकर समझेगा।

कल अंडा, परसों क्या?

अगर अंडे का हिसाब किलो में आने लगा है तो जनता के मन में स्वाभाविक सवाल है—क्या कल दो केले भी किलो में नहीं, 'यूनिट' में सरकारी निगरानी में आएंगे?

या फिर... "एक कप चाय का अखिल भारतीय औसत खुदरा भाव—प्रति लीटर" जैसी कोई नई गणित सामने आएगी?

और अगर ऐसा हुआ तो भारतीय ग्राहक को दुकान पर जाने से पहले सिर्फ जेब नहीं, गणित की किताब भी साथ लेकर चलनी पड़ेगी।

फिलहाल अंडा किलो में दर्ज हो रहा है। लेकिन देश की जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल वही पुराना है—"साहब, अंडा किलो में दर्ज हो या टन में... हमारी थाली में सस्ता कब होगा?"

क्योंकि अंडे का वजन चाहे तराजू बताए, भूख का वजन गरीब की थाली ही बताती है।