सरायकेला.. जमशेदपुर ब्यूरो चीफ...
सरकारी योजनाओं की फाइलों में विकास चाहे जितनी तेजी से दौड़ रहा हो, कुकड़ू से ईचाडीह तक पहुंचते-पहुंचते वह विकास मानो दम तोड़ चुका है। ₹2.84 करोड़ की प्रशासनिक स्वीकृति, टेंडर प्रक्रिया पूरी और ठेकेदार तय होने की बात के बावजूद करीब डेढ़ साल से 4.3 किलोमीटर सड़क निर्माण का काम जमीन पर शुरू नहीं हुआ। सवाल सीधा है—जब पैसा स्वीकृत है और ठेकेदार तय है, तो फिर सड़क निर्माण रोक किसने रखा है?
शिलान्यास सूची के क्रमांक 22 में कुकड़ू से ईचाडीह तक सड़क सुदृढ़ीकरण योजना दर्ज है। योजना की प्रशासनिक स्वीकृति ₹284.205 लाख यानी करीब ₹2.84 करोड़ की है। लेकिन सरकारी कागजों में दर्ज इस करोड़ों की योजना की जमीनी तस्वीर बेहद शर्मनाक है—आज तक सड़क पर निर्माण कार्य की शुरुआत तक नहीं हुई।
कागजों में करोड़ों, सड़क पर गड्ढे और कीचड़
बरसात ने सड़क की बदहाली को और भयावह बना दिया है। जगह-जगह गड्ढे, कीचड़ और जलजमाव के बीच स्कूली बच्चे, मरीज, किसान, मजदूर और रोजाना आवागमन करने वाले लोग किसी तरह रास्ता पार करने को मजबूर हैं। छोटे वाहन कई जगह फंस जाते हैं। गंभीर मरीजों को ले जाने वाले वाहनों के लिए भी यह सड़क परेशानी का कारण बन रही है।
जिस सड़क के निर्माण से ग्रामीणों को राहत मिलनी थी, उसी सड़क की बदहाली अब उनके लिए रोज की परीक्षा बन चुकी है।
डेढ़ साल की देरी—सिर्फ लापरवाही या कुछ और?
सबसे गंभीर सवाल योजना की देरी को लेकर है। यदि प्रशासनिक स्वीकृति मिल चुकी है, टेंडर हो चुका है और ठेकेदार भी तय है, तो काम शुरू नहीं होने का वास्तविक कारण क्या है?
ग्रामीणों का आरोप है कि स्थानीय विधायक के हाथों शिलान्यास के बाद ही निर्माण शुरू करने की बात कही जा रही है। कुछ ग्रामीणों ने योजना में कथित 'प्रतिशत' के खेल का भी आरोप लगाया है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। फिर भी सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर एक स्वीकृत योजना को डेढ़ साल तक रोकने की वजह क्या है?
क्या सरकारी विकास कार्य भी अब शिलान्यास की तारीख और राजनीतिक औपचारिकताओं का मोहताज हो गया है? अगर ऐसा नहीं है तो विभाग स्पष्ट करे कि निर्माण शुरू करने में बाधा कहां है और उसे दूर करने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई?
जिम्मेदार कौन—विभाग, ठेकेदार या पूरी व्यवस्था?
यह सिर्फ सड़क निर्माण में देरी का मामला नहीं है। यह उस सरकारी व्यवस्था पर सवाल है जिसमें करोड़ों रुपये की योजना स्वीकृत होने के बाद भी जनता को उसका लाभ नहीं मिलता।
₹2.84 करोड़ की योजना फाइल में स्वीकृत होकर अगर डेढ़ साल तक सड़क पर नहीं उतरती, तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने, योजना में देरी का कारण सार्वजनिक करने और तत्काल निर्माण शुरू कराने की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना बिल्कुल स्पष्ट है—"कागजों में सड़क नहीं बनती। हमें सड़क पर काम चाहिए, भाषण और शिलान्यास नहीं।"
अब निगाहें सड़क निर्माण विभाग और जिला प्रशासन पर हैं। देखना होगा कि ₹2.84 करोड़ की यह योजना आखिर कब फाइलों से निकलकर जमीन पर उतरती है और डेढ़ साल से इंतजार कर रहे कुकड़ू-ईचाडीह के ग्रामीणों को कब राहत मिलती है।





