जमीनी आवाज, संपादकीय — असित भट्टाचार्य
15 अगस्त को जब लाल किले की प्राचीर से देश को आजादी का संदेश दिया जाता है, तब सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि हमने 1947 में अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति पाई थी या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या आज देश का आम नागरिक बिना भय के सत्ता से सवाल पूछ सकता है? क्या वह अपने हक-हकूक के लिए आवाज उठा सकता है? क्या वह बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, विस्थापन, महंगाई, अन्याय और व्यवस्था की नाकामी पर सवाल कर सकता है?
नक्सल शब्द का जन्म पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी से हुआ। 1967 में भूमिहीन किसानों और आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई से निकला आंदोलन आगे चलकर हिंसक और सशस्त्र उग्रवाद में बदल गया। इतिहास अपने स्थान पर है। हथियार उठाना और हिंसा करना लोकतांत्रिक रास्ता नहीं हो सकता। लेकिन इतिहास के इसी शब्द को अगर सत्ता के खिलाफ उठने वाली हर वैचारिक आवाज पर चिपकाने की कोशिश होगी, तो सवाल उठेगा—क्या लोकतंत्र में असहमति के लिए भी कोई नया अपराध गढ़ा जा रहा है?
प्रधानमंत्री ने लाल किले से 'हथियारी नक्सल' के साथ 'दिमागी नक्सल' जैसे शब्द का इस्तेमाल किया। यहीं से एक गंभीर बहस जन्म लेती है। क्या सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाला व्यक्ति दिमागी नक्सल है? क्या आदिवासी अपनी जमीन बचाने की बात करे तो वह दिमागी नक्सल है? क्या बेरोजगार युवा नौकरी मांगे तो वह दिमागी नक्सल है? क्या मजदूर अपने अधिकार और उचित मजदूरी की मांग करे तो वह दिमागी नक्सल है? क्या पत्रकार भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए तो वह दिमागी नक्सल है?
अगर जवाब हां है, तो फिर लोकतंत्र में नागरिक बचेगा कहां?
देशभक्ति का अर्थ सत्ता की हर बात पर ताली बजाना नहीं है। देशभक्ति का सबसे कठिन रूप है—देश के हित में सत्ता से असहज सवाल पूछना। सत्ता की प्रशंसा करने वालों की कमी कभी नहीं रही; इतिहास उन लोगों को याद रखता है जिन्होंने सत्ता के सामने खड़े होकर सच बोलने का साहस किया।
लाल किले की प्राचीर किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। वह उन करोड़ों भारतीयों की उम्मीद का प्रतीक है, जिन्होंने आजादी के लिए अपना सर्वस्व दिया। इसलिए वहां से निकलने वाला संदेश ऐसा होना चाहिए जो देश को जोड़े, नागरिकों को भरोसा दे और असहमति को लोकतंत्र की ताकत माने।
आज देश को सबसे ज्यादा जरूरत इसी बात की है कि राष्ट्रवाद और सत्ता-समर्थन के बीच फर्क किया जाए। सरकार देश नहीं है। सरकार बदलती है, सत्ता बदलती है, राजनीतिक विचार बदलते हैं—लेकिन देश और संविधान बने रहते हैं।
और यही वह बिंदु है जहां सवाल चुभता है।
अगर अपने हक के लिए जागरूक होना 'दिमागी नक्सल' है, तो क्या हम एक ऐसे लोकतंत्र की तरफ बढ़ रहे हैं जहां नागरिक से सवाल पूछने के बजाय सिर्फ आदेश मानने की उम्मीद की जाएगी? अगर सत्ता से असहमति को संदेह की नजर से देखा जाएगा, तो फिर संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति के अधिकार का अर्थ क्या रह जाएगा?
आजादी का उत्सव मनाने वाले देश को यह सवाल जरूर पूछना चाहिए—क्या हम केवल बोलने की आजादी का जश्न मना रहे हैं, या सच बोलने की आजादी भी हमारे पास है?
क्योंकि गुलामी केवल तब नहीं होती जब किसी विदेशी सत्ता का शासन हो। गुलामी का एक खतरनाक रूप वह भी है, जब नागरिक अपने ही देश में सवाल पूछने से डरने लगे।
'जमीनी आवाज' किसी हिंसा, हथियार या उग्रवाद का समर्थन नहीं करती। लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछने के अधिकार को अपराध की श्रेणी में खड़ा करने की कोशिश का भी विरोध करती है।
हमारा सवाल सत्ता से है और रहेगा—जिस देश ने अंग्रेजों से आजादी इसलिए हासिल की थी कि नागरिक अपने अधिकारों के साथ जी सके, क्या उस देश में आज नागरिक को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की पूरी आजादी है?
अगर है—तो सवाल पूछने दीजिए। अगर नहीं है—तो फिर लाल किले से हर साल सिर्फ यह मत कहिए कि हम आजाद हैं।
क्योंकि आजादी का सबसे बड़ा प्रमाण तिरंगा नहीं, बल्कि वह नागरिक है जो तिरंगे के नीचे खड़े होकर सत्ता से बेखौफ होकर सवाल पूछ सके।
और याद रखिए—जिस दिन जनता ने सवाल पूछना बंद कर दिया, उसी दिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी हार शुरू हो जाएगी।





