जमीनी आवाज के पास दस्तावेज, कॉलिंग रिपोर्ट और प्रत्यक्ष बयानों के दावे; डायरेक्टर सुशील दुबे ने जांच के लिए संस्थान आने का दिया न्योता
'घंटी छुट्टी की हो या खतरे की—बजेगी जरूर': जमीनी आवाज का दावा, किसी के दबाव में खबर का खंडन नहीं, प्रमाणों के आधार पर ही उठेंगे सवाल
घाटशिला। जमीनी आवाज टीम की रिपोर्ट
मुख्यमंत्री सारथी योजना के तहत संचालित घाटशिला स्थित प्रशिक्षण केंद्र को लेकर जमीनी आवाज के पास उपलब्ध दस्तावेजों, बैच सूची, कॉलिंग रिपोर्ट और संबंधित लोगों से हुई बातचीत ने कई ऐसे सवाल खड़े किए हैं, जिनका जवाब अब केवल बयान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष और आधिकारिक जांच से ही मिल सकता है।
मामला उस समय और गंभीर हो गया जब दिनेश वाल्मीकि के नाम जारी 'Domestic Data Entry Operator (SSC/Q2212)' के प्रमाणपत्र की प्रति सामने आई। प्रमाणपत्र पर Skill India–कौशल भारत कुशल भारत, Ministry of Skill Development & Entrepreneurship का उल्लेख है तथा NASSCOM-IT-ITeS SSC की चेयरपर्सन सिंधु गंगाधरन के हस्ताक्षर अंकित हैं।
लेकिन इस प्रमाणपत्र के नामधारी दिनेश वाल्मीकि का दावा है कि उन्होंने संबंधित संस्थान में कभी पढ़ाई ही नहीं की। उनके अनुसार वे वहां केवल काम करते थे। यदि यह दावा सही है तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिना प्रशिक्षण लिए उनके नाम पर प्रशिक्षण प्रमाणपत्र कैसे जारी हुआ?
यह सवाल केवल एक प्रमाणपत्र तक सीमित नहीं है। दिनेश वाल्मीकि ने संस्थान में विद्यार्थियों के साथ कथित धोखाधड़ी, नौकरी के नाम पर युवाओं को दूसरे शहरों में भेजने, रहने-खाने की उचित व्यवस्था नहीं होने, भुगतान में अंतर तथा प्लेसमेंट को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि जिन कंपनियों में नौकरी दिलाने की बात कही जाती है, वहां वास्तविक नियुक्तियों को लेकर भी सवाल हैं।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र सरकारी जांच अभी बाकी है और जमीनी आवाज किसी आरोप को अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत नहीं कर रहा है।
बैच की 30 नामों वाली सूची भी कई सवाल छोड़ती है
जमीनी आवाज के पास उपलब्ध Batch ID–23740 की Daily Calling Report में 30 अभ्यर्थियों के नाम दर्ज हैं। रिपोर्ट में 17 अप्रैल से 21 अप्रैल तक की कॉलिंग टिप्पणियां दिखाई देती हैं। इनमें कई अभ्यर्थियों के सामने Call Not Received, Not Reachable, Health Issue, Family Issue, Coming तथा अन्य टिप्पणियां दर्ज हैं।
यह दस्तावेज अपने आप में किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है, लेकिन प्रशिक्षण एवं प्लेसमेंट की वास्तविक प्रक्रिया को समझने के लिए यह रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो सकता है।
सवाल यह है कि इन 30 अभ्यर्थियों में से वास्तव में कितने प्रशिक्षण में शामिल हुए, कितनों ने प्रशिक्षण पूरा किया, कितनों को प्रमाणपत्र मिला और कितनों को वास्तविक प्लेसमेंट मिला? इसका जवाब योजना से जुड़े आधिकारिक रिकॉर्ड से ही सामने आना चाहिए।
डायरेक्टर सुशील दुबे का अलग पक्ष
जमीनी आवाज के संपादक की बातचीत संस्थान के डायरेक्टर सुशील दुबे से भी हुई। दुबे ने संस्थान पर लगाए जा रहे आरोपों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि जमीनी आवाज की टीम कभी भी संस्थान में आकर जांच कर सकती है।
दुबे के अनुसार दिनेश वाल्मीकि समेत तीन युवक संस्थान में मोबिलाइजर के रूप में काम करते थे, वे संस्थान के नियमित विद्यार्थी नहीं थे। उनका कहना है कि खराब प्रदर्शन के कारण उन्हें हटा दिया गया।
लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—यदि वे विद्यार्थी नहीं थे और प्रशिक्षण नहीं लिया था, तो उनके नाम पर प्रशिक्षण प्रमाणपत्र कैसे आया?
