जमीनी आवाज़ | संपादकीय — असित भट्टाचार्य

किसी लोकतंत्र में शब्द केवल शब्द नहीं होते। कई बार शब्द हथियार बन जाते हैं, कई बार ढाल और कई बार डर पैदा करने का माध्यम भी। सत्ता जब किसी विचार, आंदोलन या व्यक्ति को एक विशेष नाम से पुकारती है, तो वह केवल उसकी पहचान नहीं कर रही होती—वह समाज के सामने उसकी एक छवि भी गढ़ रही होती है।

आज हमारे सामने ऐसा ही एक शब्द है—‘दिमाग़ी नक्सल’। यह शब्द अचानक सार्वजनिक बहस के केंद्र में आया है। इससे पहले राजनीतिक शब्दावली में ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘आंदोलनजीवी’ और ‘देशद्रोही’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता रहा है। अब उसमें ‘दिमाग़ी नक्सल’ भी जुड़ गया है।

सवाल यह नहीं है कि नक्सलवाद क्या है। सवाल यह है कि जब ‘नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल हथियार उठाने वाले व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाले नागरिक, पत्रकार, विद्यार्थी, लेखक या आंदोलनकारी के लिए होने लगे, तब लोकतांत्रिक समाज को रुककर सोचना चाहिए या नहीं? यही सवाल भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य के साथ हुई प्रसून आचार्य की बातचीत से निकलकर सामने आता है।

दीपंकर का तर्क है कि ‘दिमाग़ी नक्सल’ कोई स्पष्ट राजनीतिक या कानूनी श्रेणी नहीं, बल्कि ऐसा व्यापक राजनीतिक लेबल है, जिसकी सीमा तय नहीं है। उनके अनुसार जो व्यक्ति सत्ता से असहज सवाल पूछता है, सरकारी नीतियों पर आपत्ति करता है या व्यवस्था की आलोचना करता है, उसके ऊपर इस तरह का ठप्पा लगाया जा सकता है। यह उनका राजनीतिक विश्लेषण है। इससे सहमत होना या असहमत होना पाठक का अधिकार है। लेकिन सवाल गंभीर है, क्योंकि लोकतंत्र में असहमति कोई बीमारी नहीं होती—वह लोकतंत्र की धड़कन होती है।

‘अर्बन नक्सल’ से ‘दिमाग़ी नक्सल’ तक

राजनीतिक बहस में शब्द बदलते रहे हैं, लेकिन आरोप का स्वरूप कई बार एक जैसा दिखाई देता है। किसी को ‘अर्बन नक्सल’ कहा गया, किसी को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का हिस्सा बताया गया, किसी को ‘आंदोलनजीवी’ कहा गया, और अब ‘दिमाग़ी नक्सल’ की अभिव्यक्ति सामने है। यहाँ एक बुनियादी प्रश्न उठता है—क्या किसी व्यक्ति की राजनीतिक असहमति को समझने के बजाय उसे एक लेबल दे देना आसान रास्ता है?

अगर कोई व्यक्ति हिंसा करता है, कानून तोड़ता है या प्रतिबंधित संगठन से जुड़ा है, तो कानून अपना काम करे, उसके खिलाफ सबूत हों, मुकदमा चले, न्यायालय फैसला करे। लेकिन अगर कोई नागरिक केवल इसलिए सरकार की आलोचना करता है क्योंकि उसे किसी नीति से असहमति है, तो क्या उसे भी उसी शब्दावली में रख देना उचित है? यहीं लोकतंत्र और सत्ता की परीक्षा शुरू होती है।

सवाल पूछने वाला नागरिक दुश्मन नहीं

भारत का संविधान नागरिक को केवल वोट देने का अधिकार नहीं देता। वह उसे बोलने, विचार रखने और शांतिपूर्ण तरीके से असहमति दर्ज करने की जगह भी देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर विरोध सही है, और न ही इसका अर्थ यह है कि हर सरकार गलत है। लेकिन इसका अर्थ इतना जरूर है कि सरकार से सवाल पूछना अपने आप में अपराध नहीं हो सकता।

एक पत्रकार पूछता है—स्कूल में शौचालय क्यों नहीं है? एक छात्र पूछता है—रोजगार कहाँ है? एक किसान पूछता है—मेरी जमीन का मुआवजा कहाँ है? एक आदिवासी पूछता है—मेरे जंगल और जमीन पर मेरा अधिकार कहाँ है? एक महिला पूछती है—सुरक्षा कहाँ है? एक नागरिक पूछता है—मेरे टैक्स का पैसा कहाँ खर्च हुआ? क्या इन सवालों का जवाब ‘दिमाग़ी नक्सल’ कहकर दिया जा सकता है? अगर ऐसा होने लगे, तो समस्या उस नागरिक में नहीं, लोकतांत्रिक संवाद में पैदा हो रही है।

