जमशेदपुर ब्यूरो चीफ विजय कुमार गोप की रिपोर्ट...
₹25 करोड़ की लागत से आधुनिक सुविधाओं से लैस चांडिल अनुमंडल अस्पताल का नया भवन बनकर तैयार है, लेकिन जनता के लिए उसके दरवाजे अब भी बंद हैं। सरकारी दावों और जमीन की हकीकत के बीच का यह फासला अब सवाल नहीं, बल्कि व्यवस्था के चेहरे पर सीधा तमाचा बन चुका है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मरीज आज भी पुराने और जर्जर भवन में इलाज कराने को मजबूर हैं।
जिस अस्पताल में 50 बेड, ऑपरेशन थिएटर, लैब, लेबर रूम, एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड और डॉक्टर-नर्स के आवास जैसी सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए थीं, वह भवन तैयार होकर भी उपयोग में नहीं आ रहा। दूसरी ओर पुराने अस्पताल की हालत ऐसी है कि वहां मूलभूत सुविधाएं तक सवालों के घेरे में हैं।
अस्पताल है, लेकिन पहचान तक नहीं
वर्तमान अस्पताल परिसर में न तो पर्याप्त बेड हैं और न ही मरीजों के लिए जरूरी सुविधाएं। मुख्य द्वार पर अस्पताल का बोर्ड तक नहीं लगा है। पूरे परिसर में पीने के पानी की समुचित व्यवस्था नहीं है। लाखों रुपये की लागत से लगाए गए एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड और लैब की सेवाओं के संचालन का कोई स्पष्ट समय निर्धारित नहीं है।
बिजली जाने पर वैकल्पिक व्यवस्था के लिए लगाया गया सोलर सिस्टम वर्षों से खराब पड़ा है। हाईमास्ट लाइट के सोलर पैनल टूटे हुए हैं। प्रतीक्षालय के पास खुले पड़े पोलियो डिब्बों में बरसात का पानी जमा है, जो मच्छरों और बीमारी के खतरे को बढ़ा रहा है।
छह एम्बुलेंस की जरूरत, एक के भरोसे व्यवस्था
चांडिल जैसे दुर्घटना बहुल क्षेत्र में अस्पताल की एम्बुलेंस व्यवस्था भी गंभीर सवाल खड़े करती है। जरूरत के मुताबिक छह एम्बुलेंस होनी चाहिए, लेकिन वर्तमान में सिर्फ एक एम्बुलेंस चालू है। बाकी वाहनों के इंजन या गियरबॉक्स खराब बताए जा रहे हैं।
डॉक्टरों की स्थिति भी बेहतर नहीं है। अस्पताल में जरूरत के अनुसार 13 डॉक्टर होने चाहिए, लेकिन चिकित्सकों की कमी के कारण मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है।
2008 से चली आ रही है अधूरे अस्पताल की कहानी
चांडिल अनुमंडल अस्पताल के नए भवन का शिलान्यास वर्ष 2008 में तत्कालीन विधायक स्व. सुधीर महतो ने करीब ₹6.10 करोड़ की लागत से किया था। भवन को वर्ष 2012 तक पूरा किया जाना था, लेकिन राशि कम पड़ने का हवाला देकर काम अधूरा रह गया।
इसके बाद वर्ष 2019 में करीब ₹1.5 करोड़ की मरम्मत की निविदा निकाली गई, लेकिन यह प्रयास भी अधूरा रह गया। आखिरकार ईचागढ़ विधायक सविता महतो के प्रयास से 6 दिसंबर 2023 को करीब ₹17 करोड़ की लागत से नए भवन का निर्माण शुरू हुआ। अब निर्माण और अन्य खर्चों को मिलाकर इसकी लागत करीब ₹25 करोड़ बताई जा रही है।
भवन तैयार है। सुविधाएं तैयार हैं। लेकिन मरीजों के लिए अस्पताल अब भी बंद है।
30 किलोमीटर NH-32 और 55 किलोमीटर NH-33, फिर भी इमरजेंसी इलाज अधर में
चांडिल क्षेत्र से NH-32 का करीब 30 किलोमीटर और NH-33 का करीब 55 किलोमीटर हिस्सा गुजरता है। यह इलाका सड़क दुर्घटनाओं के लिहाज से संवेदनशील है। आए दिन सड़क हादसों में घायल लोग अस्पताल पहुंचते हैं।
लेकिन नए अस्पताल के चालू नहीं होने के कारण गंभीर मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद सीधे जमशेदपुर के MGM अस्पताल की ओर रेफर करना पड़ता है। दुर्घटना के बाद हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में लंबी दूरी तक मरीज को ले जाना उसकी जान पर भारी पड़ सकता है।
सिविल सर्जन बोले—उद्घाटन के बाद ही शुरू होगा अस्पताल
सरायकेला-खरसावां के सिविल सर्जन के अनुसार, भवन निर्माण विभाग द्वारा नया भवन स्वास्थ्य विभाग को हस्तांतरित किया जा चुका है। अस्पताल के उद्घाटन के लिए उपायुक्त और स्वास्थ्य मंत्री के आप्त सचिव को पत्र भेजा गया है। उद्घाटन के बाद ही अस्पताल को शुरू किया जाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि पूरे राज्य में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है और उपलब्ध कर्मचारियों के आधार पर ही अस्पताल का संचालन किया जाएगा।
स्थानीय लोगों का सवाल—इमारत नहीं, इलाज चाहिए
स्थानीय समाजसेवी आशुदेव महतो ने मांग की कि नए अस्पताल को जल्द से जल्द आम जनता के लिए खोला जाए। उनका कहना है कि गंभीर दुर्घटना की स्थिति में मरीज को रांची या टाटा ले जाना पड़ता है और इस देरी में उसकी जान तक जा सकती है।
सवाल अब सिर्फ उद्घाटन का नहीं, जवाबदेही का है
चांडिल की जनता को अब फीते काटने की तारीख नहीं, इलाज शुरू होने की तारीख चाहिए। करोड़ों रुपये खर्च कर भवन खड़ा कर देना विकास नहीं है, जब तक उस भवन में मरीजों का इलाज शुरू न हो।
एक तरफ ₹25 करोड़ का अस्पताल तैयार खड़ा है, दूसरी तरफ पुराने जर्जर भवन में मरीज मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। आखिर सरकारी तंत्र किसका इंतजार कर रहा है?
करोड़ों का अस्पताल अगर जनता के काम नहीं आ रहा, तो जिम्मेदारी किसकी है? अब चांडिल की जनता को आश्वासन नहीं, जवाब चाहिए—50 बेड का यह अस्पताल आखिर कब खुलेगा?





