विशेष विश्लेषण | असित भट्टाचार्य | संपादक, जमीनी आवाज़

कभी-कभी एक खबर सिर्फ खबर नहीं होती। वह समाज के सामने रखा हुआ आईना होती है। घाटशिला में शौर्य चक्र सम्मान से जुड़े मोहम्मद जावेद का मामला अब केवल एक व्यक्ति, एक प्राथमिकी, एक आरोप या कुछ कानूनी धाराओं का मामला नहीं रह गया है। यह मामला एक बहुत बड़ा सवाल बन चुका है—आखिर न्याय कब मिलेगा?

और यह सवाल अब सिर्फ घाटशिला की जनता नहीं पूछ रही। देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी न्याय में देरी और वर्षों तक लंबित रहने वाले मामलों पर गंभीर सवाल उठा चुकी हैं। जब देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था पर बैठी राष्ट्रपति न्याय की प्रतीक्षा को लेकर चिंता व्यक्त करती हैं, तब घाटशिला का एक साधारण आदमी यह पूछने का अधिकार रखता है—अगर न्याय व्यवस्था की गति पर राष्ट्रपति को चिंता है, तो हम किसके भरोसे बैठें?

एक तरफ शौर्य चक्र... दूसरी तरफ आरोप

मोहम्मद जावेद के मामले ने घाटशिला के सामने एक असहज और कठिन सवाल खड़ा किया है। एक तरफ किसी व्यक्ति का राष्ट्रीय सम्मान और सामाजिक पहचान है। दूसरी तरफ उसके विरुद्ध लगाए गए गंभीर आरोप और कानून की प्रक्रिया। तो जनता क्या करे? क्या वह सम्मान देखकर आरोपों को नजरअंदाज कर दे? नहीं। क्या वह केवल आरोप सुनकर किसी व्यक्ति की पूरी जिंदगी, इज्जत और पहचान पर फैसला सुना दे? यह भी न्याय नहीं।

फिर रास्ता क्या है? रास्ता है—निष्पक्ष जांच। रास्ता है—समयबद्ध कार्रवाई। रास्ता है—बिना दबाव और बिना पक्षपात के सच को सामने लाना। लेकिन असली समस्या यहीं शुरू होती है। जब जांच लंबी हो जाए, जब कार्रवाई पर सवाल उठने लगें, जब मामला तारीखों और प्रक्रियाओं के बीच उलझ जाए—तब सच से पहले अफवाह दौड़ती है, फैसले से पहले समाज फैसला सुनाता है, और इंसान आरोप और न्याय के बीच सैंडविच बन जाता है।

राहुल गांधी हों या घाटशिला का आम आदमी—फर्क सिर्फ ताकत का है, चक्की वही है

आज राहुल गांधी देश के विपक्ष के नेता हैं। राजनीतिक शक्ति है, मंच है, मीडिया है, वकील हैं, देशभर में समर्थक हैं। फिर भी कानूनी मामलों और राजनीतिक विवादों के बीच उन्हें अदालतों की चौखट तक जाना पड़ता है। तो सोचिए—जिस घाटशिला के आम आदमी के पास न बड़ा वकील है, न राजनीतिक मंच, न मीडिया की सेना—उसका क्या होता होगा?

राहुल गांधी किसी मामले में अदालत पहुंचते हैं तो राष्ट्रीय बहस होती है। घाटशिला का गरीब आदमी अदालत पहुंचता है तो कई बार पड़ोसी तक नहीं जानते कि वह किस लड़ाई में अपनी जिंदगी काट रहा है। राहुल गांधी के पास इंतजार करने के साधन हैं। लेकिन एक मजदूर, एक किसान, एक छोटा दुकानदार, एक विधवा, एक गरीब शिकायतकर्ता, या फिर कोई ऐसा व्यक्ति जिस पर आरोप लगा है और जिसे अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए सालों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं—उनके पास क्या है? कई बार सिर्फ एक उम्मीद—“एक दिन न्याय मिलेगा।” लेकिन राष्ट्रपति का सवाल जैसे उसी उम्मीद के सामने खड़ा हो जाता है—“मिलेगा कब?”

