IIT गुवाहाटी ने विकसित की कम लागत वाली जल शोधन तकनीक, हजारों लीटर पानी को कम खर्च में बनाया जा सकता है सुरक्षित

शोधकर्ताओं की नई तकनीक पानी से आर्सेनिक को 98.2% और फ्लोराइड को 91.8% तक हटाने में सक्षम

गुवाहाटी। जमीनी आवाज के गुवाहाटी ब्यूरो चीफ की रिपोर्ट

देश के उन इलाकों के लिए जहां भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की अधिक मात्रा लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गुवाहाटी से एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने पानी से आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे जहरीले तत्वों को हटाने के लिए एक कम लागत वाली नई जल शोधन तकनीक विकसित की है।

शोधकर्ताओं द्वारा विकसित Rotating-Anode Electrocoagulation (RA-EC) Reactor तकनीक ने प्रयोगों के दौरान पानी में मौजूद आर्सेनिक के एक प्रमुख रूप आर्सेनेट को 98.2 प्रतिशत तक, जबकि फ्लोराइड को 91.8 प्रतिशत तक हटाने की क्षमता दिखाई है।

इस तकनीक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी लागत है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस प्रणाली से 1,000 लीटर पानी के उपचार की अनुमानित संचालन लागत लगभग 18 से 58 रुपये के बीच हो सकती है। कम लागत होने के कारण यह तकनीक उन ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी साबित हो सकती है, जहां महंगी जल शोधन प्रणालियां लगाना मुश्किल है।

कैसे काम करती है यह तकनीक?

RA-EC प्रणाली इलेक्ट्रोकोएगुलेशन की प्रक्रिया पर आधारित है। इसमें विद्युत ऊर्जा की मदद से पानी में मौजूद प्रदूषक तत्वों को अलग करने की प्रक्रिया को तेज किया जाता है। शोधकर्ताओं ने इसमें घूमने वाले एनोड का इस्तेमाल किया है, जिससे उपचार प्रक्रिया की क्षमता बढ़ाने में मदद मिलती है।

आर्सेनिक और फ्लोराइड दोनों ही भूजल में प्राकृतिक अथवा मानवीय कारणों से मौजूद हो सकते हैं। लंबे समय तक ऐसे दूषित पानी का सेवन मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। ऐसे में पानी को स्रोत पर ही शुद्ध करने वाली सस्ती तकनीक का महत्व और बढ़ जाता है।

सिर्फ तकनीक नहीं, करोड़ों लोगों के लिए उम्मीद

भारत के कई हिस्सों में लोग आज भी पीने के पानी के लिए भूजल पर निर्भर हैं। यदि उस भूजल में आर्सेनिक या फ्लोराइड की मात्रा निर्धारित सुरक्षित सीमा से अधिक हो, तो साफ दिखाई देने वाला पानी भी स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है।

यही वजह है कि IIT गुवाहाटी का यह शोध केवल प्रयोगशाला तक सीमित उपलब्धि नहीं माना जाना चाहिए। यदि इस तकनीक को बड़े स्तर पर व्यावहारिक रूप से लागू किया जाता है, तो यह स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों, गांवों और छोटे सामुदायिक जल केंद्रों तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाने में उपयोगी साबित हो सकती है।

पूर्वोत्तर से देश के दूसरे हिस्सों तक उपयोग की संभावना

आर्सेनिक और फ्लोराइड प्रदूषण की समस्या देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग स्तर पर मौजूद है। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां लोग सीधे भूजल पर निर्भर हैं, वहां ऐसी कम लागत वाली तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

IIT गुवाहाटी की यह पहल इस बात का उदाहरण है कि देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों में होने वाला शोध यदि आम आदमी की वास्तविक समस्याओं से जुड़ता है, तो उसका प्रभाव प्रयोगशाला से निकलकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकता है।

साफ पानी केवल सुविधा नहीं, जीवन की बुनियादी जरूरत है। ऐसे में आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे अदृश्य जहर से लड़ने वाली कम लागत की यह तकनीक आने वाले समय में सुरक्षित पेयजल की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।