असित भट्टाचार्य
जब पत्रकार सवाल पूछने के लिए अपनी पहचान बदलती है, तो सवाल सिर्फ एक सरकार या एक घटना का नहीं रह जाता—सवाल यह बन जाता है कि लोकतंत्र में सत्ता से सच पूछने की कीमत आखिर कितनी है?
राना अय्यूब की पुस्तक 'गुजरात फाइल्स : एनाटॉमी ऑफ ए कवर अप' इसी असहज सवाल को हमारे सामने खड़ा करती है। यह कोई सामान्य राजनीतिक पुस्तक नहीं, बल्कि 2002 के गुजरात दंगों, कथित फर्जी मुठभेड़ों और तत्कालीन गृह मंत्री हरेन पंड्या की हत्या से जुड़े सवालों पर की गई आठ महीने की अंडरकवर पत्रकारिता का दस्तावेज है। अय्यूब ने 'मैथिली त्यागी' नाम अपनाकर खुद को अमेरिका के अमेरिकन फिल्म इंस्टीट्यूट कंजरवेटरी से जुड़ी फिल्म निर्माता के रूप में प्रस्तुत किया और उस दौर के कई वरिष्ठ नौकरशाहों तथा पुलिस अधिकारियों से मुलाकात की। इन मुलाकातों की रिकॉर्डिंग और उनके लिप्यंतरण ही पुस्तक का महत्वपूर्ण आधार बने।
इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि इसमें किस नेता या अधिकारी पर क्या आरोप लगाया गया है। असली महत्व इस बात का है कि सत्ता, प्रशासन, पुलिस और राजनीतिक व्यवस्था के बीच संबंधों को लेकर उठे सवालों को एक पत्रकार ने कितनी दूर तक जाकर तलाशने की कोशिश की। किताब में गुजरात दंगों के साथ कथित फर्जी मुठभेड़ों और इशरत जहां जैसे मामलों से जुड़े अधिकारियों के बयानों को भी सामने रखा गया है।
यहीं से 'गुजरात फाइल्स' लोकतंत्र के लिए एक गंभीर दस्तावेज बन जाती है। क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है, जब पत्रकार सत्ता से असुविधाजनक सवाल पूछता है, जब कोई अधिकारी अपने ही तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है और जब किसी हिंसक घटना के बाद समाज यह जानना चाहता है कि भीड़ के पीछे कौन था, प्रशासन ने क्या किया और जिम्मेदारी तय क्यों नहीं हुई?
इस पुस्तक में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के गुजरात की सत्ता में उभार तथा बाद में राष्ट्रीय राजनीति में उनके बढ़ते प्रभाव की पृष्ठभूमि भी दिखाई देती है। लेकिन इस पुस्तक को पढ़ते समय किसी राजनीतिक निष्कर्ष को आंख मूंदकर स्वीकार करने के बजाय उसके दस्तावेजों, रिकॉर्डिंग और दावों को आलोचनात्मक दृष्टि से देखना भी उतना ही जरूरी है। पुस्तक के दावों पर सवाल उठे हैं और इसके सभी आरोपों को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य मान लेना उचित नहीं होगा। स्वयं सुप्रीम कोर्ट में 2019 में 'गुजरात फाइल्स' को एक मामले को दोबारा खोलने के संदर्भ में 'conjecture' कहा गया था।
फिर भी सवाल बचता है—अगर सत्ता से जुड़े गंभीर आरोपों पर सवाल पूछना बंद कर दिया जाए, तो लोकतंत्र में पत्रकारिता बचेगी कैसे?
राना अय्यूब की पत्रकारिता की पद्धति पर बहस हो सकती है। अंडरकवर पत्रकारिता की नैतिकता पर भी बहस होनी चाहिए। लेकिन उससे भी बड़ी बहस उस व्यवस्था पर होनी चाहिए जिसमें सच सामने लाने के लिए पत्रकार को अपनी पहचान छिपाने की जरूरत महसूस होती है।
'गुजरात फाइल्स' इसलिए सिर्फ गुजरात के अतीत को पढ़ने की किताब नहीं है। यह आज के भारत के लिए भी एक आईना है। यह हमें याद दिलाती है कि सत्ता बदल सकती है, चेहरे बदल सकते हैं, सरकारें बदल सकती हैं—लेकिन नागरिक का सवाल वही रहता है: सच क्या है?
और शायद यही किसी लोकतंत्र में पत्रकारिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है—सत्ता का प्रचार करना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल करना।
'जमीनी आवाज' की अपील: ऐसी पुस्तकों को पढ़ना किसी विचारधारा को स्वीकार करना नहीं है। पढ़िए, सवाल कीजिए, तथ्यों को परखिए और फिर अपनी राय बनाइए। क्योंकि तर्कशील समाज वही होता है, जो किसी भी सत्ता, किसी भी विचार और किसी भी पत्रकारिता को सवालों से ऊपर नहीं मानता।





