81 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस, पोती मनु सिंह बसनेट ने दी मुखाग्नि; मऊभंडार-घाटशिला की अखाड़ा संस्कृति ने खोया अपना एक मजबूत स्तंभ
स्थापना काल से बी-ब्लॉक महावीर क्लब से जुड़े रहे जगतराम बसनेट, छह दशक तक अपने नेतृत्व और समर्पण से रामनवमी अखाड़ा परंपरा को दी नई पहचान
घाटशिला। विशेष प्रतिनिधि
मऊभंडार और घाटशिला क्षेत्र की सामाजिक एवं धार्मिक गतिविधियों तथा रामनवमी अखाड़ा संस्कृति से लंबे समय तक जुड़े रहे बी-ब्लॉक महावीर क्लब रामनवमी अखाड़ा समिति के अध्यक्ष और पूर्व आईसीसी कर्मी जगतराम बसनेट (81) अब इस दुनिया में नहीं रहे। शनिवार की अहले सुबह जमशेदपुर के एक अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही मऊभंडार और घाटशिला क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।
जगतराम बसनेट केवल एक अखाड़ा समिति के अध्यक्ष नहीं थे, बल्कि मऊभंडार की रामनवमी और अखाड़ा परंपरा के उन मजबूत स्तंभों में शामिल थे, जिन्होंने अपने जीवन के लगभग छह दशक इस सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा को मजबूत बनाने में समर्पित कर दिए। बी-ब्लॉक महावीर क्लब की स्थापना के समय से ही उससे जुड़े जगतराम बसनेट ने लगभग 60 वर्षों तक समिति की जिम्मेदारी संभालते हुए उसे क्षेत्र की एक सशक्त और प्रतिष्ठित अखाड़ा समिति के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कुछ दिनों पूर्व अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें इलाज के लिए जमशेदपुर के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। चिकित्सकों की देखरेख में उनका इलाज चल रहा था, लेकिन शनिवार की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना फैलते ही उनके शुभचिंतकों, अखाड़ा समिति के सदस्यों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों में शोक की लहर दौड़ गई।
पोती ने दी मुखाग्नि, नम हुईं उपस्थित लोगों की आंखें
जगतराम बसनेट का अंतिम संस्कार शनिवार को मऊभंडार मुक्तिधाम में किया गया। अंतिम विदाई का क्षण अत्यंत भावुक कर देने वाला रहा। उनकी पोती मनु सिंह बसनेट ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दृश्य को देखकर अंतिम संस्कार में मौजूद अनेक लोगों की आंखें नम हो गईं।
जगतराम बसनेट अपने पीछे अपनी पत्नी और पोती को छोड़ गए हैं। उनके निधन से परिवार के साथ-साथ बी-ब्लॉक महावीर क्लब और पूरे अखाड़ा परिवार को गहरा आघात पहुंचा है।
महावीर क्लब परिसर में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया पार्थिव शरीर
अंतिम संस्कार से पूर्व जगतराम बसनेट के पार्थिव शरीर को मऊभंडार स्थित बी-ब्लॉक महावीर क्लब परिसर में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया। यहां सुबह से ही उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा रहा। अखाड़ा समिति के सदस्यों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और क्षेत्र के गणमान्य लोगों ने उनके पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।
इस दौरान उनके पार्थिव शरीर पर राम नाम अंकित अंगवस्त्र चढ़ाकर अखाड़ा परंपरा की ओर से उन्हें अंतिम सम्मान दिया गया। जिस महावीर क्लब और रामनवमी अखाड़ा समिति को उन्होंने अपने जीवन के छह दशक दिए, उसी परिसर में हजारों यादों के बीच उन्हें अंतिम विदाई दी गई।
मौके पर महावीर क्लब के मुख्य संरक्षक ओमप्रकाश सिंह, संरक्षक कालिराम शर्मा, काल्टू चक्रवर्ती, दिनेश साव, उपाध्यक्ष मुनिब शर्मा, एनएल पटेल, कोषाध्यक्ष एस राजन, उस्ताद राकेश दूबे, लाइसेंसी शम्भू जेना, नीरज छेत्री, कार्तिक ओझा, सुरेश चौहान, चंदूलाल, सचिव रवि प्रकाश सिंह, केंद्रीय अखाड़ा समिति के अध्यक्ष रुपेश दूबे, खुर्शीद आलम, चुनुडीह अखाड़ा समिति के उस्ताद छोटेलाल सिंह, पांचपांडव अखाड़ा समिति के उस्ताद प्रकाश रेवानी, सपन सिंहदेव, गोरखा क्लब के अध्यक्ष प्रकाश छेत्री, दिल बहादुर सोनार, महेश छेत्री, मुकेश पटेल, संजू सिंह, कुश कुमार, मोहित उपाध्याय, प्रेम कुमार, आशीष बागती, आनंद पटेल समेत बड़ी संख्या में क्षेत्र के गणमान्य लोग उपस्थित थे।