जंतर-मंतर से निकला एक बड़ा सवाल

दीपंकर भट्टाचार्य की पूरी बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदर्भ जंतर-मंतर का युवा आंदोलन है। उनका कहना है कि सरकार आंदोलन को दबाने और उसके खिलाफ माहौल बनाने की कोशिशों के बावजूद उसे रोक नहीं सकी। उनके मुताबिक इस आंदोलन ने नई पीढ़ी को यह एहसास कराया कि डर के बावजूद सड़क पर आया जा सकता है और अपनी बात कही जा सकती है।

यहाँ भी हम उनके निष्कर्ष को अंतिम सत्य मानने के बजाय एक बड़े सामाजिक सवाल की तरह देख सकते हैं। आखिर नई पीढ़ी किस बात से नाराज़ है? क्या वह केवल किसी एक राजनीतिक दल से नाराज़ है, या उसके भीतर बेरोजगारी, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था, अवसरों की कमी, महंगाई, सामाजिक असमानता और भविष्य की अनिश्चितता को लेकर भी बेचैनी है? अगर युवा सड़क पर आता है, तो सबसे पहले यह पूछना चाहिए कि वह सड़क पर क्यों आया है—उसे नाम देने से पहले उसकी बात सुननी चाहिए।

दिमाग पर कर्फ्यू नहीं लगाया जा सकता

इस बातचीत में कबीर सुमन के गीत और ‘मगजे कारफ्यू’ यानी दिमाग में कर्फ्यू का संदर्भ आता है। यहाँ से संपादकीय का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु निकलता है। राज्य कानून बना सकता है, प्रशासन चला सकता है, पुलिस व्यवस्था संभाल सकता है। लेकिन क्या वह नागरिक के दिमाग में भी सीमा रेखा खींच सकता है? विचार को आदेश से नियंत्रित करना संभव नहीं। प्रश्न को गिरफ्तार करना मुश्किल है। किताब को बंद किया जा सकता है, लेकिन विचार को नहीं। पत्रकार को डराया जा सकता है, लेकिन हर पत्रकार की कलम को हमेशा के लिए नहीं रोका जा सकता। छात्र को चुप कराया जा सकता है, लेकिन उसकी जिज्ञासा को हमेशा के लिए खत्म नहीं किया जा सकता। और यही किसी भी सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है।

असली लड़ाई ‘नक्सल’ और ‘गैर-नक्सल’ की नहीं

भारत में नक्सलवाद का एक वास्तविक इतिहास है। हिंसक माओवादी आंदोलन की अपनी विचारधारा, अपनी राजनीति और अपनी हिंसक घटनाओं का इतिहास रहा है, उसे लोकतांत्रिक असहमति के साथ मिलाना उचित नहीं होगा। लेकिन ठीक इसी कारण शब्दों का इस्तेमाल और भी जिम्मेदारी से होना चाहिए। अगर ‘नक्सल’ शब्द का अर्थ इतना फैल जाए कि उसमें हिंसक माओवादी से लेकर सरकार की आलोचना करने वाला पत्रकार तक आ जाए, तो अंततः उस शब्द का वास्तविक अर्थ ही कमजोर हो जाएगा। लेबल जितना बड़ा होता जाएगा, उसका अर्थ उतना ही खोता जाएगा। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की पहचान किसी राजनीतिक ठप्पे से नहीं, उसके काम, उसके विचार और उसके आचरण से होनी चाहिए।

इतिहास भी सवाल पूछता है

दीपंकर भट्टाचार्य ने बातचीत में भगत सिंह, डॉ. भीमराव आंबेडकर और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के संदर्भ भी उठाए। इन महान व्यक्तित्वों की राजनीतिक विरासत को लेकर अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन एक बात निर्विवाद है—इन सभी के जीवन को केवल सुविधाजनक नारों में सीमित नहीं किया जा सकता। भगत सिंह को केवल ‘शहीद’ कह देना आसान है, उनके विचार पढ़ना कठिन है। आंबेडकर को केवल संविधान निर्माता कहना आसान है, उनके सामाजिक न्याय के विचारों को समझना कठिन है। सुभाषचंद्र बोस को केवल सैन्य वीरता के प्रतीक के रूप में याद करना आसान है, उनके व्यापक राजनीतिक दृष्टिकोण को समझना कठिन है। इतिहास को याद करना और इतिहास को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना—दो अलग बातें हैं। आज की राजनीति के लिए यह फर्क समझना बेहद जरूरी है।

‘दिमाग़ी नक्सल’ शब्द का सबसे बड़ा खतरा क्या है?

