झारखंड मुक्ति मोर्चा ने कहा— हम विकास के विरोधी नहीं, लेकिन विकास की कीमत पर जमीन, जंगल और मूलवासियों के अधिकार छीनने नहीं देंगे

रांची। संवाददाता

झारखंड में जल-जंगल-जमीन, खनिज संपदा और आदिवासी-मूलवासी अधिकारों को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पार्टी विकास, खनन और औद्योगिक गतिविधियों के विरोध में नहीं है, लेकिन किसी भी विकास की कीमत पर झारखंड की जमीन, जंगल और यहां के मूल निवासियों के अधिकारों से समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।

झामुमो की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि झारखंड की खनिज संपदा में झारखंडियों का हित सर्वोच्च होना चाहिए। पार्टी की मांग है कि राज्य की जमीन का सम्मान किया जाए, जंगलों की रक्षा हो, आदिवासी अधिकारों को सुरक्षित रखा जाए और स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता मिले।

बयान में कहा गया कि भाजपा को यह समझना होगा कि झारखंड सिर्फ खनिज निकालने की जमीन नहीं है। यह उन आदिवासी-मूलवासी और झारखंडी लोगों की धरती है, जिन्होंने पीढ़ियों से इसकी रक्षा की है और अपने अधिकारों के लिए लंबे संघर्ष किए हैं।

झामुमो ने यह भी कहा कि जनता की आवाज को दबाने के लिए उसे 'नक्सल' कह देना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। पार्टी के अनुसार, अपनी जमीन, जंगल, अधिकार और रोजगार की मांग करना किसी भी नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है।

झामुमो की ओर से बाबूलाल मरांडी को संबोधित करते हुए कहा गया कि राजनीतिक असहमति को नक्सलवाद से जोड़ना आपसी संवाद और लोकतंत्र की कमजोरी हो सकती है, लेकिन झारखंड की जनता की आवाज को कमजोर नहीं किया जा सकता। जनता सब कुछ देख रही है और आने वाले समय में सवाल भी पूछेगी, जवाब भी मांगेगी तथा लोकतांत्रिक तरीके से अपना फैसला भी करेगी।

पार्टी ने कहा कि झारखंड के विकास का रास्ता तभी सार्थक होगा, जब जल, जंगल, जमीन, खनिज संपदा और रोजगार पर स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा करते हुए विकास की नीति बनाई जाएगी। झारखंड की अस्मिता और उसके लोगों के अधिकारों की अनदेखी कर विकास का कोई भी मॉडल स्वीकार्य नहीं हो सकता।

अंतिम पंक्ति: "झारखंड की धरती, संपदा और अस्मिता की रक्षा का सवाल केवल राजनीति का नहीं, बल्कि झारखंड के भविष्य का सवाल है।"