अखाड़ा संस्कृति को दी नई पहचान, छह दशक तक रहे मजबूत नेतृत्वकर्ता
मऊभंडार-घाटशिला क्षेत्र में जगतराम बसनेट का नाम केवल एक सामाजिक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि अखाड़ा संस्कृति के एक समर्पित संरक्षक के रूप में भी लिया जाता था। वे बेहद लोकप्रिय, मिलनसार और सहयोगी स्वभाव के व्यक्ति थे। समाज और जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए वे हमेशा तत्पर रहते थे।
बी-ब्लॉक महावीर क्लब की स्थापना के शुरुआती दौर से ही वे क्लब से जुड़े रहे और धीरे-धीरे उन्होंने इसे अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना लिया। लगभग छह दशक तक अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने रामनवमी अखाड़ा समिति को संगठित, मजबूत और सक्रिय बनाए रखा।
उनके नेतृत्व में प्रत्येक वर्ष बी-ब्लॉक महावीर क्लब की ओर से भव्य रामनवमी अखाड़ा जुलूस निकाला जाता था। जुलूस में युवाओं, बुजुर्गों और स्थानीय लोगों की बड़ी भागीदारी रहती थी। अखाड़ा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित न रहे, बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारे का माध्यम बने, इसके लिए भी वे लगातार प्रयासरत रहे।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे लंबे समय तक नेतृत्व की जिम्मेदारी संभालने के बावजूद हमेशा समिति के सदस्यों और युवाओं को साथ लेकर चलते थे। यही कारण है कि बी-ब्लॉक महावीर क्लब आज जिस पहचान और मजबूती के साथ क्षेत्र में जाना जाता है, उसमें जगतराम बसनेट के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।
एक व्यक्ति नहीं, अखाड़ा परंपरा का एक युग थे जगतराम बसनेट
स्थानीय लोगों का कहना है कि जगतराम बसनेट का निधन केवल एक व्यक्ति का निधन नहीं है, बल्कि मऊभंडार की अखाड़ा परंपरा के एक लंबे और गौरवशाली अध्याय का अंत है। जिस पीढ़ी ने उनके साथ रामनवमी के जुलूसों को देखा और अखाड़ा समिति के उतार-चढ़ाव को महसूस किया, उनके लिए जगतराम बसनेट का जाना व्यक्तिगत क्षति जैसा है।
लगभग 60 वर्षों तक लगातार एक संस्था से जुड़े रहना और उसे मजबूती के साथ आगे बढ़ाना अपने आप में उनके समर्पण और प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उन्होंने बदलते समय के साथ अखाड़ा समिति को आगे बढ़ाया और नई पीढ़ी को भी इस परंपरा से जोड़ने का काम किया।
क्षेत्र ने खोया मिलनसार और समर्पित व्यक्तित्व
जगतराम बसनेट के निधन पर स्थानीय लोगों, अखाड़ा समिति के सदस्यों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गहरी शोक संवेदना व्यक्त की है। लोगों ने कहा कि उनके निधन से क्षेत्र ने एक मिलनसार, सहयोगी, अनुभवी और सामाजिक रूप से समर्पित व्यक्तित्व को खो दिया है।
बी-ब्लॉक महावीर क्लब और रामनवमी अखाड़ा समिति से जुड़े लोगों के लिए उनका जाना एक ऐसी रिक्तता छोड़ गया है, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा। आने वाले वर्षों में जब भी बी-ब्लॉक महावीर क्लब का रामनवमी अखाड़ा जुलूस निकलेगा, तब इस परंपरा को छह दशकों तक संभालने और संवारने वाले जगतराम बसनेट की कमी निश्चित रूप से महसूस की जाएगी।
जगतराम बसनेट भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन बी-ब्लॉक महावीर क्लब, रामनवमी अखाड़ा समिति और मऊभंडार की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा के लिए उनका योगदान लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों में जीवित रहेगा।





