गरीब और मजदूर मरीज के लिए अस्पताल आखिरी उम्मीद, लेकिन जहां दवा और डॉक्टर मिलते हैं, वहां साफ पानी, सुरक्षित शौचालय और सफाई की गारंटी तक नहीं
93.6 करोड़ लोगों की सेवा करने वाले स्वास्थ्य केंद्रों में बुनियादी स्वच्छता सेवा नहीं; सवाल—इलाज के लिए पहुंचे मजदूर को बीमारी से राहत मिलेगी या संक्रमण का नया खतरा
स्वास्थ्य पर संपादक असित भट्टाचार्य की विशेष रिपोर्ट
बीमारी से लड़ने के लिए मजदूर जब अस्पताल का दरवाजा खटखटाता है तो उसके पास अक्सर निजी अस्पतालों की महंगी फीस चुकाने का विकल्प नहीं होता। सरकारी अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ही उसकी सबसे बड़ी उम्मीद होते हैं। लेकिन दुनिया की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर आई ताजा अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने उस उम्मीद के सामने एक बेहद गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—जिस जगह इंसान बीमारी से बचने जाता है, क्या वह जगह खुद सुरक्षित है?
WHO और UNICEF की नई रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के केवल 40 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ही बुनियादी स्वच्छता मानक पूरा करते हैं। इसका मतलब है कि करीब 60 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र इस बुनियादी कसौटी पर खरे नहीं उतरते। इतना ही नहीं, करीब 11 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों में किसी भी तरह की स्वच्छता सेवा उपलब्ध नहीं है, जिससे लगभग 93.6 करोड़ लोगों को प्रभावित होने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं की तस्वीर सामने आती है।
शौचालय है, फिर भी स्वच्छता पूरी नहीं!
यहां एक बात समझना जरूरी है। 60 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों में शौचालय बिल्कुल नहीं हैं—ऐसा कहना गलत होगा। दुनिया के करीब 89 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों में किसी न किसी रूप में शौचालय उपलब्ध हैं और 85 फीसदी में उपयोग योग्य शौचालय हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मानक केवल शौचालय की मौजूदगी को पर्याप्त नहीं मानता। मरीजों और कर्मचारियों के लिए उपयोग योग्य व्यवस्था, महिलाओं के लिए अलग सुविधा, मासिक धर्म स्वच्छता की व्यवस्था और दिव्यांग मरीजों के लिए सुगम पहुंच भी जरूरी है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अस्पताल में शौचालय बना है या नहीं। सवाल यह है कि क्या गरीब मजदूर की पत्नी, गर्भवती महिला, बुजुर्ग या दिव्यांग मरीज उस शौचालय का सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से इस्तेमाल कर सकता है?
सफाई के नाम पर सबसे बड़ा सवाल
अस्पताल की सुरक्षा केवल फर्श चमकाने से तय नहीं होती। वार्ड, मरीजों के कमरे, जांच कक्ष, उपचार क्षेत्र, ऑपरेशन थिएटर और शौचालयों की सफाई के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल और प्रशिक्षित सफाईकर्मियों की जरूरत होती है।
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के केवल 59 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र पर्यावरणीय सफाई के बुनियादी मानक पूरे करते हैं। करीब 18 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों में न तो स्पष्ट सफाई प्रोटोकॉल हैं और न ही प्रशिक्षित सफाई कर्मचारी। ऐसे स्वास्थ्य केंद्र लगभग 1.5 अरब लोगों को सेवाएं देते हैं।
यह आंकड़ा खास तौर पर मजदूर और गरीब तबके के लिए चिंता का विषय है। क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार बीमारी के दौरान सबसे ज्यादा सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर निर्भर होते हैं। यदि अस्पताल में ही सफाई व्यवस्था कमजोर है तो गरीब मरीज के पास सुरक्षित विकल्प भी सीमित रह जाता है।
साफ पानी, साबुन और कचरा प्रबंधन भी इलाज का हिस्सा
रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में करीब 85 फीसदी स्वास्थ्य सुविधाओं में बुनियादी जल सेवा, 72 फीसदी में बुनियादी स्वच्छता सुविधा और 71 फीसदी में स्वास्थ्य-कचरा प्रबंधन की बुनियादी व्यवस्था मौजूद थी। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि बड़ी संख्या में स्वास्थ्य केंद्र अब भी इन आवश्यक सुविधाओं से वंचित हैं।
स्वास्थ्य केंद्र में संक्रमित कचरे का सुरक्षित निपटारा, हाथ धोने के लिए पानी और साबुन, साफ वार्ड और सुरक्षित शौचालय कोई विलासिता नहीं हैं। ये मरीज की सुरक्षा की पहली सीढ़ियां हैं।
WHO भी इस बात पर जोर देता है कि स्वास्थ्य केंद्रों में अस्वच्छ वातावरण संक्रमण के जोखिम को बढ़ा सकता है और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस जैसी गंभीर समस्या के फैलाव में योगदान कर सकता है।
गरीब के लिए बीमारी दोहरी मार क्यों बनती है?