घाटशिला की जनता भी ‘सैंडविच’ बन गई है

इस मामले में घाटशिला की जनता की स्थिति भी कम विचित्र नहीं है। एक व्यक्ति के बारे में उसके सम्मान और उपलब्धियों की जानकारी है, दूसरी तरफ गंभीर आरोपों और कानूनी कार्रवाई की खबर है। जनता किसी एक तरफ आंख बंद करके खड़ी नहीं होना चाहती, लेकिन सच सामने आने में समय लगता है, और इसी बीच समाज दो हिस्सों में बंट जाता है।

एक कहता है—“सम्मानित व्यक्ति ऐसा कैसे कर सकता है?” दूसरा पूछता है—“अगर शिकायत है तो उसकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होगी?” लेकिन जमीनी आवाज़ का सवाल दोनों से अलग है—“जांच जल्दी और निष्पक्ष क्यों नहीं हो सकती?” अगर आरोप गलत हैं तो आरोपी को जल्द न्याय मिलना चाहिए। अगर आरोप सही हैं तो पीड़ित को जल्द न्याय मिलना चाहिए। लेकिन अगर दोनों को वर्षों तक इंतजार करना पड़े, तो आखिर जीत किसकी हुई? सिर्फ सिस्टम की फाइलें मोटी हुईं।

क्या मुकदमा दर्ज होते ही शुरू हो जाती है सामाजिक सजा?

यह सवाल बेहद गंभीर है। कानून का अपना काम है, शिकायत की जांच होना जरूरी है, विशेष कानूनों के तहत दर्ज गंभीर आरोपों की निष्पक्ष और संवेदनशील जांच होना भी उतना ही जरूरी है। लेकिन कानून का दूसरा सिद्धांत भी उतना ही महत्वपूर्ण है—अंतिम न्यायिक निष्कर्ष से पहले किसी व्यक्ति को सामाजिक अदालत में दोषी घोषित कर देना न्याय नहीं है।

यही वह जगह है, जहां हमारा समाज सबसे ज्यादा विफल होता दिखाई देता है। पुलिस जांच शुरू करती है, लेकिन सोशल मीडिया फैसला लिख देता है। मामला अदालत में जाता है, लेकिन समाज सजा सुना देता है। फिर अगर वर्षों बाद सच कुछ और निकलता है, तो सवाल उठता है—जिसकी इज्जत चली गई, उसे कौन लौटाएगा? और यदि पीड़ित वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करता रहा, तो सवाल है—उसके इंतजार के साल कौन लौटाएगा?

राष्ट्रपति का सवाल और घाटशिला की बेचैनी

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने लंबित मामलों और लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया चलने की समस्या पर गंभीर चिंता जताई है। 32 वर्षों से अधिक पुराने मामलों की बात अपने आप में पूरे न्याय तंत्र के सामने एक आईना है। सोचिए—जिस व्यक्ति ने जवानी में न्याय के लिए मुकदमा दायर किया होगा, वह फैसला आते-आते बूढ़ा हो सकता है। जिस बच्चे के लिए परिवार न्याय मांग रहा होगा, वह खुद पिता बन सकता है। जिस गरीब ने पहली बार अदालत की चौखट पार की होगी, वह कई बार यह सोचकर टूट जाता होगा—“क्या मेरे जीवन में फैसला आएगा भी?” यही इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी है। न्याय का दरवाजा खुला है, लेकिन कई लोगों के लिए वह दरवाजा बहुत दूर है।

न्याय नहीं मिलने से बड़ी त्रासदी—देर से न्याय मिलना

हमारे देश में एक पुरानी बात कही जाती है—Justice delayed is justice denied. लेकिन घाटशिला का आदमी इसे अंग्रेजी में नहीं समझता। वह इसे अपने जीवन से समझता है। उसकी भाषा में इसका मतलब है—“न्याय मिलने तक घर बिक गया”, “वकील की फीस में जमा पूंजी खत्म हो गई”, “तारीख पर जाते-जाते नौकरी चली गई”, “गवाह मुकर गया”, “मां-बाप मर गए”, “जिनके लिए लड़ रहे थे, वे इंतजार करते-करते बूढ़े हो गए।” तो फिर सवाल है—क्या फैसला आ जाना ही न्याय है, या समय पर फैसला आना भी न्याय का हिस्सा है?