जब इस संबंध में उनसे लिखित नोटिस या हटाए जाने के दस्तावेज के बारे में सवाल किया गया, तो इस सवाल का स्पष्ट दस्तावेजी उत्तर सामने नहीं आया।
दुबे ने यह भी आरोप लगाया कि उक्त युवक उन्हें राजनीतिक चंदा देने के लिए दबाव डालते थे। वहीं दूसरी ओर युवकों का दावा है कि उनके पास संस्थान से जुड़े और भी दस्तावेज एवं प्रमाण मौजूद हैं।
दोनों पक्षों के दावों की सत्यता की जांच संबंधित सक्षम एजेंसी द्वारा की जानी चाहिए।
प्लेसमेंट पर भी स्पष्टता नहीं
प्लेसमेंट के सवाल पर सुशील दुबे ने बताया कि प्लेसमेंट का काम दूसरे व्यक्ति करते हैं और उन्हें इसकी पूरी जानकारी नहीं है। वहीं युवकों की ओर से दावा किया गया है कि जिन कंपनियों में प्लेसमेंट की बात कही जाती है, वहां वास्तविक नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल हैं।
ऐसे में अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही होना चाहिए कि मुख्यमंत्री सारथी योजना के तहत इस केंद्र से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले प्रत्येक बैच के कितने युवाओं को वास्तव में किस कंपनी में नियुक्ति मिली, नियुक्ति पत्र क्या है, वेतन कितना तय हुआ और वर्तमान में वे नौकरी कर रहे हैं या नहीं।
टिकट के नाम पर लिए गए ₹1,000 का सवाल
बातचीत में विद्यार्थियों के बाहर प्लेसमेंट के लिए जाने के दौरान टिकट के नाम पर लिए जाने वाले लगभग ₹1,000 की राशि का मुद्दा भी उठा।
सुशील दुबे के अनुसार सभी विद्यार्थी प्लेसमेंट के लिए नहीं जा पाते, इसलिए पहले से टिकट नहीं काटा जाता और विद्यार्थियों को अपना टिकट स्वयं लेना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यह राशि बाद में वापस कर दी जाती है तथा आर्थिक नुकसान से बचने के लिए ऐसा किया जाता है।
यहां भी सवाल सीधा है—क्या इस राशि की प्राप्ति और वापसी का बाकायदा लेखा-जोखा रखा जाता है? क्या प्रत्येक विद्यार्थी को भुगतान की रसीद दी जाती है?
'मॉडल सेंटर' का दावा और 'डुप्लीकेट स्टूडेंट' का आरोप
सुशील दुबे के अनुसार उपायुक्त से जुड़े कार्यक्रमों में घाटशिला का यह केंद्र मॉडल सेंटर के रूप में सामने आया है और इसके बारे में समाचार पत्रों में खबरें भी प्रकाशित हुई हैं।
इसके विपरीत दिनेश वाल्मीकि ने दावा किया कि उपायुक्त के कार्यक्रम में डुप्लीकेट विद्यार्थियों को लाकर कार्यक्रम कराया गया था।
दोनों दावे एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। इसलिए इस बिंदु पर भी तस्वीर केवल कार्यक्रम की आधिकारिक सूची, उपस्थिति रजिस्टर, वीडियो रिकॉर्डिंग और संबंधित अधिकारियों के रिकॉर्ड से साफ हो सकती है।
'लाइव कैमरा और GLM की निगरानी'—तो रिकॉर्ड सामने आए
सुशील दुबे का कहना है कि बैच में गलत तरीके से विद्यार्थियों को लेना संभव नहीं है, क्योंकि पूरा सिस्टम लाइव स्ट्रीमिंग कैमरों की निगरानी में है और GLM द्वारा डायरेक्ट मॉनिटरिंग की जाती है।
यदि ऐसा है तो जांच के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण हो सकता है।
किस बैच में कौन विद्यार्थी आया, किस दिन आया, प्रशिक्षण में कितनी उपस्थिति रही और किसे प्रमाणपत्र दिया गया—इन सभी बातों की पुष्टि CCTV, बायोमेट्रिक/उपस्थिति रिकॉर्ड और पोर्टल डेटा से की जा सकती है।
यानी मामला बयान बनाम बयान का नहीं, रिकॉर्ड बनाम रिकॉर्ड का होना चाहिए।
मार्च से भुगतान रुका—क्यों?