एक मजदूर के लिए बीमारी का अर्थ सिर्फ दवा का खर्च नहीं होता। बीमारी का अर्थ है काम से छुट्टी, मजदूरी का नुकसान, परिवार की आय में कमी और कई बार इलाज के लिए कर्ज।
ऐसे परिवार का कोई सदस्य सरकारी अस्पताल में इलाज कराने पहुंचता है तो उसकी पहली मांग बहुत बड़ी नहीं होती—उसे साफ पानी चाहिए, साफ बिस्तर चाहिए, सुरक्षित शौचालय चाहिए, हाथ धोने की सुविधा चाहिए और ऐसा वातावरण चाहिए जहां इलाज के दौरान कोई नया संक्रमण न हो।
लेकिन जब स्वास्थ्य केंद्र की बुनियादी स्वच्छता ही सवालों के घेरे में हो तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि स्वास्थ्य व्यवस्था में सबसे कमजोर व्यक्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
आंकड़ों से आगे जमीन का सवाल
WHO-UNICEF की रिपोर्ट ने देशों से केवल यह गिनने के बजाय कि कितने शौचालय, पानी के नल या सफाई की सुविधाएं मौजूद हैं, यह देखने की जरूरत बताई है कि ये सुविधाएं वास्तव में सुरक्षित, विश्वसनीय, स्वच्छ और सभी के लिए सुलभ हैं या नहीं।
यही असली परीक्षा है। कागज पर अस्पताल में शौचालय होना और मरीज के लिए वास्तव में सुरक्षित शौचालय उपलब्ध होना—दो अलग बातें हैं। बजट में सफाई के लिए राशि निर्धारित होना और जमीन पर प्रशिक्षित सफाईकर्मी मौजूद होना—दो अलग बातें हैं।
अब सवाल सरकारों से है
अस्पतालों में करोड़ों रुपये की इमारतें बनाना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है उन इमारतों को स्वच्छ, सुरक्षित और मरीज के अनुकूल बनाए रखना।
मजदूर अपने खून-पसीने से देश की अर्थव्यवस्था खड़ा करता है। जब वही मजदूर बीमार पड़ता है तो उसे इलाज के बदले संक्रमण का खतरा नहीं मिलना चाहिए।
स्वास्थ्य का अधिकार केवल डॉक्टर और दवा तक सीमित नहीं हो सकता। साफ पानी, सुरक्षित शौचालय, प्रशिक्षित सफाईकर्मी, हाथ धोने की सुविधा और सुरक्षित मेडिकल कचरा प्रबंधन भी इलाज का हिस्सा हैं।
दुनिया के 60 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों का बुनियादी स्वच्छता मानकों पर पीछे रह जाना केवल स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट का आंकड़ा नहीं है। यह उस व्यवस्था के सामने सवाल है, जो गरीब और मजदूर से कहती है—अस्पताल आओ, इलाज कराओ—लेकिन क्या अस्पताल खुद तुम्हारे लिए सुरक्षित है, इसका जवाब कौन देगा?
जमीनी आवाज का सवाल साफ है—इलाज की जगह अगर संक्रमण का खतरा मिले, तो सबसे पहले जवाबदेही किसकी तय होगी?