सबसे बड़ा सवाल—सिस्टम आखिर किसके लिए है?

क्या सिस्टम का काम सिर्फ फाइल बनाना है? क्या कार्रवाई का मतलब केवल कागज पर धारा लगा देना है? क्या जांच का मतलब केवल केस डायरी भरना है? क्या अदालत का मतलब केवल अगली तारीख देना है? या फिर इस पूरी व्यवस्था का उद्देश्य वास्तव में यह होना चाहिए कि निर्दोष को जल्द राहत मिले, पीड़ित को जल्द न्याय मिले, दोषी को कानून के अनुसार सजा मिले, और सच को राजनीति, प्रभाव, जाति, पैसा और दबाव से ऊपर रखा जाए। अगर यह नहीं हो रहा तो सवाल उठेगा, और जमीनी आवाज़ सवाल उठाएगी।

मोहम्मद जावेद के मामले में अब क्या होना चाहिए?

जमीनी आवाज़ किसी व्यक्ति को अदालत से पहले दोषी या निर्दोष घोषित करने के पक्ष में नहीं है। लेकिन जमीनी आवाज़ यह जरूर मांग करती है कि मामले की जांच निष्पक्ष हो; जांच में किसी व्यक्ति की पहचान, सम्मान, राजनीतिक पहुंच या सामाजिक प्रभाव का असर न हो; शिकायतकर्ता के अधिकार और सम्मान की पूरी रक्षा हो; आरोपी को भी कानून के अनुसार निष्पक्ष जांच और अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार मिले; और जांच व न्यायिक प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी न खिंचे।

और सबसे महत्वपूर्ण—सच सामने आए। क्योंकि इस मामले में सबसे बड़ी आवश्यकता अफवाह नहीं, फैसला है। सबसे बड़ी जरूरत बहस नहीं, निष्पक्ष जांच है। सबसे बड़ा सम्मान किसी व्यक्ति के पक्ष में नारा लगाना नहीं, बल्कि कानून और सच के पक्ष में खड़ा होना है।

शौर्य चक्र बड़ा या इज्जत?

शायद सवाल का जवाब दोनों में से किसी एक को छोटा करके नहीं मिलेगा। राष्ट्रीय सम्मान भी महत्वपूर्ण है, इंसान की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा भी महत्वपूर्ण है, पीड़ित का सम्मान भी महत्वपूर्ण है, और कानून का सम्मान भी महत्वपूर्ण है। लेकिन इन सबके बीच सबसे ऊपर होना चाहिए—सच। और सच तक पहुंचने का रास्ता होना चाहिए—तेज, निष्पक्ष और संवेदनशील न्याय।

जमीनी आवाज़ का अंतिम सवाल

आज यह सवाल मोहम्मद जावेद का नहीं है। यह सवाल राहुल गांधी का भी नहीं है। यह सवाल किसी एक पार्टी, एक जाति, एक वर्ग या एक शहर का नहीं है। यह सवाल पूरे देश के उस आदमी का है, जो अदालत की सीढ़ियों पर बैठकर अपनी फाइल को देखता है और सोचता है—“मेरे मामले का नंबर आखिर कब आएगा?” और शायद उससे भी बड़ा सवाल—“क्या न्याय मेरे जिंदा रहते मिलेगा?”

राष्ट्रपति न्याय में देरी पर चिंता व्यक्त कर रही हैं। देश के बड़े नेता कानूनी मामलों में अदालतों की चौखट पर हैं। और घाटशिला का आम आदमी दोनों को देख रहा है। वह किसी भाषण का इंतजार नहीं कर रहा, वह किसी नारे का इंतजार नहीं कर रहा। वह सिर्फ एक जवाब चाहता है—“न्याय कब?”

और जमीनी आवाज़ इस एपिसोड के अंत में यही सवाल छोड़ रही है—“शौर्य चक्र की चमक अपनी जगह है... इज्जत की कीमत अपनी जगह है... लेकिन अगर सच और न्याय तक पहुंचने में पूरी जिंदगी गुजर जाए—तो फिर इस सिस्टम में सबसे कमजोर आदमी आखिर जाए कहां?”

अब जवाब का इंतजार नहीं—कार्रवाई का इंतजार है।