शायद यह नहीं कि इससे हर कोई डर जाएगा, बल्कि यह कि समाज में संवाद की जगह संदेह लेने लगे। वह पत्रकार जो सरकार से सवाल पूछता है—क्या वह देशद्रोही है? वह विद्यार्थी जो परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाता है—क्या वह राष्ट्र-विरोधी है? वह लेखक जो किसी नीति की आलोचना करता है—क्या वह ‘दिमाग़ी नक्सल’ है? वह नागरिक जो संविधान की किसी धारा की रक्षा की मांग करता है—क्या वह व्यवस्था का दुश्मन है? इन सवालों का जवाब सत्ता को भी देना होगा और विपक्ष को भी, क्योंकि लोकतंत्र में केवल सत्ता की आलोचना करने वालों की जिम्मेदारी नहीं होती—विपक्ष, आंदोलनकारी, पत्रकार और नागरिक समाज भी अपनी भाषा और अपने तथ्यों के लिए जवाबदेह होते हैं। असहमति का अधिकार है, लेकिन असहमति के नाम पर हिंसा का अधिकार नहीं। उसी तरह सत्ता चलाने का अधिकार है, लेकिन सत्ता के नाम पर सवालों को अपराध बना देने का अधिकार नहीं।

शायद असली डर ‘दिमाग़ी नक्सल’ का नहीं, स्वतंत्र दिमाग का है

दीपंकर भट्टाचार्य की बातचीत में बार-बार एक बात लौटती है—डर। किसका डर, सत्ता का या जनता का? यही प्रश्न शायद पूरी बहस का केंद्र है। अगर कोई नागरिक ‘नक्सल’ कहे जाने से इतना डर जाए कि वह अपने सवाल पूछना छोड़ दे, तो लेबल सफल हो गया। लेकिन अगर वह कहे—“मैं हिंसा में विश्वास नहीं करता, लेकिन सवाल पूछने से भी पीछे नहीं हटूँगा”—तो लोकतंत्र बचा रहता है। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत सत्ता की शक्ति नहीं, नागरिक की निर्भीकता है।

‘दिमाग़ी नक्सल’ कहे जाने का डर पैदा करने के बजाय हमें यह पूछना चाहिए—क्या हमारे दिमाग में कर्फ्यू होना चाहिए? क्या नागरिक को केवल वही सोचना चाहिए जो सत्ता को पसंद हो? क्या पत्रकार को वही लिखना चाहिए जो सत्ता सुनना चाहती है? क्या विद्यार्थी वही पूछे जो पाठ्यक्रम में लिखा है? क्या नागरिक केवल मतदान के दिन नागरिक है, या लोकतंत्र का नागरिक हर दिन सवाल पूछ सकता है?

जमीनी आवाज़ की बात

हमारा मानना है कि किसी भी लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना और सरकार के खिलाफ हिंसा करना एक बात नहीं है। राष्ट्र से प्रेम और सरकार से सहमति भी एक बात नहीं है। देश सरकार से बड़ा है। संविधान किसी एक दल की संपत्ति नहीं है। और नागरिक किसी राजनीतिक पार्टी की प्रजा नहीं है।

इसलिए ‘दिमाग़ी नक्सल’ जैसे शब्द पर सबसे जरूरी प्रतिक्रिया गाली या प्रतिगाली नहीं, बल्कि विचार होना चाहिए। किसी को नक्सल कह देने से वह नक्सल नहीं हो जाता, और किसी को देशभक्त कह देने से वह देशभक्त साबित भी नहीं हो जाता। लोकतंत्र में अंतिम फैसला लेबल नहीं, कानून, तथ्य, न्याय और जनता की विवेकशीलता करती है। शायद आज सबसे ज्यादा जरूरत इसी विवेक की है। क्योंकि सवाल यह नहीं कि ‘दिमाग़ी नक्सल’ कौन है—सवाल यह है कि क्या इस देश के नागरिकों को अपने दिमाग से सोचने का अधिकार बचा रहेगा? और अगर वह अधिकार बचा रहा, तो किसी भी सत्ता के लिए सबसे मजबूत विपक्ष कोई पार्टी नहीं होगी—एक जागता हुआ नागरिक होगा।

क्रमशः… अगली कड़ी में: “डर किसका है? सत्ता का या जनता का?”