बातचीत में सुशील दुबे ने यह भी बताया कि मार्च से उनका तथा कर्मचारियों का भुगतान रुका हुआ है। उनके अनुसार अधिकारियों/कर्मचारियों की अनुपस्थिति अथवा जांच से जुड़े कारणों से भुगतान प्रभावित हुआ है।
यदि यह स्थिति सही है तो यह भी जांच का विषय है कि केंद्र के डायरेक्टर एवं कर्मचारियों का भुगतान किस कारण से रोका गया, किस अधिकारी के आदेश से रोका गया और क्या इस संबंध में कोई लिखित आदेश मौजूद है?
जमीनी आवाज का सवाल—'प्रमाणपत्र पर नाम उन्हीं का, दावा भी उन्हीं का'
यह पूरा मामला किसी व्यक्ति के बयान को अंतिम सत्य मान लेने का नहीं है।
लेकिन एक तथ्य गंभीर है—एक व्यक्ति के नाम पर स्किल ट्रेनिंग का प्रमाणपत्र मौजूद है और वही व्यक्ति सार्वजनिक रूप से कह रहा है कि उसने उस संस्थान में प्रशिक्षण नहीं लिया।
अगर वह गलत बोल रहा है तो उसके दावे को गलत साबित करने के लिए संस्थान के पास सबसे आसान रास्ता है—उसका एडमिशन रिकॉर्ड, उपस्थिति, प्रशिक्षण रिकॉर्ड, मूल्यांकन रिकॉर्ड और प्रमाणपत्र जारी होने का पूरा आधिकारिक डेटा सामने रखना।
और यदि युवक का दावा सही है, तो फिर सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं रहेगा।
जमीनी आवाज किसी के कहने पर खबर वापस नहीं लेता
जमीनी आवाज स्पष्ट करना चाहता है कि किसी भी व्यक्ति, संस्था या पदाधिकारी के दबाव में खबर का खंडन करना हमारी पत्रकारिता का हिस्सा नहीं है।
हमारे पास जो दस्तावेज और प्रमाण उपलब्ध हैं, खबर उन्हीं के आधार पर प्रकाशित की जाती है। किसी के आरोप को प्रमाण मानकर खबर नहीं बनाई जाती और किसी के प्रभावशाली होने के कारण सवाल पूछना भी बंद नहीं किया जाएगा।
सुशील दुबे ने स्वयं जमीनी आवाज की टीम को संस्थान आकर जांच करने का न्योता दिया है। इसलिए अब सवाल और भी साफ है—यदि सब कुछ पारदर्शी है तो रिकॉर्ड की जांच में डर किस बात का?
जमीनी आवाज की टीम मुख्यमंत्री सारथी योजना के संबंधित केंद्र तक पहुंच चुकी है। अब जांच दस्तावेजों, रिकॉर्ड और वास्तविक विद्यार्थियों तक पहुंचेगी।
घंटी छुट्टी की हो या खतरे की—घंटी बजेगी जरूर।
और इस पूरे मामले में अंतिम फैसला जमीनी आवाज नहीं करेगा। फैसला करेगा दस्तावेज, रिकॉर्ड, जांच और सच।
जमीनी आवाज की मांग
इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच के लिए संबंधित विभाग से मांग है कि—
- प्रमाणपत्र जारी करने की पूरी प्रक्रिया की जांच हो।
- प्रत्येक बैच की एडमिशन एवं उपस्थिति सूची का मिलान किया जाए।
- प्रशिक्षण लेने वाले विद्यार्थियों और मोबिलाइजरों की भूमिका स्पष्ट की जाए।
- प्रमाणपत्र प्राप्त करने वाले प्रत्येक व्यक्ति का प्रशिक्षण रिकॉर्ड सत्यापित किया जाए।
- प्लेसमेंट का कंपनीवार और विद्यार्थीवार रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए।
- बाहर भेजे गए विद्यार्थियों के टिकट, भुगतान और रहने-खाने की व्यवस्था की जांच हो।
- CCTV/लाइव मॉनिटरिंग एवं पोर्टल रिकॉर्ड की जांच की जाए।
- मार्च से भुगतान रोके जाने के कारणों का लिखित स्पष्टीकरण लिया जाए।
- यदि किसी स्तर पर फर्जी दस्तावेज, गलत प्रमाणपत्र या वित्तीय अनियमितता मिलती है तो जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई हो।
नोट: इस खबर में लगाए गए आरोप संबंधित व्यक्तियों के बयानों/दावों के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। जमीनी आवाज का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि उपलब्ध दस्तावेजों और बयानों के आधार पर उठे गंभीर सवालों की निष्पक्ष जांच की मांग करना है। संबंधित विभाग, संस्था अथवा अन्य पक्ष अपना पक्ष और दस्तावेज उपलब्ध कराते हैं तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।





