अस्पतालों की इमारतें बढ़ीं, लेकिन मरीजों के इलाज के लिए पर्याप्त डॉक्टर-नर्स नहीं; चीन और अमेरिका की तुलना में भारत की स्वास्थ्यकर्मी उपलब्धता बेहद कम
विशेषज्ञ स्वास्थ्यकर्मियों की भी भारी कमी, ग्रामीण और गरीब आबादी पर सबसे ज्यादा असर; स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच के साथ मानव संसाधन बढ़ाना बड़ी चुनौती
नई दिल्ली। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने सिर्फ अस्पतालों, दवाओं और चिकित्सा सुविधाओं की कमी ही चुनौती नहीं है, बल्कि पर्याप्त संख्या में डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता भी एक बड़ा सवाल बनकर सामने आई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर 10 हजार लोगों पर औसतन केवल 73.1 स्वास्थ्यकर्मी उपलब्ध हैं। देश की आबादी की जरूरत के मुताबिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए लगभग 19 लाख अतिरिक्त डॉक्टर और 76 लाख नर्सों एवं दाइयों की आवश्यकता बताई गई है।
आंकड़े बताते हैं कि स्वास्थ्य व्यवस्था का वास्तविक दबाव केवल अस्पतालों की क्षमता पर नहीं, बल्कि वहां काम करने वाले प्रशिक्षित मानव संसाधन पर भी है। डॉक्टरों और नर्सों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने पर अस्पतालों की इमारतें, मशीनें और अन्य संसाधन होने के बावजूद मरीजों को समय पर इलाज मिलना मुश्किल हो सकता है।
भारत में प्रति 10 हजार आबादी पर डॉक्टरों की संख्या करीब 10.5 और नर्सों की संख्या करीब 10.8 बताई गई है। वहीं चीन में इसी अनुपात में कुल स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या लगभग 129 और अमेरिका में करीब 678 है। इससे भारत और विकसित स्वास्थ्य प्रणालियों के बीच मानव संसाधन की खाई का अंदाजा लगाया जा सकता है।
समस्या केवल डॉक्टर और नर्सों तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए मनोवैज्ञानिक, पोषण विशेषज्ञ, फिजियोथेरेपिस्ट, मेडिकल लैब टेक्नीशियन और इमेजिंग तकनीशियन जैसे विशेषज्ञों की भी जरूरत होती है। इन क्षेत्रों में पर्याप्त प्रशिक्षित कर्मियों की कमी का सीधा असर मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और पहुंच पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू स्वास्थ्य क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी भी है। भारत के कुल स्वास्थ्यकर्मियों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 62 प्रतिशत है। नर्सिंग स्टाफ में महिलाओं की भागीदारी लगभग 90 प्रतिशत, जबकि डॉक्टरों में करीब 35.3 प्रतिशत बताई गई है।
गरीब और ग्रामीण मरीजों के लिए ज्यादा गंभीर सवाल
स्वास्थ्यकर्मियों की कमी का असर सबसे ज्यादा उन लोगों पर पड़ सकता है, जिनके पास महंगे निजी अस्पतालों में इलाज कराने का विकल्प नहीं है। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में डॉक्टरों एवं विशेषज्ञों की उपलब्धता पहले से ही बड़ी चुनौती रही है। ऐसे में देश को केवल चिकित्सा संस्थानों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या में भी बड़े पैमाने पर वृद्धि करनी होगी।
स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है, जब अस्पताल तक पहुंचने वाले मरीज को समय पर डॉक्टर मिले, जरूरी जांच के लिए तकनीशियन मिले और इलाज के दौरान पर्याप्त नर्सिंग स्टाफ उपलब्ध हो। इसलिए स्वास्थ्यकर्मियों की कमी का यह आंकड़ा महज एक संख्या नहीं, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी क्षमता पर बड़ा सवाल है।
सवाल यही है—जब हर 10 हजार लोगों के लिए सिर्फ 73 स्वास्थ्यकर्मी हैं, तो बढ़ती आबादी को गुणवत्तापूर्ण और समय पर स्वास्थ्य सेवा आखिर कैसे मिलेगी?





